"जीवन की आपा - धापी " जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये दो सिक्के जमीं पे गिर गए तो गम ना कर हाथो से वो , तेरा करीबी रिस्ता ना छूट जाये || बड़े मुश्किल से मिलते हैं दिल से हाल पूछने वाले तुझसे चाहने तुझे सराहने वाले कही इस आप - धापी में कोइ वो चेहरा ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आप - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || कोइ गुजर रहा होगा तेरे इन्तजार के पलों से वो तेरा यार ना रूठ जाये जीवन की आपा - धापी में वो तेरा प्यार का गुलिस्तां ना छूट जाये || थाम लेना उस हमदम के हाथो को तेरा हमकदम तेरा हमसफ़र ना छूट जाये जीवन की आपा - धापी में तेरी जमीं तेरा आसमान ना छूट जाये || तू नहीं कोइ खुदा कही तुझे ये गुमा ना हो जाये संभाल लेना खुद को इस चकाचौंध से की कोइ तेरा अपना अँधेरे में ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || प्रिया मिश्रा :)
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Showing posts from January, 2020
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"मैं फिर भी तुमको चाहूंगा " तुम गुजर जाओगे मुझसे होके मैं ठहर गया हूँ , तेरा होके तेरी हर खता को मैं भूल जाऊंगा तुम मुझे चाहो ना चाहो में फिर भी तुमको चाहूँगा || होंगे तुम मेरी उदासियों का सबब यूँ ही दिन खाली - खाली सा गुजर जायेगा तुम रात सी सिमट जाओगे मैं अंधेरो में गुम हो जाऊँगा तुम मुझे चाहो ना चाहो मैं फिर भी तुमको चाहूंगा || एक यहीँ तो ख्वाइश बाकि है एक यही तो मन्नत मांगी थी तुझे पाने जिद्द कहाँ मन में मैंने ठानी थी बस यूँ ही उम्र भर तेरे प्यार में गुजार दूँ बस यूँ ही उम्र भर तेरे इन्तजार में गुजार दूँ बस यहीं तो मेरी ख्वाइश थी मैं एक तरफ़ा वादा सारी उम्र निभाता जाऊंगा तुम मुझे चाहो ना चाहो मैं फिर भी तुमको चाहूंगा || प्रिया मिश्रा :)
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मौसम को बदलने से रोक लो की इतनी आँधियो में फिर से कोइ बेघर ना हो जाये है आग लगी इस आग को ना देखो यूँ की लपटे तुम्हारे घर तक ना चली जाये जो फैलेगी ये आग हर एक मकान होगा कही तेरा भी आशियाना ना जल जाये || मौसम को बदलने से रोक लो की इतनी आँधियो में फिर से कोइ बेघर ना हो जाये || ये दौर ही चल रहा है दुसरो की जेबें टटोलने का जरा संभल के रहना कही तुम्हारा, खुद का जमीर ना लूट जाये || मौसम को बदलने से रोक लो की इतनी आँधियो में फिर से कोइ बेघर ना हो जाये || देख के कीचड़ अपने शहर का मुँह न मोड़ लेना उस कीचड़ में कमल उगाने का एक फर्ज अदा कर जाना जो कमल खिलेगा तो उसकी सुंदरता तुम्हे भी सुन्दर बनाएगी जो कीचड़ उड़ा तो दाग लग जायेगा जो एक बार दामन पे दाग लग जायेगा तो उम्र उसमे ही गुजर जाएगी संभाल के रखना खुद को उस शहर के कीचड़ से की कही तू भी मैला ना हो जाये || मौसम को बदलने से रोक लो की इतनी आँधियो में फिर से कोइ बेघर ना हो जाये || प्रिया मिश्रा :)
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"हम रहे ना रहे " दिन गुजर ही जायेगा रात ढल ही जाएगी मौसम बदलता रहेगा क्या फर्क पड़ता हैं हम रहे ना रहे || सब कही गुम जायेंगे मुझे याद करने वाले सब की अपनी दास्ताँ होगी हम ना किसी को याद आएंगे ये वक़्त भी गुजर गया वो वक़्त भी गुजर जायेगा क्या फर्क पड़ता है हम रहे ना रहे || पुराने पेड़ के पत्ते गिर जाते है पेड़ खाली नहीं होता नए पत्ते आ ही जाते है गिरे पत्तो का कहाँ कोइ मकान होता है बंजारा सा बन के यहाँ वहां उड़ता रहता है हम भी बंजारे से हो जायेंगे तुम रह लेना खुद का आशियाँ बचा के क्या फर्क पड़ता है हम रहे ना रहे || प्रिया मिश्रा :)
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"मैं तेरी प्रेमिका थी" अजनबी से दोस्त हुए दोस्त से प्रेमिका लेकिन , प्रेमिका से दोस्त ना बन पाई रिश्ते मजबूत हुए अच्छा लगा लेकिन , इतने मजबूत हुए गाँठ पड़ आई मैं प्रेमिका से दोस्त ना बन पाई || हूँ और थी में पल भर का फासला था लेकिन , वो फासला अंधे कुएँ जैसा था जितना डुबी , ग़ुम होते गयी मैं प्रेमिका से दोस्त ना बन पाई || वो पल बसंत था ये पल पतझर है पत्ते झरते गए पेड़ सूखता गया पेड़ सुख गया पत्ते बिखर गए मैंने अँधियो में , तिनका - तिनका समेटा , पत्ता - पत्ता खुद को ढूंढ़ते रही गुजर गया आँधी गिर गया पेड़ मैं आंधी की दिशा में मुड़ गयी मैं प्रेमिका से दोस्त ना बन पाई || प्रिया मिश्रा :)
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यु तो मैं मजबूत हूँ सब कहते हैं मैं मजबूत हूँ लेकिन पत्थर भी तुफानो से टूट जाया करता हैं कहने को तो मैं हर रोज हर वक़्त मुस्कुराती हूँ पर हर शाम आँखों में पानी भर जाया करता हैं || ये मजबूती का नाटक जाने कब तक चलेगा जब तक सांसे हैं क्या तब तक चलेगा लेकिन सांसे भी तो टूट जाया करती हैं और याद भी छूट जाया करते हैं प्रिया मिश्रा :)
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"तेरी हर शर्त हमें मंजूर हैं " ये शर्त मानने वाली बात बाद में शुरू हुई पहले तो सिलसिला कुछ यु था की बेपनाह प्यार था और बिना जंजीरो के उसका आना मुझे बुलाना मेरी तारीफे और फिर प्यार से मुझे निहारना अच्छा था सब कुछ फिर सुरु हुआ शर्तो का सिलसिला एक वादा उसने किया वो टूट गया एक वादा मैंने किया उसे निभाने में मैं टूट रही हूँ अब वो कहता हैं रहने दो ना बातें और मैं खामोश हो जाती हूँ अब वो कहता हैं तुमसे प्यार तो हैं लेकिन जता नहीं सकता मैं मान लेती हूँ दिल में अरमान बहोत हैं कहने को , पर शर्तो का क्या करे प्यार में सब कुछ चलता हैं तो तेरी हर शर्त भी मंजूर हैं || तू कहे तो सब मंजूर तेरी सारी नादानियाँ माफ़ तेरी हर बात सर आँखों पे तुझसे जुड़ा हर बात पाक तेरे शब्दों को कहानी बना दूँ तेरे हर सपने को अपने आँखों में सजा लूँ तेरे लिए दुआएं मांगे हैं कैसे अब उस दुआ की शिकयत करू तो क्यों ना तेरी हर शर्त को मंजूर कर लू प्यार में सब कुछ चलता हैं तो तेरी हर शर्त मंजूर हैं || प्रिया मिश्रा :)
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एक समंदर सुख गया एक दरिया उफान पर है सोचती हूँ इश्क में क्या इतना पाप हैं चलते - चलते कदम थक गए छाले जैसे मेरे नाम हो गए खिताब मैंने पाया शमा का , जो हर घर में जला करती हैं आफताब बनते - बनते राख हो गए सोचती हूँ , इश्क में क्या इतना पाप हैं || हर वो गुनाह भुगता हैं जो किया ही नहीं हर वो दर्द से गुजरे हैं जिसके जख्म भरे ही नहीं एक और नासूर जन्म ले रहा हैं अब वो कहाँ लेके जाएगा डर लगता हैं , कही वो भी ना ये कह दे हम तो तेरे नाम को पाँव की धूल में छोड़ा करते हैं वो मुकाम सोच के ही रूह काँप जाती हैं सोचती हूँ।, इश्क में क्या इतना पाप हैं || एक अजीब सी बात हैं जो कह नहीं पाए हर बार दायरों की अहमियत जमझाई गयी मुस्कुराना तक , दुसरो ने तय किया हर बार मेरे आसुओं की भी कीमत लगाई गयी ये प्यार भी ना जहर जैसा हैं खा लो तो तड़प के ही मरना हैं ये इतिहास भी कहता हैं हीर - राँझा नहीं मिले श्री - फरहाद की कहानी भी नहीं लिखी ये मोहब्बत ने सबको लाश बना दिया सोचती हूँ , इश्क में क्या इतना पाप हैं || पूजते हैं जिस कृष्णा को राधा संग वो प्रेम भी बिरह म...
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"तुम सबसे प्यारी हो " सूखे पेड़ से एक बीज गिरा जमीन में जाके कही दब गया उससे फूटा एक अंकुर थोड़ी पानी थोड़ी हवा थोड़ा धुप और अंकुर हो गया पौधा पौधा अब खुली हवा में साँस लेने लगा कुछ दिन बाद उसपे फुल आने लगे वो फुल आँख से मुस्कुराने लगे सबको भाता वो पौधा आसमा को भी भाने लगा फिर एक दिन एक भावरा आया कली पे वो मंडराने लगा कली जरा सी शरमाई भवरे को देख के इतराई भावरा निकला सयाना उसे तो था रोज एक कली लुभाना वो चला गया कही और किसी और कली का दिल लुभाने ये नन्ही कली अब उदाश रहने लगी पेड़ का पत्ता - पत्ता उस कली के उदाश रहने लगा जड़ो तक उदासी जा पहुंची मिटटी भी वहाँ की बंजर सी नजर आने लगी फिर एक दिन एक और भौरा आया उसने कली की आत्मा को देखा वो छू गया कली के दिल को बोला , सुन कली तू है इतनी सुन्दर तुझमे सितारों की रौशनी बस्ती है मेरी आँखों से देख तेरे रंगो को तेरे रंगो में कितना प्यारा छुपा कोइ रंग है तुझमे बस्ता कोइ पाक , ओश की बून्द की तरह प्यार , मेरे दिल को भा गया है मैं धीरे - धीरे तेरा होने लगा हूँ तू धीरे - धीरे मेरी बन जा चल तू फिर से मुस्क...
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"ये शाम ढल ना जाये " कल का पीपल का पेड़ जो पौधा हुआ करता था वो अब बड़ा हो गया हैं अब वो बाहें फैलाये खड़ा है उसकी बाहों में असंख्य सितारे छुपे है सबको छुपाता वो पेड़ मुस्कुराता सा वो पेड़ ऐसा लगता है जैसे खुद को बच्चो को गले लगाया है अभी कल की ही बात थी एक अनजानी बेल उसपे आ टिकी वो बेल उसके जीवन की डोर हो गयी वो साँस लेने लगा उसमे वो बेल के सहारे पलने लगा लेकिन वो बेल अब धीरे - धीरे उतरने लगी है पेड़ भी अब उदाश होक सूखने लगा है डर लगता हैं बेल सुख ना जाये पीपल की अरमान डूब ना जाये कही ढलते - ढलते ये शाम ढल ना जाये || प्रिया मिश्रा :)
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"तेरे सावले रंग में कुछ तो बात है " मुझे सोचने की आदत नहीं है जो है वो कह रही हूँ तेरे मुस्कुराने में कुछ तो खास है तेरे सावले रंग में कुछ तो बात है शाम सा सावला तू सुबह सा खिलता तेरा चेहरा तेरी आँखों में डूबती सी मैं और गहरा होता तेरा प्यार इस प्यार में कुछ तो खास है तेरे सावले रंग में कुछ तो बात है || संजोग हैं एक तेरा मिलना ऐसी इत्तफाक न समझना हजारो में किसी से ऐसी तक़दीर मिलती है इस संजोग में कुछ तो खास है तेरे सावले रंग में कुछ तो बात है || प्रिया मिश्रा :)
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"तेरी यादें" एक खाली घर में ठंडा चूल्हा बासी बर्तन और बस्ती है तेरी यादें घर के कोने - कोने में तेरी रूह की खुसबू और , स्पर्श का एहसास और बस्ती है तेरी यादें || बूढ़ा बरगद सुख रहा है ठूट सा होक सांसे छूट रहा है ये जो गुजरा लेके जायेगा तेरी वो झूलो की यादें जिनमे बस्ता प्यार हमारा वो तेरी और मेरी खट्टी - मीठी यादें हर घर में बस्ती है तेरी और बस तेरी यादे || प्रिया मिश्रा :)
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"प्रेमिका की अभिलाषा " तुमसे बाते करना ऐसा है जैसे कोइ प्राथना की हो और वो स्वीकार हो गयी || रात भर जाग के तेरी आँखों में देखते हुए तुझे सुन्ना मेरे जीवन का अब पहला और आखरी कार्यो में से एक लगता है || तुझे खबर नहीं है , लेकिन तुझसे पहले ऐसा कभी ना लगा की किसी के लिए आँखे रात भर जगेंगी , किसी का इन्तजार करेंगी , किसी से इतना प्यार करेंगी || तुझे सायद पता भी न हो तू मेरी पहली ख्वाइश बन गया है | मेरी पहली तमन्ना तुझसे ही सुरु होती है | मेरा पहला दिन तुझसे सुरु होता है | वो तुझे गुडमॉर्निंग कहना ऐसा है जैसे मेरे होठो की मुस्कराहट उसमे छिपी हो | तुमसे बातें करना महज एक वक़्त नहीं है जो गुजर जायेगा | वो मेरी दुआ है जो कबूल हो जायेगा | तुझसे बस प्यार नहीं है मुझे , तूने मेरी रूह को छुआ है अब तो जीने मरने की कस्मे है तुझसे | तुझसे बात ना करने पर मेरा दिन ही पूरा नहीं होता है | मेरी शाम उदाश रहती है | और रात यु ही गुजर जाती है | तुम्हारा सताना मुझे रुला जाता है | दिन की शुरुआत तुम्हारे साथ चाहती हूँ और रात की चांदनी तुम्हारे साथ चाहती हूँ | दिन का हर पन्ना तेरे नाम लिखना चाहती हूँ ...
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"ये मौसम और तेरे चेहरे का क्यूट डिंपल " जैसे बारिश के बाद इंद्रधनुष जैसे सर्दी और चाय जैसे रास्ता और मंजिल ठीक वैसे ही है ये मौसम और तेरे चेहरे का क्यूट डिंपल || जैसे चाँद और चांदनी का संगम जैसे सुबह के बाद शाम जैसे ख्वाब और तू ठीक वैसे ही है ये मौसम और तेरे चेहरे का क्यूट डिंपल || जैसे शाम में सिमटता सूरज और रात में खिलता चाँद ठीक वैसे ही है ये मौसम और तेरे चेहरे का क्यूट डिंपल || प्रिया मिश्रा :)
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"तुम आँखों से समझ लो " मैं मौन रहूंगी कुछ कह न सकुंगी तुम मूक भासा पढ़ लो तुम आँखों से समझ लो || कहना बहोत कुछ है शब्द साथ नहीं देते खामोसी ओढ़ लेती हूँ मैं तेरे सामने पलकों से कहती हूँ तुम साथ जरा सा दे दो तुम आँखों से समझ लो || काजल की रेखाएं तेरा साथ चाहती है तुम कुछ दूर तो साथ चल लो तुम आँखों से समझ लो || प्रिया मिश्रा :)
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"एक जोड़ी कंगन " प्रेम प्रीत की चाह में बांध लिया तुझसे बंधन मैं चाहूँ कुछ और नहीं बस एक जोड़ी कंगन || ये कंगन सोने का ना हो न हो कोइ हिरा पिया तू ला दे मुझको भरोसे का वो जड़ाऊ कंगन जिसे मैं पह्नु हाथो में , ऐसे जैसे उम्र भर का कोइ बंधन मैं चाहूँ कुछ और नहीं बस एक जोड़ी कंगन || आँचल भर का प्रेम आदर भर का स्थान दिला दे बाकि तेरी दासी मैं जो भी हैं कर दू सब कुछ अर्पण दे दे मुझको तेरी आँखों का चमकता वो सितारा वो तेरी मुस्कराहट का मधुबन मैं चाहूँ कुछ और नहीं बस एक जोड़ी कंगन || प्रिया मिश्रा :)
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"सब मोह माया है" बड़ी दूर से खबर आई आज दावत में आवो भाई सब चले सज धज के सबसे आगे आये सेठ भाई जम कर खाया पूरी -मिठाई सुबह - सुबह अम्मा की याद आई जब पूरी ने की पेट से लड़ाई सारे हाकिम धरे रह गए सेठ कहे बार - बार हाई रे पीड़ा सही न जाई दिन भर रहा लोगो का आना - जाना ख़तम हो गया आधा खाना कल जो पैसे बचाये थे वो आज डूब गए कुछ हाकिम कुछ देखने वाले लूट गए सेठ अब पहले से बेहतर है पर दावत का नाम न लेते कहते , अब ना कही जाना है सबको कल की कहानी बताया हैं कहते हैं सेठ सब मोह माया है || प्रिया मिश्रा :)
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गणतंत्र दिवस संबिधान बना था आज के दिन एक नए कल की सोच ने जन्म लिया था बरसो पहले , एक समाज की नीव रखी गयी थी एक नए पौधे ने आँख खोला था लेकिन जी न पाया वो बस साँस भर लेता रहा घुटता रहा सिमटा रहा लोग आते गए नए शब्दों के नए अर्थ लाते गए अर्थ का अनर्थ निकला और धीरे - धीरे सब कुछ बदलता गया आज तो पता भी नहीं क्या लिखा हैं उस पन्ने में जो लिखा हैं , क्या हमने वही पढ़ा हैं या जो नहीं लिखा हैं हमने वो समझा हैं बात इतनी सी हैं मानवता अब बस साँस भर ले रही फिर भी आज का दिन सबके दिलो में बस्ता है तो आओ कुछ फूल अर्पित करे उन चरणों में जिन्होंने कल के लिए सोचा कुछ लिखा कुछ समझा कुछ समझाया कुछ प्रेरणा दी कोइ इतिहास रचा जिसे दोहराओ तुम भी बस उस इतिहास की कोइ गलतिया न दोहराना अब सुरु करो नया भारत बनाना बहोत कुछ सीखा हमने बहोत कुछ हमें इस जन्मभूमि ने सिखाई आज भारत माता के चरणों में नमस्कार करके आप सभी को गणतंत्र दिवश की हार्दिक बधाई जय हिन्द जय भारत प्रिया मिश्रा :)
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मुझे तुम्हे पानी की जिद्द और तुम्हारे बातो की तलब है सोचता हूँ , जिद्द और बढ़ा दूँ सुना है , जिद्द से हौसले बुलंद होते है और हौसलों से उड़ान मिलती है और उड़ान जितनी गहरी होती है तलब उतनी जायदा बढ़ती है और तलब जितनी जायदा हो जिद्द और बढ़ती है फिर कायनात भी झुकता है बादल भी बरसता है फिर किस्मत की बंजर ज़मीन में फ़ुट ही जाते हैं प्यार के अंकुर || प्रिया मिश्रा :)
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"क्यों है ऐसा" आज फिर रोने को जी चाहता है खबर नहीं है क्यों है ऐसा एक कमी सी लगती है कुछ खाली सा लगता है खबर नहीं है क्यों है ऐसा एक शाम को तेरे बिना गुजारना एक शाम को तेरे संग गुजारना एक शाम ठहर जाती है एक शाम रुला जाती है खबर नहीं है क्यों है ऐसा तू मुझमे कही बस गया है अब जाने की जिद न करना कुछ टूट जायेगा मुझमे तेरे दर्द को संभाल लुंगी लेकिन कुछ छूट जायेगा मुझमे तेरी खामोसी मेरे शब्द छिन लेगी खबर नहीं है क्यों है ऐसा तेरा होना मेरी जिंदगी है तेरा न होना मुझे बूत बना देता है सब कुछ खो के पाया है तुझे अब तू न खोना तुझे पाने की जिद्द नहीं ,शिद्दत हैं खबर नहीं हैं क्यों है ऐसा प्रिया मिश्रा :)
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घास पर गिरे ओश के बून्द की तरह होती हैं बेटियां बड़ी प्यारी बड़ी दुलारी होती है बेटियाँ || इसकी मुस्कराहट से आँगन खिलता हैं पिता का हर माँ की छाया होती है बेटियाँ बड़ी प्यारी बड़ी दुलारी होती है बेटियाँ || पाँव में पायल हाथ में कंगन माथे पे चुन्नी दुल्हन बन एक आँगन की शिक्षा दूसरे आँगन को देती है बेटियाँ जब बहू बनती है बेटियाँ एक नई कहानी बनाती है जब दो घरो को अपने दोनों हाथो से संभालती है बेटियाँ बड़ी प्यारी बड़ी दुलारी होती है बेटियाँ प्रिया मिश्रा :)
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" जब इश्क हो जाता हैं " कुछ अधूरा लगने लगे जब एक खालीपन सा कोइ खास का इन्तजार रहने लगे और सीने में दर्द सा आदमी यु ही बीमार सा हो जाता हैं जब इश्क हो जाता है || कुछ खोने का डर सताने लगे प्यार पे यकीन आने लगे कोइ अनजाना दिल को भने लगे यु ही शाम तनहा हो जाता हैं जब इश्क हो जाता है || राह चलते यु ही मुस्कुराना रोज नए ख्वाब बनाना एक किसी के लिए मंदिर में सर झुकना कुछ मांगना उसके लिए फिर से मुस्कुराना ये सिलसिला पागलों से हो जाता हैं जब इश्क हो जाता है || ऐसा लगता है वो साथ चल रहा है वो हमसफ़र मेरा मंजिल हो रहा हैं एक ख्वाब करवट लेता है जब इश्क हो जाता है प्रिया मिश्रा :)
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"मित्र " मित्र शब्द छोटा कर्म बड़े मित्र आसमान से टुटा तारे जैसा हैं जिससे छुप - छूप के सब कुछ कह सकते हैं मित्र सागर में पड़े मोती जैसा हैं जिसे गहरे पानी में भी जाकर पाने की इक्छा रहती हैं || मित्र कीचड़ में खिले कमल जैसा हैं जिसे देख के आस - पास का कुछ नजर न आये || मित्र इंद्रधनुष जैसा हैं जिसमे सात रंग हैं और जो सबको समेत के मुझे दे देता हैं और खुद रह जात्ता हैं हर बार शांत सफ़ेद सात रंग समेत के || प्रिया मिश्रा :)
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जब धर्म का ठेका लेने वाले खुद को भगवान बताते हैं | जरा संभल के रहना मित्रो ये रोज एक आदमी रूपी चूहा ले जाते हैं | कहते - कहते , ये प्रभु का नाम कर जाते उनको बदनाम | कुछ डरते उनसे , कुछ मरते उनपे कुछ को प्रकोप ने मारा हैं | इसीलिए तो हर चूहा बिल्ली के आगे हारा हैं | कुछ को देखो तस्बीरे ले रहे | कुछ ने समाज बिगाड़ा हैं | ये ढोंगी स्वामी जी के चेले हैं | जो रस्ते - रस्ते दंगे करते और कुछ को स्वं स्वामी जी ने मारा हैं || प्रिया मिश्रा :)
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मैं जब रोज सुबह की खबर पढ़ती हूँ वही अपनी अखबार से जो जिवंत पेड़ो को काट के लाशो की खबरे लाते हैं | हाँ , वही खबरे जिसे पढ़ के रोज के दिन बिताये जाते हैं चर्चाओ का एक समां बँधता हैं उन बातो पर , की कैसे देश को बदलने का सपना देखने वाले क्रन्तिकारी सरे आम लटकाये जाते हैं | एक दरिन्दगी के कैसे खुला तांडव होता हैं और तस्बीरों में दिखाए जाते हैं | हम रोज पढ़ते हैं किसी टूटे घर का मशाला और रोज हम भी मरते जाते हैं | वो दिन अब दूर नहीं जब जब रस्ते - रस्ते पर नंगी लासे होंगी और हम घर में पड़े उनकी चित्रो का तमाशा देख रहे होंगे | एक तस्वीर खिचेगी और हम बेच रहे होंगे | प्रिया मिश्रा :)
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आज - कल बड़ा अजीब सा सिलसिला चलता हैं | कोइ मरता हैं , किसी के हक़ के लिए रोज वो किसी के निशाने पर होता हैं किसी और के लिए | और जरा देखो तो इन बेशर्मो को हाय इनको दया नहीं आती लगे सजाने अपने घर को किसी और के जनाजे से | बड़े निष्ठुर हैं , अमानवीयता से भरे ये हमारे ही लोग हैं जिनके लिए कल किसी ने जान लुटाई और आज भी लूटा रहे हैं | पर इनको क्या ये बड़े बेसर्मी से उनकी तस्बीरों पे माले चढ़ा रहे हैं | मरता हुआ हर आदमी चीख - चीख के कहता हैं मत भूलो ये भूखी बिल्ली कल और शिकार को जाएगी आज मेरी हैं , कल तुम्हारी बरी भी आएगी !! प्रिय मिश्रा
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वो बैठ गया जमीं में मैं बून्द - बून्द बढ़ती रही रेत और पानी कहा मिला करते हैं || वो टिश की तरह चुभता गया मैं मरहम की तरह उससे लगी रही वो हिरदय का दाग बन के रह गया मैं धीरे - धीरे पिघलती रही || वो काजल था मेरी आँखों का जो , धीरे - धीरे सफ़ेद हो गया अब उदाश हैं आँखे वो सपनो सा उड़ गया सोचती हूँ अब रहने भी दू क्या कदम - कदम नापु जो धूल - धूल उड़ता गया || प्रिया मिश्रा :)
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तुमसे न हो पायेगा मेरे साथ चलना कदम से कदम मिला के तुमसे न हो पायेगा || मैंने आग पे अपने कदम रखे है समंदर में गोते लगाए है खारा पानी पिया है मैंने महासागरों को ललकारा है चल पावोगे ऐसे , मुझे लगता है तुम मोम के बने हो पिघल जाओगे तुमसे न हो पायेगा || मेरी आँखों में जंगल है इसमें ना देखना खो जाओगे फिर ढूंढ नहीं पावोगे खुद को तुम गुम जाओगे खुद से खुद का पता भी ना पूछ पावोगे तुम भटक जाओगे तुम न चल पावोगे तुम खो जाओगे तुमसे ना हो पायेगा || तुम प्रेम ना समझ पावोगे मैं तुम्हे समझा नहीं पाऊँगी तुम ख्याल में रहोगे मेरे मैं पानी की तरह तुम्हे छूना चाहूंगी तुम मृगमरीचका की तरह ग़ुम हो जाओगे मैं प्यासी रह जाउंगी तुम रेत की तरह आँखों में चुभ जाओगे मेरी आँखों में ठहर पाना तुमसे ना हो पायेगा || प्रिया मिश्रा :)
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तुमसे मिलकर तुमसे मिलकर तुम्हारा होना तुम्हारा होक तुममे खोना ये प्यार हैं या कुछ और है नहीं जनता जनता तो बस इतना हूँ अब कोइ फर्क नहीं रहा तुममे और मुझमे जो मैं हूँ वो तुम हो और जो तुम हो वो मैं हूँ कुछ अलग नहीं हैं तुम चाँद हो और मैं उसकी चमक तुम रात हो और मैं उसकी गहराई तुम सूर्य हो मुझमे आग हैं तुम इंद्रधनुष और मैं बरसात प्रिया मिश्रा :)
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ये चाँद हैं या किसी ने जी ललचाने को रोटी आसमान में टांगी हैं या कोइ मुझसे आँख मिचौली खेल रहा कभी रोटी बादल में छुप रही कभी एक टुकड़ा सा दिख रहा !! एक बच्चा भूख से बिलबिलाता हुआ अपनी माँ से पूछ रहा !! माँ क्यों नहीं वो रोटी तोड़ लाती कल से मैंने कुछ नहीं खाया क्यों वो मुझे ललचा - ललचा बदलो में छुप रहा !! प्रिया मिश्रा :)
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ये ढाई अक्षर का प्यार शब्द आदमी को बिश्वाश की नीव देता हैं और ये बिश्वाश जब टूटता हैं तो आदमी को खोखला कर देता हैं दोष न प्यार का हैं न बिश्वाश का दोष वक़्त का हैं जो हर समय धोका देता हैं जब भी कदम बढ़ाना वक़्त की चाल नाप लेना जरा मुश्किल हैं समय की गति से गतिमान होना एक मोड़ आएगा जहाँ वक़्त चाल दिखायेगा जो आज मिला हैं चाँद वो कल खो जायेगा नाराजगी रहेगी वक़्त मुस्कुराएगा तुम रोओगे वो और रुलाएगा सिसकिया तेरी उसके कानो की धुन हैं तभी तो वक़्त तुझे रुला के आज भी मौन हैं || प्रिया मिश्रा :)
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लो फिर एक पौधा सुख गया आज कुछ टुटा हैं ऐसा जो कभी जुड़ न पायेगा जब भी उदाश होंगी आँखे वो मंजर याद आएगा बादल बरष के सुख जायेगा बशंत आके लौट जायेगा सावन भी आग लगाएगा जब भी उदाश होंगी आँखे वो मंजर याद आएगा || एक चाह थी मन में एक आश जो अभी जन्मा था साँस भी न ले पाया वो पौधा, जिसके बीज कल लगाए थे मिटटी ही बंजर निकली जहाँ हमने हल चलाये थे एक और सपना टूट गया लो फिर एक पौधा सुख गया || प्रिया मिश्रा :)
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अपराधबोध मैं अपराधी की तरह खड़ी थी वो मेरे अपराध गिना रहा था बात विश्वाश की थी वो मेरे अंतर्मन को कुचले जा रहा था जैसे उठता हैं भवर समंदर में मेरे हिरदय भी फटा था मेरी आँखों से बहता नीर कहा उसे दिखा था मैं रोती रही वो अपराध गिनता रहा पहले अपराध में उसने मेरी जमीर नाप ली दूसरे में मुझे , हिरदय बिहीन कर दिया तीसरे में सांसे छीन ली और मैं अपराधी की तरह खड़ी थी एक अपराधबोध लिए ||
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कौरव संघार कौरव राज्य जब चमका था धरती पर न्याय तब पनपा था राजा शांतनु के राज्य में सब मंगल सब कुशल था|| आई फिर भीष्म की बारी पशुराम शिष्य ने शक्ति अर्जित की पर निकले वो भी मनुष्य अभिमानी कर डाली एक भूल अनजानी ले आये हर को नारियो को एक रह गयी उसमे अपमानित शार्प तभी कौरव कुल को लगा था तभी तो दुर्योधन जन्मा था एक और श्राप लगाने को कौरव कुल को मिटने को लिए जन्म दुरुयोधन ने नारी अपमीनित कर जाने को भरी सभा में कुलवधू उतारी, निनानवे भाई बैठे थे सभा सारी मौन थी चीख रही थी द्रोपदी , जो नारी अर्धनग्न थी भरी सभा जो मौन थी उसे शार्प नारी का लग गया फिर न ऊगा चमका सूरज अन्धकार, कौरव समाज डूब गया हो गयी सभा मौन हो गया नाश कुरु कुल का एक नारी का शार्प ले तू कहा तक मनुष्य जायेगा जहा भी जायेगा मारा ही जायेगा ले तुझे मैं शार्प देती मेरी मन जो चोट हैं वो चोट तू भी खायेगा जो नारी का अपमान करेगा वो मनुष्य मारा जायेगा अंत तेरा फिर भी न होगा तू तड़पता रह जायेगा जैसे कौरव मरे गए थे वैसे तेरा विनाश भी आएगा || प्रिया मिश्रा :)...
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"वो एक मेरी गली की लड़की " वो एक मेरी गली की लड़की मासूम चंचल ओश की बून्द की तरह पाक वो एक मेरी गली की लड़की || काली - काली आँखे, चमकता चेहरा सुर्ख होठ काले गेषु सात रंगो में डूबी वो एक मेरी गली की लड़की || मैं मिलु कभी उससे ये ख्वाब लेके जिया करता हूँ वो मुझसे अनजान है मेरी पहचान गहरी है वो मेरी दिल में नहीं मेरी आत्मा में ठहरी है वो , शोख , चंचल ओश के बून्द की तरह पाक वो एक मेरी गली की लड़की || प्रिया मिश्रा :)
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इश्क क्या है इश्क क्या है हम- तुम जो जुड़े हैं वो धागा इश्क है इश्क क्या है हम - तुम जो जुदा है एक दूसरे से तुझको - मुझको सँभालने को वो मज़बूरी इश्क है || इश्क कोइ शब्द नहीं एक एहसास है एक भरोसा है जो मुझे तुझपे है और तुझे मुझपे है इश्क एक बच्चे का खिलौना नहीं उसकी मुस्कराहट है जो भर देती है जीवन एक बेजान शरीर में इश्क एक इंद्रधनुष है जिसमे सात रंग है और सब मिलके सफ़ेद है साफ , पवित्र और कोरा || प्रिया मिश्रा :)
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मैं तुमसे तुम्हे मांगती हूँ || मैं तुमसे तुम्हे मांगती हूँ ऐसे , जैसे , कोइ याचक दान मांगता हो एक भिक्षा देदो मुझे तुम लौटा दो|| ये तुम्हारी महल - अटरिया नहीं चाहिए ये तुम्हारा हीरो का हार नाग सा डसता इसकी जहर से मुझे बचा लो मुझे तुम लौटा दो || आज जो कोइ पुण्य रहा हैं मेरा , वो पुण्य मैं तुमपे खर्च करना चाहती हूँ तुझे पुरे ब्रह्माण्ड से मांगना चाहती हूँ मेरा आँचल दुआएँ मान रहा तुम फुल बन के आ गिरो मेरे दामन में आ बसों मेरी आंखियो में एक भिक्षा देदो मुझे तुम लौटा दो आज मैं ईश्वर से अपना हक़ मांगती हूँ वो हिस्सा जो मेरा हैं उसे लौटा , मुझे मेरा आज , मेरा कल लौटा दो , मुझे तुम लौटा दो || एक वादा कर के जुड़ जाओ मुझसे , की एक वादा निभा दो मुझे तुम लौटा दो प्रिया मिश्रा :)
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तेरी गली से मैं रोज गुजरता हूँ !! और तेरे घर के पास जा के अपनी यादो के गुलदस्ते सजाता हूँ !! अब तालो पे जाले लग आये है !! जैसे हमारे रिस्तो में लगे है !! और दिवार के बीचो बिच एक नन्हे पौधे ने जन्म लिया है अभी अभी आँख खोली है उसने !! जैसे हमारे बिच दूरियों का बीज उग आया था !! लेकिन एक चीज आज भी वैसे ही है तुम्हारे कमरे खिरकिया आज भी बंद रहती है पहले की तरह कोइ आ जा नहीं सकता , तुम्हारे दिल की तरह इसमें भी !! और मैं बेवजह ही यहाँ रोज आके दरवाजा खटखटाता हूँ आदतन !! प्रिया मिश्रा
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सपने में कहानी !! :) :) मैं एक कहानी लिखना चाहती थी !! ये एक पुरानी बात हैं !! पर वो इक्छा कही न कही दबी हैं !! सोचती हूँ कुछ सपने में ही देख लू !! लेकिन दीखता कुछ नहीं !! कभी- कभी कुछ ख्याल आता भी हैं जैसे ख़ाली जिंदगी के बारे में ही लिख दूँ!! अपनी न सही किसी और की !! पर वो भी अभी अधूरा ही हैं !! एक नई अच्छी सुन्दर सी डायरी में कुछ अधूरा लिखना भी नहीं बनता !! करू क्या ये भी नहीं सूझता !! पर हर रोज सोचती थी मुझे सपना क्यों नहीं आता कुछ अच्छा सपना एक नई कहानी का सपना !! हर रोज सोचते सोचते सो जाती थी !! कोइ सपना नहीं दीखता था !! लेकिन कल दिखा एक सपना उसमे कहानी और फिर जाने कितनी कहानियाँ !! एक अंगूर की एक लता से एक फल जमीं पर गिरा कोइ लेने न आया इस बचे फल को !! आज कल कहाँ किसी के पास टाइम हैं बगीचे की सैर करने को बस यूँ ही सैर के नाम पर चार दौड़ लगा आते हैं कही आस - पास की !! आज कल जैसे माँ -बाप बच्चों के लिए तड़पते हैं !! वैसे ही प्रकृति मानवता के लिए !! वो फल भी गिर के इंतजार करता रहा कोइ आएगा ले जायगा !! कोइ न आया !! पहले थोड़ी उसपे धूल जमी फिर जरा सी बूंदा बांदी...
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हर रात के बाद सुबह होती हैं हर सुबह की एक शाम होती हैं हर शाम के बाद रात और फिर हर रात के बाद सुबह ... हर क्रिया की एक अलग प्रतिक्रीया और हर प्रतिक्रीया के एक अलग रूप हर रूप में एक और रूप हर चहरे में एक और चेहरा कुछ खामोश कुछ झूठा कुछ गहरा कुछ फरेबी कुछ जालसाजी अजीब हैं थोड़ा पर हकीकत हैं और हकीकत भी कितना खबर नहीं बस इन्ही छुपी बातो में मेरी भी एक प्रतिक्रीया हैं मेरी ख़ामोशी ........... प्रिया मिश्रा
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जब लोग मुझसे कहते हैं मैं तुझे अब जानने लगा हूँ जाने क्यू एक अजीब सा डर मन को घेर लेता हैं !! अपने लिए नहीं उसके लिए की ये फिर भटकेगा मेरी छाया को भटकायेगा और फिर एक दिन कहेगा मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ मैं वैसा आदमी नहीं हूँ और मेरे सामने आकर मुझसे मेरे ही रूप को एक गलत प्रतिरूप , दिखा के लौट जायेगा फिर वही जहाँ से आया था भटकता हुआ सा और फिर कही और भटकेगा !! प्रिया मिश्रा
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दर्द ही दर्द हैं जीवन में एहसास हैं बस एक कुछ टुटा हैं खुद में की नजर नहीं आती वो नब्ज़ जो टीश दे जाती हैं क्या कहे क्या हैं जीवन में बस इतना जाने दर्द ही दर्द हैं जीवन में || कल की थाली उलटी पड़ी हैं रुखा - सूखा आँगन पड़ा हैं उदाश सी जिंदगी के कोने में कोइ एक कोना भींगा पड़ा हैं अब भींग भी जाये सारा जहाँ तो क्या गम हैं की नीर ही नीर हैं अखियन में , दर्द ही दर्द हैं जीवन में || छुपा लूँ खुद को ऐसा कोइ अँधेरा बताओ रौशनी से अब मेरा नाता हटाओ की चाँद से अब कोइ वास्ता नहीं चांदनी नहीं आती अब सपनो के नैनन में दर्द ही दर्द है जीवन में || बादलो का बरषना , इस बार न हो पायेगा जो होगा वो डूबा के जायेगा अब कहाँ वो पहली वाली बांध होगी जो बांध लेगी मुझे इस बार किनारा तक कट जायेगा अब हम रह जायेंगे सिर्फ बतियन में , दर्द ही दर्द हैं जीवन में || प्रिया मिश्रा :)
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माँ माँ मैं आपसे कितना भी प्यार करू कम हैं क्युकी आपका उससे जायदा होगा मेरे लिए यहाँ सब कुछ हैं बस आप नहीं हो , तो कुछ भी नहीं हैं आपकी कमी पूरा करे ऐसा कोइ नहीं और आप भी मेरे पास नहीं || इस बड़े से घर में सिर्फ चारदीवारी हैं और इस चारदीवारी में खालीपन , उस खालीपन , में मैं आपको ढूंढ़ती हुई आपके प्यार को ढूंढ़ती हुई || यहाँ बड़े से बिस्तर पे बड़े से कम्बल को लपेटे मैं जब सोती हूँ तो भी अकेले ही रहती हूँ क्युकी , जब वो कम्बल आधी रात में गिर जाती हैं , तो कोइ उसे आपकी तरह प्यार से नहीं डालता मुझपे प्यार से सर नहीं सहलाता और माथा चुम के कोइ यु प्यार से निहारता नहीं सन्नाटा रहता हैं और मैं खामोश रहती हूँ || भूख लगती हैं तो नूडल्स बन जाते हैं प्यार वाली रोटियां अब नसीब नहीं होती वो सोंधी सी मिट्टी के चूल्हे पर प्यार सी सिकी रोटी आपके हाथो की उसे कौन से पैसे से खरीदू कोइ कीमत नहीं उनकी तभी तो कीमतों में उलझ कर सुलझ नहीं पा रहे || क्या कहूं माँ आप बहोत याद आ रहे || प्रिया मिश्रा :)
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ये कैलेंडर जो हैं न रोज तारीखों के कपड़े बदलता हैं !! कभी इकीस पहना कभी दो पहना और हर माह अपना घर बदल लेता हैं आज जनवरी में हैं , कुछ दिनों बाद मार्च में फिर ओक्टुबर और फिर से नए नए तारीखों के कपड़े बदल कर ये जनवरी में आ जायेगा !! ये किसी का नहीं और कोइ इसका नहीं लोग भी तो इसका उपयोग सिर्फ दिन गीन ने के लिए करते हैं आज सोमवार हैं फलाना तारीख हैं जैसे अगर ये न होता तो सोमवार आता ही नहीं और नहीं तारीखे बदलती लोग भी इसे एकदम संभाल के सबसे ऊपर की किल में टांगते हैं कही फाटे न कुछ हो न और कैलेंडर तन के वहाँ आरामसे बैठा रहता हैं , कोइ बुलाएगा कोइ साधन भेजेगा तो ही आएगा वरना टंगा हैं इसको क्या पड़ी हैं कोइ मरे कोइ जिए और हम भी कम नहीं हैं जब तक जरुरत हैं तबतक इसके सारे नखरे उठाते हैं और फिर, या तो ये यु ही फेक दिया जाता हैं या फिर नए साल की मिठाईया लपेट- लपेट के दी जाती हैं बस इतनी सी कहानी के लिए ये कैलेंडर पैदा होता हैं और गुजर जाता हैं !! प्रिया मिश्रा
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फूल और आसमान का बादल फूल जो कल ही खिली हैं उसे भवरे नहीं भाते है || वो बादल को तकती है जो आसमन पे छाते है || वो मुस्कुराती है बादल छट जाता है वो उदाश हो जाती है बादल बरस जाता है बादल भी उसे देखते गुजरता है कैसे वो खिलती है जब बादल बरस जाता है कैसे उसके पंखुरियों पे कुछ बुँदे ठहर जाती है और वो शर्माती है फूल जमीं की हैं पसंद उसे आसमान है बादल आवारा है लेकिन बरसता फूल पर ही है ये जमीं और आसमान का प्यार हैं इसलिए खालीपन दीखता है और उस खालीपन में सिर्फ इन्तजार होता हैं प्यार वाला इन्तजार || प्रिया मिश्रा :)
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साल के नए दिन साल के नए दिन में कुछ नया करो || सब कुछ पुराना भूल जाओ बस , अपने दिल को याद रखो उसमे कोइ बसा हो उसे महसूस करो बाकि सब भुला दो साल के नए दिन में कुछ नया करो || एक सपना नया देखो , आँखे खोलो और उसे जी लो सपने को पूरा करने का एक और सपना देखो और सपने को हकीकत कर लो साल के नए दिन में कुछ नया करो || अलविदा ना लो उन लोगो से जो आपके लिए जीते हैं प्यार से उनको गले लगा लो जो आपके आँखों की नमी , आपके मुस्कुराते चेहरे में भी देख लेते हैं साल के नए दिन में प्यार से गले लगा लो मुस्कुराते चेहरे को चमकती आँखों को और कुछ टूटे सितारों को खुद को बाँट दो थोड़ा - थोड़ा जिंदगी के बदलते पल के साथ कुछ की आँखों की चमक बन जाओ किसी एक आरजू बन जाओ साल के नए दिन में कुछ नया करो || प्रिया मिश्रा :)
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इश्क का समंदर मैंने आँचल में समेटना चाहा इश्क का जो समंदर आँचल मैला सा हो गया रेशे आज भी भींगे से हैं कोनो के , और, आँचल में धुप लगने से जल गयी हैं ना गीली हैं ना , सुखी हैं समंदर तो बंधा नहीं छींटे आये समंदर के खारे से, आँचल पे गिरे दाग बन गए हाथो पे गिरे छाले पड़ गए आँखों में पड़े तो सपने बन गए पुरे न हुए समंदर को वापस कर दिए लेकिन आँचल आज भी गिला हैं और इश्क का समंदर आज भी उफान पर हैं || प्रिया मिश्रा :)
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मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहा हूँ मैं संग हूँ सूर्य के, मैं उसकी रोशनी में डूबा हूँ !! मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहा हूँ ........ मैं रिक्त सा चला था , कांधो पे बस एक बोझ सा टंगा था मैं नंगे पाँव बस चल पड़ा था संग लिपट गयी मेरी वो धूल वो कनेरी वो लिपट के मेरे साथ हवा भी तो चली थी खाली सड़के न हैं, वो मंजिल हैं वो मेरी मैं राही नहीं हूँ, इनका ये संगनी हैं मेरी मैं रुका हूँ , मैं ठहरा हूँ , मैं चलता और मैं चलता चला हूँ !! मैं अकेला चला हूँ लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ ...... हैं वो राह भी सुना , जहाँ न कोइ चला हैं मेरी कदमो की आहट से वो सड़क भी चल पड़ा हैं जो था कबसे सुना कबसे सन्नटा पी रहा था मेरे थकान की ओस से वो मधु पी रहा हैं !! मैं जीवन बन चला हूँ खाली सुखी नदी का , की अब उसमे भी जरा सा जल सवामी भक्त बन खड़ा हैं !! मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ !! हैं संग वो किनारा जो नदियों को बांधता था आज नापता हैं कदम मेरे जो जर्जर हुआ पड़ा था !! हैं वो झरना से गिरता पानी और उस से झांकता पत्थर सब कर रहे हैं स्वागत , और मैं शान से चला हूँ !! कोइ...
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हमने यादो के मोती सजोयें कुछ तस्बीरों की माला बनाई और उस से हमने पुराने वक़्त को विदाई दी !! कुछ पुराने पन्ने कल की शाम में में डूबा दिए !! आज एक नयी सुनहरी धुप में अपनी अपनी आज को जरा नई चमक देने को हमने कल की सारी रोशनी उस पुराने वक़्त को लौटा दिया !! हमने जरा सा , काला काजल लिया उसे शाम बना के हमने रात में कल को लौटा दिया !! आज की चांदनी हमने अब बटोरनी सुरु की हैं आज का नया किताब पढ़ना सुरु किया हैं !! आज को गले लगाना सुरु किया जरा मुश्किल था बदलना पर पुराने ने हमें सिर्फ यादें दी हैं !! हमने उसकी एक गाँठ बनाई और आसुओं के समन्दर में डूबा दी !! अब जो नया आया हैं नया सबक दे जायेगा और देखते -देखते ये वक़्त भी गुजर जायेगा कल रहेंगे तो कल फिर इन पुराने पल को डूबा के एक नया वक़्त अपनाएंगे हम रोज नई सूरज उगाएंगे हर साल यादो की मोती की खेती करेंगे हर साल उनकी माला बना के पुराने वक़्त को विदा करेंगे !! और नए वक़्त को गले लगाएंगे प्रिया मिश्रा :)
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हमारा प्रेम हमारा प्रेम तब शुरू हुआ था जब पता भी ना था प्रेम क्या होता हैं वो स्कूल के बस्ते लिए आती थी और फिर हम बन जाते हैं एक सफर के एक राही हमसफ़र बनने जैसा तो सोचा भी नहीं था कुछ लेकिन आज हम एक थाली में एक रोटी के आधे - आधे टुकड़े में जो स्वाद लेते हैं वो स्वाद सायद ही कही मिला हो || वो अब पहले जैसे नहीं रही कमर झुक गयी हैं हाथो की मेहँदी बालो में आ गयी हैं मैं भी अब पहले जैसा नहीं रहा लेकिन प्रेम आज भी हमारा पहले जैसा ही हैं || न उसके बालो की सफेदी ने मेरे प्रेम को कम किया न मेरी खर्राटों ने उसके प्रेम को || आज भी इतने बरसो बाद एक ही थाली लगती हैं और आधी - आधी रोटी साँझा करते हैं हम , जिंदगी की तरह आधा - आधा इसलिए न वो बूढी होती हैं न मैं बूढ़ा होता हैं || सिर्फ तारीखों के साथ वक़्त बदला हैं हमारा कैलेण्डर आज भी सोलह साल का ही हैं || प्रिया मिश्रा :)