मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहा हूँ
मैं संग हूँ सूर्य के, मैं उसकी रोशनी में डूबा हूँ !!
मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहा हूँ ........
मैं रिक्त सा चला था , कांधो पे बस एक बोझ सा टंगा था
मैं नंगे पाँव बस चल पड़ा था
संग लिपट गयी मेरी वो धूल वो कनेरी
वो लिपट के मेरे साथ हवा भी तो चली थी
खाली सड़के न हैं, वो मंजिल हैं वो मेरी
मैं राही नहीं हूँ, इनका ये संगनी हैं मेरी
मैं रुका हूँ , मैं ठहरा हूँ , मैं चलता
और मैं चलता चला हूँ !!
मैं अकेला चला हूँ लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ ......
हैं वो राह भी सुना , जहाँ न कोइ चला हैं
मेरी कदमो की आहट से वो सड़क भी चल पड़ा हैं
जो था कबसे सुना कबसे सन्नटा पी रहा था
मेरे थकान की ओस से वो मधु पी रहा हैं !!
मैं जीवन बन चला हूँ खाली सुखी
नदी का , की अब उसमे भी जरा सा जल
सवामी भक्त बन खड़ा हैं !!
मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ !!
हैं संग वो किनारा जो नदियों को बांधता था
आज नापता हैं कदम मेरे जो जर्जर हुआ पड़ा था !!
हैं वो झरना से गिरता पानी और उस से झांकता पत्थर
सब कर रहे हैं स्वागत , और मैं शान से चला हूँ !!
कोइ मनुस्य नहीं साथी , कोई भाव न हैं कोइ जाती
मैं खुद को नापता मैं खुद को तोलता मैं चला जा रहा हूँ !!
मैं अकेला चला हूँ , लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ !!
मैं चांदनी में भींगता मैं ओस में नहाता मैं भर - भर के
गगरी कुछ फल चुनता उठता
झुकी पड़ी हैं डाली, फूलो से लदने वाली
हैं मना राही स्वम्बर जैसे मैं उनका प्रियतमा हूँ !!
कुछ गा रहे हैं पंछी कुछ चहक रहे हैं
कही मोर नाच रहा हैं ..
लगता हैं मैं, मधुशाला में आ चला हूँ !!
मैं अकेला चला हूँ लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ !!
हैं दूर तक उठा वो पहाड़ ऊंचा - ऊंचा
कर रहा मेरी रक्षा दोनों बाजुए फैला कर
मैं अब तनहा नहीं, मैं अब अकेला नहीं
वो नदी कर रही हैं मेरा स्वागत
मधुर तान कुछ सुना कर
दूर तक फ़ैली हैं डालियाँ
सामियाने के जैसे , मैं छाँव में खड़ा हूँ !!
मैं अकेला चला हूँ ,लेकिन मैं अकेला कहाँ हूँ !!


प्रिया मिश्रा

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