अगर एक आदर्श समाज की नींव रखनी है... तो दुब को बिना कुचले .... हर एक फूल को सूखने से बचाना होगा || प्रिया मिश्रा :)
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Showing posts from November, 2020
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मैं रात की रानी जब आई मिलने दुब से दुब की पीड़ा मुझसे देखी ना गयी देखा कही तो दुब बड़ी हरी -भरी थी कही उसका रंग पीला सा था कही दिखा ही नहीं उसका अस्तित्व बस मिट्टी का रंग ही दिखा ये दुब के ह्रदय में कितने रंग थे और कैसे छुपा के रखे थे उसने अपने एक रंग को दूसरे रंग से फिर भी मुस्कुरा रही थी || प्रिया मिश्रा :)
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ये लोग जो कह देते है किसी को .... की लोग अपनी जरूरतों में हमसे मिला करते थे हो जाये अगर पूरी जरूरते तो सबसे मिल के मेरी शख़्सियत को भला -बुरा कहते थे लिखना चाहूंगी मैं दो लाइने उनके लिए ... जो बेवजह बदनाम हो गए ..... कह दिया किसी ने उनको की वो अपनी जरूरतों में मुझसे वो मिला करते थे तू बता ज़रा वो किसी की शख्सियत पे ऊँगली उठाने वाले जिसपे तू तोहमत लगा के खुस है ... की... वो,, जरूरतों पे तुझसे मिला था ... तू गीन के बता दे ... अब तक उसने कितने ख़त तेरे आँगन में अपने फ़रमाइसो के डाले है || प्रिया मिश्रा :))
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जब कैकई ... अपनी ग़लतियों का पछतावा करती है और कहती है....श्री राम से हे ,, पुत्र लौट चलो अब महल में ... अयोध्या तुम्हारी राह तक रही ... तब उनके इतना कहने भर से क्या दशरथ स्वर्ग से वापस आ गए थे ? या ,, जब भरत प्रभु चले थे... नंगे पाँव लेकर खड़ाऊं भगवान् का तब उनके पैरों से जो लहुं बहा था ,, उस लहुं से क्या धूल गया कलंक कैकई का... ना ,, नहीं हुआ था ऐसा ना... होगा कभी ऐसा कैकई कल भी कलंकित थी कैकई आज भी कलंकित है || प्रिया मिश्रा :))
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किसी भी रिश्ते को मजाक के रूप में समाज में प्रस्तुत करना और किसी भी रिश्ते में मर्यादा रखते हुए उसे आदर पूर्वक प्रस्तुत करने में फर्क होता है || प्रिया मिश्रा :)) जो कहते है तुझसे की ... मैं तुझे ज़माने से छिपा के रखती हूँ क्योंकि तुझे एक दिन बिसरा दूंगी तो उनसे कह देना जाके मैं कोइ तेरी गलियों की मुसाफिर नहीं हूँ जो तेरी गलियों से गुजर जाउंगी तू मेरा बेशकीमती हीरा है और ,,मैं जानती हूँ मेरे अनमोल हीरे को और मैं ये भी जानती हूँ की ,, बेशकीमती हीरों की सरे नुमाईश नहीं की जाती प्रिया मिश्रा :))
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जब छेड़ रहा था कोइ,, तुम्हे बसों में तो उसके गालो पे तुम्हारे थपड़ के निशाँ दिखने चाहिये थे || जब तुम्हे कोइ अकेले रास्ते में देख कमेंट कर रहा था ,, तो उसके गालो पे तुम्हारे थपड़ के निशाँ देखने चाहिये थे || जब कोइ तुम्हे बीवी नहीं अपनी दासी समझ बेते उठता था ,, तो उसके भी शरीर पे उन बेतों के घाव दिखने चाहिये थे || नहीं दिखे उसी का परिणाम है ये खबरे जो आये दिन आती है कब से चला आ रहा है कब से बिक रहा है इन खबरों से अख़बार जो नहीं बिकने चाहिये थे || प्रिया मिश्रा :))
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मैं भटक चुकी हूँ जब मैं शान्त खड़ी थी ,, उस समंदर के किनारे जो एक शहर को दो भागो में बाँटता था एक शहर चमक -दमक वाला और एक अँधेरी गली में हुआ करता था तू निकला चमक वाले शहर का मैं ठहरी अँधेरी गली की बता हम कैसे मिलेंगे तुझे ,, पहचान है रास्तों की तो अब की दुरी तू तय कर मैं भटक चुकी हूँ || मैं भटक चुकी हूँ कही इन अँधेरी गलियों में ये समंदर भी उफान पर रहता है मेरी आवाज तुझ तक जाती है तो ,, अब की दुरी तू तय कर मैं भटक चुकी हूँ || मेरा हाथ तुझ तक पहुच नहीं पाता मेरी बात तुझ तक पहुँच नहीं पाती तेरे शहर में शोर बहोत है मैं बस ,तेरे से दो फैसले पर जो शोर करता समंदर पड़ा है वहां खड़ी हूँ इन्तजार कर रही हूँ तो अब ,, तू दुरी तय कर मैं भटक चुकी हूँ || ये चाँद भी लगता है तेरे शहर का अलग सा है मेरे शहर का अलग सा हैं नाम बाँट के ये भी तेरे शहर में पूर्णिमा सा चमकता है मेरे शहर में अमावश सा छुपा रहता है सितारों की बात क्या करू ये तो निकलते ही नहीं लगता है ,, तेरे कदमो संग लिपट कर ये भी आसमान से विदा हो गए मेरे शहर से लापता हो गए मैं इन शरद रातो में ऐसे ,,जैसे पानी बर...
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मेरी नज़्में मेरी शक़्ल इख्तियार करती हैं ये शब्द हैं मगर फिर भी मुझे इंसानों से ज्यादा प्यार करती हैं।। प्रिया मिश्रा :) मेरे लिए तो हर साख़ से टुटा पत्ता मेरा है तू बता,, मेरी हैसियत बताने वाले जब कल हवाएं तेज थीं तेरे पैरों तले कितने रौंदे गए हैं मेरे लिए तो हर साख़ से टुटा पत्ता मेरा है।। प्रिया मिश्रा :))
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ख़ाक से उठकर गुल गुलिस्तां की बारात सजा लेता हूँ मैं आदमी हूँ रह रह कर अपनी औक़ात भुला देता हूं | रात के अंधेरो में मैंने ढेरो उदाश तारे देखे मैं उन सभी उदाश तारों को समेट अपना एक मुस्कुराता चाँद बना लेता हूँ | आधे से ख़्वाब टूटकर जगा देते हैं आधी रात को मैं पूरी रात उन आधे ख़्वाबों पे लुटा देता हूँ | मैं आदमी हूँ रह रह कर अपनी औक़ात भुला देता हूँ || दरिया को समुंदर और समुंदर को दरिया बताते हैं लोग मैं घर के बाहर पैरों तले रौंदे जमीं के घड़े में कमल खिला देता हूँ मैं आदमी हूँ रह रह कर अपनी औक़ात भुला देता हूँ।। प्रिया मिश्रा :))
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फिल्म जगत के प्रभाव और दुष्प्रभाव मैं जब फिल्म जगत को देखती हूँ सोचने पर मजबूर हो जाती हूँ की ऐसा क्या है इस जगत में जो सब पागल हुए जा रहे है | एक तरह से देखा जाये तो जैसे हम सब अपना कार्य करते है , वैसे ही ये लोग भी अपना कार्य करते है , इनका कार्य इनकी जीविका का साधन है | इनके एक साल में १० फिल्मो रिलीज़ करने से हमारा पेट नहीं भरेगा | नाही भरेगा उन सारे किसानो का जो की भूख से बेहाल हैं | मैं मानती हूँ की फिल्म जगत के लोगो ने हजारो किशानो की मदद की | लेकिन मेरा ये पूछना है उन सभी समाज के ठेकेदारों से की ये नौबत ही क्यों आई की हमारे अन्नदाताओं को किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ा | मैं पूछना चाहती हूँ , उन तमाम राजनेताओ से की देश की तरक्की कैसे होगी अगर देश के अन्नदाता ही ना रहे तो | एक भूखा देश किस खम्भे पर खड़ा रहेगा | ये अमीरी की कोठी भी तभी अच्छी लगती है जब पेट भरा हो | लेकिन हमारे यहाँ तो हमारा पेट भरने वाला ही भूखा सो रहा है | उनके बच्चे शिक्षा को तरस रहे है | इस देश के बहोत कम लोगो ने इस मुद्दे को उठाया है | बहोत कम लोगो ने इस मुद्दे को...
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“क्या बात है”? क्या बात है.? आज सीटी बज रही है दिल में उमंग है पाँव जमीं पर नहीं हैं क्या बात है ? कुछ बात नहीं बस ज़िंदगी जीने का सलीका सीख रहा हूँ बेबजह कैसे मुस्कुराऊँ वो तरीका सीख रहा हूँ सब तो वजह ढूंढ़ते हैं मै वजह तो नहीं ढूंढ़ता पर बेवजह भी नहीं रहता मैं रात की चांदनी में कल का सूरज देखता हूँ और कोई बात नहीं है मैं ... बस ज़िंदगी जीने के तरीके ढूंढ़ता हूँ।। ये कमाल की बात है कल हँसा था वो याद नहीं कई साल पहले रोया था वो आज तक रो रहे हैं जो मिला था वो याद नहीं जिस से बिछड़े थे वो टीश आज भी उठती है कल क्या खाया था याद नहीं कब क्या नहीं खाया था वो टीश खाये बैठे हैं मैं इन सब समस्याओ को हवाओं में उड़ा के उस उड़ते धुएँ में मुक्ति ढूंढ़ता हूँ और कोइ बात नहीं है मैं बस पाँव रखने भर की जमी ढूंढ़ता हूँ।। क्या बात ...
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उर्दू के अल्फ़ाज़ों को लफ़्ज़ों में लाने को ताउम्र तरसते रहे एक करिश्मा सा हुआ और हम वहीं ठिठक से गए इश्क बन के आया उस्ताद हम लम्हा-लम्हा उर्दू सीखते रहे जब हुआ इश्क़ का आगाज तब अल्फ़ाज़ लफ़्ज़ों में आ गए ज़ज़्बातों में सिमट कर फ़सानों में पनप गए हंगामा न हुआ न कोइ शोर हुआ कमबख़्त इश्क़ पर किसका जोर था बस समझिये इश्क ही था उस्ताद और हम रफ्ता-रफ्ता उर्दू समझ गए।। प्रिया मिश्रा :))
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मेरे ह्रदय में है, एक और ह्रदय ,, जिसे छू ना पाया अब तक कोइ उस ह्रदय में एक और ह्रदय ,,वो ह्रदय मेरा ...पिंजरे में बंद मासूम बच्चे जैसा,, सच्चा हैं लेकिन खाली सा है .. वो जैसे कैदी रहते है ना... या जैसे परिंदे बंद रहते है, अपने पिंजरों में वैसे रहता है ... जो नहीं करना चाहता किसी से अब कोइ फ़रियाद,, ना वो कोइ झूठी बातों का दिलाशा चाहता है ... नहीं कोइ वादा लेना और देना चाहता है | वो बस जिस पिंजरे में बंद है उस से रिहाई चाहता है .... वो छोटा सा नन्हा सा ह्रदय मेरा ...रोज उस पिंजरे से अपना सर टकराता है और फिर आहात होके पिंजरे में ही खो जाता है || प्रिया मिश्रा :)
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बच्चो के बिकास में समाज और माता पिता का महत्व जब हम अपने बच्चों का लालन-पालन कर रहे होते हैं ... तब हमारे मन में क्या विचार आते हैं?........ हम किसका उदाहरण उनके सामने रख के उन्हें उसके जैसा बनने के लिए कहते हैं..? हमारी कौन सी गलतियों का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ? टेलीविजन का हमारे बच्चों के जीवन में क्या महत्व है ? माता - पिता को कैसा होना चाहिए .. इसपे चर्चाएं क्यों नहीं होतीं ?.... हम बचपन समझ कर बच्चों की नासमझियों को अनदेखा करते हैं और बाद में उसका क्या परिणाम आता है .... घरेलू झगड़ों का बच्चों की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है ? ऐसी कौन सी बात है जो बच्चे हमसे नहीं कर पाते .? .. जिसपे चर्चा होनी चाहिए ?? हम सभी ने इन विषयों पर कभी नही सोचा है .. ना ही हम कभी सोचना चाहते हैं .. क्यों कि हम सभी व्यस्त हैं अपनी खोखली दुनिया में .... खुद क...
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मैं ठहरी एक चंचल नदी सी तुम ठहरे समुद्र से गहरे और शांत तुममें डूबकर खो जाना मेरी चंचलता को विराम देता है......... प्रिया मिश्रा :)) कुछ बातें भुलायें नहीं भूलती और याद करने को दिल भी नहीं चाहता || प्रिया मिश्रा :) तू मेरी सारी अच्छाईयों सा है प्रिया मिश्रा :) जिस दिन तुम्हें लगने लगे ख़ाली सा तुम्हारा आँगन और ना सुनाई दे तुम्हें मेरे पायल के घुंघरुओं की आवाज़ तो ठहरना ज़रा आँगन के बीचोंबीच खड़े पारिजात के पेड़ के पास तुम्हें उसके पुष्पों में मेरे घुंघरू छुपे मिलेंगे। प्रिया मिश्रा :))
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|| राजनीति सिर्फ चर्चा का बिषय नहीं || वोट देना हमारा अधिकार है ......... लेकिन अधिकार का गलत उपयोग करना हमारा अधिकार नहीं है ............ हम हमेशा अपने फायदे के लिए ही सोचते हैं ...... क्या बढ़िया है हमारे लिए ... क्या ख़राब है हमारे लिए ....... या फिर सुनी - सुनाई बातों पर यकीं कर के ...... अपना कीमती मतदान कचरे के डब्बे में डाल देते हैं .... हमें वोट देते समय अपने पिछले साल के समय पर देखना चाहिए ....... बीते वर्षो में हमने जिसे अपना नेता चुना उसने हमारे लिए क्या किया ........ कितना किया ........ पहले के नेताओं के कार्यों से उसकी तुलना करनी चाहिए ........ पहले की तुलना में कितना विकास हुआ .... शिक्षा का स्तर कितना बढ़ा ... बेरोजगारी कितनी कम हुई ........ हमारे अन्नदाता के पक्ष में कितने फैसले लिए गए ....... भृष्टाचार कितन...
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मैंम ,, आपने इतनी अच्छी पुस्तक लिखी है .... राह का मुसाफिर ... इसमें आप क्या कहना चाहती है .... कुछ संछिप्त में बतायें... जी जरूर ,, इस कहानी में नाईका ने अपनी आप बीती लिखी है .... उसके ही शब्द दोहरा रही हूँ .... मैं जब - जब अकेली खड़ी रही हूँ ... अपने लिए .. बहोत अकेलापन रहा हैं तभी ,, एक अकेलापन एक डर सताते रहता है ....अकेले व्यक्ति को .... मैं उस अकेलेपन से लड़ती हुई आगे बढ़ती रही हूँ ... लेकिन मैं फिर भी आस्वस्त करती हूँ ... उन सभी लोगो को ... जो आज मेरे साथ नहीं खड़े है की ... कभी जीवन में उन्हें मेरे साथ की जरुरत होगी ... मैं सदैव साथ रहूंगी ... क्युकी मैंने जाना है अकेलापन क्या होता है ... जब आप खुद से और बहरी लोगो से भी अकेले ही लड़ रहे होते है ... जब हर आने जाने वाला ... गली का कुत्ता भी भोकना चाहता है ... तब अकेले लड़ना क्या होता है .... मुझसे पूछे कोइ .. मुझे इन सब बातों से बस सिख इतनी मिली है ... ईश्वर के अलावा आपके साथ कोइ नहीं ... लोग आपको नकारने में एक सेकंड नहीं लगाते है ... और अपराधी आपको ही ठहरा देते है..... ये मनुष्यो की प्रजातियां तब - तक आपक...
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मुझे कहानियाँ पढ़ना बहोत अच्छा लगता है .... लेकिन सुनना तब अच्छा लगने लगा ... जब से तुम्हे सुना है | वो जो तुम कहानियाँ सुनाते - सुनाते पूछते रहते हो ... सो गयी क्या ? ... सो ही गयी होती हूँ मैं ...... क्युकी मैं जीवन्त करना चाहती हूँ उस पल को जो कहानियों में शब्दो के रूप में बिखरा रहता है | आज ईश्वर से कुछ मांगना चाहती हूँ ... की यूँ पूरी उम्र तुम मुझे कहानियाँ सुनाओ और मैं तुम्हारे समीप तुम्हारे कंधे पे सर रख के सुनती रहुँ | सोचती हूँ जब तुम और मैं साथ -साथ होंगे ,, तब उस कॉफ़ी में उतनी स्वाद न होगी जितनी तुम्हारी कहानियों में होगी .... लगता है तुम्हारे पास आने के बाद मेरी कॉफ़ी की आदत भी जाती रहेगी ... मेरे दिन भर की भाग -दौड़ की थकान को तो तुम यूँ ही अपनी मीठी बातो से दूर हटा दोगे || सच कहूं मुझे उन कहानियों से कोइ लगाव ना होता है .... जो कुछ भी सुनती हूँ ... सिर्फ तुम्हे सुनती हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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रात की तरह ढलना सबको आता है सुबह की तरह खिल के आओ तो कुछ बात बने सवालों पे चर्चे बहुत चलते हैं सवालों के कुछ जवाब ढूंढे जाएं तो कुछ बात बने।। प्रिया मिश्रा :)) ये वक़्त एक दिन साँझ की तरह ढल जायेगा जो जीवन है अभी है || प्रिया मिश्रा :) मैं पूरा जीवन नहीं सोया एक दिन की सुकून की नींद के लिए और जब सोया तो उठा ही नहीं || ये सुकून की नींद जीवन मांगती है प्रिया मिश्रा :) ईश्वर के नाम एक पत्र लिखना चाहती हूँ और कहना चाहती हूँ हे ईश्वर मेरे मन के सारथी बनो मेरे जीवन का आधार बनो मेरे प्राण बन के मुझमे वास करो मेरे ह्रदय की धमनियों में धड़का करो मैं समूर्ण तुम्हे पाना चाहती हूँ मुझे अपने दासी के रुप में स्वीकार करो हे ईश्वर मेरे मन के सारथी बनो || प्रिया मिश्रा :) सम्पूर्ण संसार को स्वकार करने से अच्छा है स्वम् को स्वीकार करना || प्रिया मिश्रा :)
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पैरों की थकान मंजिलों को नहीं रोक पाती हार मन की हो तो जीतना मुश्किल है वरना लहू लगे पैरों ने खुद के लिए मंजिल तराशी है और दूसरों के लिए रास्ते बनाये हैं।। प्रिया मिश्रा :) ठहर जाती हैं...आँखें वहाँ पे...जहाँ पे कोई कह जाता है इन्जार करना मेरा मैं लौटकर आऊँगा।। प्रिया मिश्रा :) पुराने वक़्त को लौटाया नहीं जा सकता है परन्तु नए वक़्त की ओर पुराने वक़्त से शिक्षा लेकर कदम बढ़ाया जा सकता है।। प्रिया मिश्रा:)) किसी की देह के घाव को औषधि द्वारा मिटाया जा सकता है लेकिन किसी की आत्मा के घाव के लिए कोई औषधि नहीं बनी है।। प्रिया मिश्रा :)) न कभी खुद को और न ही अपनी कविताओ को रखना चाहती हूँ....मैं संकुचित मैं देना चाहती हूँ सम्पूर्ण आकाश और सम्पूर्ण धरती अपने शब्दों को और...