लो फिर एक पौधा सुख गया


आज कुछ टुटा हैं ऐसा
जो कभी जुड़ न पायेगा
जब भी उदाश होंगी आँखे
वो मंजर याद आएगा
 बादल बरष के सुख जायेगा
बशंत आके लौट जायेगा
सावन भी आग लगाएगा
जब भी उदाश होंगी आँखे
वो मंजर याद आएगा ||

एक चाह थी मन में
एक आश जो अभी जन्मा था
साँस भी न ले पाया
वो पौधा,
जिसके बीज कल लगाए थे
मिटटी ही बंजर निकली
जहाँ हमने हल चलाये थे
एक और सपना टूट गया
लो फिर एक पौधा सुख गया ||

प्रिया मिश्रा :)

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