हर रात के बाद सुबह होती हैं
हर सुबह की एक शाम होती हैं
हर शाम के बाद रात
और फिर हर रात के बाद सुबह ...
हर क्रिया की एक अलग प्रतिक्रीया
और हर प्रतिक्रीया के एक अलग रूप
हर रूप में एक और रूप
हर चहरे में एक और चेहरा
कुछ खामोश
कुछ झूठा कुछ गहरा
कुछ फरेबी कुछ जालसाजी
अजीब हैं थोड़ा पर हकीकत हैं
और हकीकत भी कितना खबर नहीं
बस इन्ही छुपी बातो में
मेरी भी एक प्रतिक्रीया हैं
मेरी ख़ामोशी ...........
प्रिया मिश्रा
हर सुबह की एक शाम होती हैं
हर शाम के बाद रात
और फिर हर रात के बाद सुबह ...
हर क्रिया की एक अलग प्रतिक्रीया
और हर प्रतिक्रीया के एक अलग रूप
हर रूप में एक और रूप
हर चहरे में एक और चेहरा
कुछ खामोश
कुछ झूठा कुछ गहरा
कुछ फरेबी कुछ जालसाजी
अजीब हैं थोड़ा पर हकीकत हैं
और हकीकत भी कितना खबर नहीं
बस इन्ही छुपी बातो में
मेरी भी एक प्रतिक्रीया हैं
मेरी ख़ामोशी ...........
प्रिया मिश्रा
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