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Showing posts from August, 2020
 कुम्भार के साँचे  में मेरा रूप नहीं जलते आवे जैसा ह्रदय है ,, मैं ठहरी मिट्टी की ढेर ना सुन्दर हूँ ना नदियों जैसी चंचल हूँ || आसमान की ताख से आया एक ,, सुनहरा परिंदा कहता कुम्भार से रहने दे ये नहीं कोइ कुंदन काया ,, इसे पानी सा बहने दे ये मिट्टी की ढेर तेरी गाँठ में मेरे बाँध के जाने दे मुझे उड़ने दे ,, सुन वो ,, कुम्भार ये कोइ तेरी बर्तन नहीं है न कोइ मूर्तिकार की संरचना की ललचती मिट्टी है ,, ये ,, ना कोइ कवी की कल्पना न कोइ मनुस्य की असाधारण  सी बुद्धि है ,, ये है ,, ईश्वर की पैरो की धूल कारन,, बस इतना रहा ये तेरे साँचे सी ना दिखती है || प्रिया मिश्रा :)) 
पत्नी का पत्र दूर कही जब शगुन उठती है मुझे याद आ जाता है वो ब्याह का अपना दिन कानो में पड़ती रहती है ढोलक की वो आवाज और फिर ,, मेहँदी की खुसबू हथेलियों में वो कथई  रंग वो महावर की लालिमा मेरे पैरो को आज भी याद है वो रंग तुम्हारे घर में पहला कदम ,, घूँघट में थी मैं वो चुन्नी लाल सी और साड़ी पिले रंग वाली जब गिरने को हुई कितने संभलते हुए संभाला था तुमने मैं शर्म से सिकुड़ गयी थी सब हँस रहे थे   अब तो वो सब पुरानी बात हो गयी लोगो के लिए हाथो की मेहँदी बालो में आ गयी लेकिन ,, अब भी वो युवती  ही राह तकती है तुम्हारी कहाँ बूढ़ा होने दिया तुमने मुझे,, आज भी तो संभाल के मुझको दिला देते जो की मैं तुम्हारे लिए वही हूँ || दूर होक भी कितने पास हो तुम क्या कहूँ,, देखो ना कितना बड़ा हो गया है तुम्हारा सपना अब करवट लेने लगा है वो पेड़ जो लगाए थे हमने मिल के वो अब सबको छाँव देने लगा है || सोचती हूँ करा दूँ उसका भी ब्याह किसी गुलदावदी से   वो अपना कनेर जो बड़ा होने लगा है तुम आ जाओ तो अबके बरस,, फिर से ढोल सुनूंगी मैं तुम्हारे बिना नहीं हो पता अब कुछ भी ,, खुद से संभलने की आदत नही...
मेरी आँखों से जो अश्रु बन के बह गया वो समंदर का नमक हो गया वो पहले से ही खारा था स्वभाव उसका उसके  अस्तित्व में बदल गया मैंने पैर धोये उस समंदर में फिर रेत में अपने पैरो को साफ़ किया अब रेत सने पैरो से गंगा के पास आई याचना की माँ आई ,, हमने उनसे मुझे शुद्ध करने की याचना की वो सफ़ेद से जल में   मातृत्व का दूध मिला के मेरा अभिषेक करने लगी एक शिशु की भांति मैं बिलख रही थी उन्होंने अपने स्नेह के आँचल में समेट लिया   और कहने लगी .. प्रेम पाप नहीं होता मैं क्या कहती मैं चुप ही रही फिर मौन तोड़ा   बोला माँ ,, स्त्री का आँचल अगर मैला हो जाए पिता का घर भी पराया हो जाता है इस जग की क्या बात करू .. ये तो छली है  क्या आप समेट लोगी मुझे मैं भी मीठा जल होना चाहती हूँ मैं भी माँ होना चाहती हूँ ... माँ मुस्कुराई .. स्नेह से मुझे चूमा और बोली स्त्री माँ ही होती है .. उसके आँचल में प्रेम ही होता है सिर्फ संसार का कोइ दाग उसे मैला नहीं कर सकता मैं क्या कहती मैं चुप रही मैं चुप हूँ मेरी हंसी मेरा मौन निगल गया है || प्रिया मिश्रा :)   
एक चिड़ियाँ एक घोसला उसमे बच्चे माँ का हौसला एक आया काला सा कौआ मारी उसने चोंच, गिर गया घोसला टूट गए अंडे चिड़ियाँ के जीवन  में जो काला कौआ आया था जिसने उसका भूत , भविस्य और वर्तमान भी जलाया था अब वो आता मेरे सपने में काँव - काँव करता है वो काला कौआ मेरे सपने आके  नाग बन मुझे डसता है क्या करू अब  किस से कहूं अब की , है कौआ वो जो मुझे ना मरने ना जीने देता है वो काला कौआ सबको कौआ दीखता मुझे जहर उगलता दीखता है || प्रिया मिश्रा :)) 
आज तो तुम चले गए हो हाथ छुड़ा के एक दिन ऐसा होगा तुम "लौटोगे" लेकिन हम नहीं होंगे कहाँ "ढूंढोगे" हम तो तुम्हारे लिए पानी पे "फ़ेके" हुए  कंकड़ ,   से बनने वाले "चूड़ियों" की तरह थे अब नया पत्थर पुरानी "चूड़ियां" नहीं बना पायेगा || प्रिया मिश्रा :))  
मैं "मान" "स्वाभिमान" की बातें नहीं जानती मैं तो बस इतना जानती हूँ जो जन्म लिया है तो मरना "निश्चित" है इसलिए जब तक हूँ हसना चाहती हूँ हसाना चाहती हूँ और मरने के बाद मेरे माटी के शरीर में एक बीज रोप देना वो आएगा एक पेड़ बनकर फिर खिलेंगे उसपे फूल लोगो का उदाश ह्रदय महक जायेगा और फल जब आएंगे कुछ भूखे बच्चे होंगे तृप्त इस पेट की अग्नि से फिर छाव भी देगा वो मेरा काया का पेड़ उसकी जड़ो में "कुछ" छोटे और नन्हे पौधे भी आएंगे ममत्वा भी तो चाहिए जीने के लिए .... फिर होगा सफल मेरा सफर पृथ्वी से अंतरिक्ष तक का ..... वरना तो सब बेकार है ..... सब मोह - माया है .... प्रिया मिश्रा :))  
 मैं तुम्हारे हर दुःख में बराबरी का रिश्ता चाहती हूँ मैं प्रेमिका नहीं तुम्हारी पत्नी होना चाहती हूँ || मुझे नहीं शौक सिनेमा घरो की टिकटों का मैं तो पायल की मधुर ध्वनि को तुम्हारे जीवन में भरना चाहती हूँ || मुझे नहीं की मेरे कोइ सहेली हो मैंने तो तुम्हारे "माँ" की सहेली होना चाहती हूँ || सुनो , नहीं होंगे निराश तुम यकीं कर लो , मैं रहूंगी तुम्हारे पापा की बुढ़ापे की लाठी बनके मैं नहीं होना चाहती तुम्हारी प्रेमिका मैं तो तुम संग कंधे से कन्धा मिला के चलना चाहती हूँ || ना लाओ चाँद - तारे तोड़ के मैं नहीं मांगती स्वर्ग तुमसे मैं तो चुटकी भर सिंदूर और एक वादे का मंगलसूत्र चाहती हूँ || मैं तुम्हारे हर दुःख में बराबरी का रिश्ता चाहती हूँ मैं प्रेमिका नहीं तुम्हारी पत्नी होना चाहती हूँ || प्रिया मिश्रा :)
 अब जरुरी है की किताबो में बदलाव की जाये इतिहास , भूगोल और विज्ञान के स्थान पे मानवता की एक किताब रखी जाये || बहुत हो गया ये शब्दों का ज्ञान जरुरी है अब थोड़ा की वास्तविकता से परिचय किया जाये || जान ले की जन्म क्या है और मृत्यु कहाँ ले जाएगी || अब धर्म - अधर्म पे बाद - बिवाद ख़त्म किया जाये जरुरी हैं की अब थोड़ा भू को पढ़ा जाये भूमि से प्रेम किया जाये || प्रिया मिश्रा
जब भी कभी किसी को "उदाश" देखती हूँ सोचती हूँ पूछ लूँ उससे उसके "उदासी" का कारन एक "रोते" हुए व्यक्ति से उसके "आसूं" छीन लूँ और "उपहार" स्वरुप "भेट" दूँ उसे उसकी  "मुस्कराहट" फिर जाने क्यों "डर" लगता है कहीं मैं ही ना "रुला" बैठु उसे जो आँखों में "तेज़ाब" डाले बैठा है ये  "मानव" व्यवहार बड़ा कठिन है यहाँ "कब" कौन "शिकार "हो जाये "कब" कौन "शिकार" कर जाये कुछ पता नहीं बाकि सब तो मोह - माया है ||   प्रिया मिश्रा :) 
गुजरने वाला गुजर जाता है हम वही बैठ के वर्षो मातम मनाते है हमें आदत है बदबू में रहने की हम लाश को कई दिनों तक सड़ाते है फिर फाक्ते  है शमसान की राख आदत है हमें मरे हुए को फूलो का हार डालना एक मुर्दे के लिए जिन्दा फूलो से खेल जाना एक नंगे के बदन पर कपडा नहीं हमें बखूबी आता है मुर्दो को मखमल में लपेटना || प्रिया मिश्रा :) 
संवाद तुम अँधेरे में क्यों रहते हो क्युकी मैं अँधेरे में ही पला - बढ़ा हूँ | ये तो मेरे माँ - पापा जैसे है | इसे  नहीं छोड़ सकता | तो फिर कुछ दिनों के लिए रौशनी की तलाश क्यों थी तुम्हे ? सूना था की रौशनी  महबूबा सी  सुन्दर होती है | बस वही देखना था की अँधेरे से निकला हुआ आदमी कितनी देर तेज रौशनी में देख सकता है || फिर क्या मिला तुम्हे वहाँ जाके? कुछ नहीं ,अँधेरे से और प्रेम हो गया || प्रिया मिश्रा :)  
  संवाद            क्या हुआ था तुम्हे ?  कुछ नहीं सब कह रहे थे अवसाद था | ये क्या बला है ये वो बला है जहाँ जिंदादिल लोगो को पाषाण बनाया जाता है तुम्हे कैसे पता चला तुम्हे ये रोग है रोग ना कहो मित्र " यही तो वो वक़्त था जब मुझे पता चला था की मैं जिन्दा हूँ " फिर कैसे ठीक हुए ? जब पता चला जिन्दा हूँ तो चलने लगा और जब चलने लगा तो खुद को ढूंढ़ने लगा फिर टकराया दवा से | क्या थी दवा ? मेरी खुद की सोच जो मैंने बदल ली | कैसे सोच ? यही की सब की कुछ किसी और के हाथ में है | तो अब क्या सोचा है ? यही की सब कुछ प्रभु के हाथ में है | तो फिर तो फिर से तुम खाली हो गए ? हाँ, लेकिन प्रभु ने विचारो को उठाने की और अपने विचारो की सुधारने की  स्वतंत्रता दे रखी है | ओरो की तरह उंगलियों पे नचाते नहीं | तो फिर अब क्या करोगे ? कुछ नहीं बस उन लोगो को ढूंढूंगा और उनको सेवा में अपना वक़्त गुज़ारूंगा |  एक बीमारी से मुक्ति उस बीमारी का बैध बन के ही मिल सकती है || समाप्त प्रिया मिश्रा :) 
तुझ सी पानी में बह जाती तो हो आती मैं भी काशी धाम अब कैसे जाऊँ मैं जब पैर ही मेरे पाषाण प्रिया मिश्रा :)      चलो पुराने वक़्त को दफ़ा करते है खुद से मिलके, कुछ वफ़ा करते है कौन जाने कल का सबेरा कैसा होगा चलो आज कुछ नया करते है थोड़ी मटकी में माखन तू भी ला कान्हा थोड़ी मिश्री मैं लाती हूँ फिर खिलायंगे मिलके जो मित्र तेरे - मेरे , इस जग में भूख से बिलखते रहते  है ||  प्रिया मिश्रा :)   मैं जब भी तुम्हे प्रेम से देखूंगा बस इतना देखूंगा जितने में तुम शर्म से आखें झुका लो और मैं मुस्कुरा के उस पल को कैद कर लूँ अपने दो आँखों में प्रिया मिश्रा :)  अब जब कभी मैं और तुम टकराएंगे तुम रास्ते बदल लोगी हो सकता है, खुद को स्थिर करने लगो और जता दो की हम अब अजनबी है || मैं भी "तुम" नहीं कह पाउँगा तुम्हे देख रुक जाऊंगा लेकिन रोक नहीं पाउँगा हम अब फासले लेके मिला करेंगे वो बादल प्रीत के कभी ना आयंगे अब धुप खिलेगी जलाने वाली आत्मा को || प्रिया मिश्रा :)