एक समंदर सुख गया
एक दरिया उफान पर है
सोचती हूँ
 इश्क में क्या इतना पाप हैं

चलते - चलते
कदम थक गए
छाले जैसे मेरे नाम हो गए
खिताब मैंने पाया
शमा का ,
जो हर घर में जला करती हैं
आफताब बनते - बनते
राख हो गए
सोचती हूँ ,
इश्क में क्या इतना पाप हैं ||

हर वो गुनाह भुगता हैं
जो किया ही नहीं
हर वो दर्द से गुजरे हैं
जिसके जख्म भरे ही नहीं
एक और नासूर जन्म ले रहा हैं
अब वो कहाँ लेके जाएगा
डर  लगता हैं ,
कही वो भी ना ये कह दे
हम तो तेरे नाम को
पाँव की धूल में छोड़ा करते हैं
वो मुकाम सोच के ही रूह काँप जाती हैं
सोचती हूँ।,
इश्क में क्या इतना पाप हैं ||

एक अजीब सी बात हैं
जो कह नहीं पाए
हर बार दायरों की अहमियत जमझाई गयी
मुस्कुराना तक ,
दुसरो ने तय किया
हर बार मेरे आसुओं की भी कीमत लगाई गयी
ये प्यार भी ना
जहर जैसा हैं
खा लो तो तड़प के ही मरना हैं
ये इतिहास भी कहता हैं
हीर - राँझा नहीं मिले
श्री - फरहाद की कहानी भी नहीं लिखी
ये मोहब्बत ने सबको
लाश बना दिया
सोचती हूँ ,
इश्क में क्या इतना पाप हैं ||

पूजते हैं जिस कृष्णा को राधा संग
वो प्रेम भी बिरह में रहा
मुरली बजी कृष्णा की
राधा का हिरदय तड़पता रहा
बरसाने की मिट्टी बंजर रही
नन्द गांव भी एक कोने में सूखा रहा
ये कैसे संयोग हैं
जो मिले वो बिछड़े
और कभी ना मिले
खुद के हाथो खुद की लाश ढोना
जीवन भर ,
सिंदूर किसी और का
और हिरदय किसी और का
सोचती हूँ ,
इश्क में क्या इतना पाप हैं ||

प्रिया मिश्रा :)


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