"कहने की जरुरत नहीं है " कहने की जरुरत नहीं है की सच्चा है मेरा प्रेम तभी तो तुझे फरेब से दूर रखा है || तुझे सवारने को खुद मैले आँचल से भी दूर रखा है || तेरा रूप धवल है तू सुन्दर है सलोना सा मेरे हिर्दय में एक खिलौने सा बस गया है तेरा रूप मुझे मोह गया है तेरा बच्चो सा जिद करना मुझे परेशां कर जाता है क्या कहु तुझसे तेरा तड़पना मुझे भी भेद जाता है मैं तड़प लुंगी तुझे एहसास भी न होने दूंगी तुझे आग से बचा के पानी से बचा के हिर्दय से लगाना है तू अनमोल है मेरे लिए तुझे बस ये एहसास दिलाना है मेरे प्रेम पे शक ना करना ये प्यार है तभी मजबूरियों की दूरिया है || प्रिया मिश्रा :)
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Showing posts from March, 2020
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"यादो " यादो का समंदर सूखता नहीं दरिया उफान पर रहता है आँखे भींगी सी रहती है और बगिया सुनसान सा रहता है || कोइ समझता नहीं उस पागलपन के मुस्कराहट को || वो मुस्कुराता है और आँखों में तूफ़ान सा रहता है || यादो पे कोइ पहरा नहीं होता किसी के नाम का कोइ डर नहीं होता ये आजाद है दबे पाँव आ जाता है ये याद है कोइ तेरा नाम नहीं जो छुपा लूँ ये हकीकत है जिसपे कोइ पर्दा नहीं होता || प्रिया मिश्रा :)
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"प्रियजन" प्रियजन शब्द के लिए शब्द है ही नहीं , वहाँ भाव होते है | जहाँ आपको समझने के लिए या आपको समझाने के लोए भाव ही काफी हो | जो आपके लिए सदैव रहे | आपका भला चाहे | कभी - कभी उसकी वाणी में कड़वाहट हो पर दिल में आपके लिए हमेशा मिठास हो | वो होते है आपके प्रियजन | जिनके लिए आप प्रिय हो और आपके लिए वो | और ऐसी सिर्फ एक ही होती है हमारी माँ | माँ अकेले ही एक समुदाय होती है | जो कभी दोस्त बनती है | कभी बहन | कभी भगवान् | कभी पापा और कभी दादी कभी माँ | कभी आशीर्वाद की तरह होती है | कभी कड़वे करेले की तरह जिसमे हजारो गुण होते है | कभी मीठे चासनी की तरह | माँ सब रूपों में होती है | हमारी सबसे प्यारी और हमसे सबसे जायदा प्यार करने वाली || प्रिया मिश्रा :)
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"लड़के भी घर छोड़ते है " जिम्मेदारयो का बोझ लेके रातो को करवटो में सोते है लड़के भी घर छोड़ते है लड़के रोते नहीं कुछ कहते नहीं सब कुछ खुद ही सहते है लड़के भी घर छोड़ते है || सिसकते है कोने में किसी से कुछ नहीं कहते है वो संभाल के खुद को दुसरो को भी संभालते है दिल को पत्थर रख के लड़के भी घर छोड़ते है || प्रिया मिश्रा :)
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"नींद" सुकून से जब माँ के आँचल में चुप कर सोती थी तब वो नींद होती थी , अब करवटो में रात गुजरती है || काम में उलझ गए , दुनियादारी में बड़े हो गए उबासी तो आती है , नींद नहीं आती आज कल दवाईयों पर पलके बंद होती है रात होती है , शाम नहीं होती || जरा सी वक़्त निकाल के सोचती हूँ वक़्त को भी वक़्त दे दूँ मिल लूँ माँ से , बड़े दिनों बाद उसकी बेटी से मिला दूँ || इस होली माँ के चेहरे पे एक प्यारा सा मुस्कान ला दूँ इस होली मैं एक सुकून की नींद ले लू || प्रिया मिश्रा :)
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"होली" होली रंगो का त्यौहार | सब लोग आपस में खुसिया बाटते है | एक दूसरे के गले मिलते है | पार्टी करते है | शोर - शराबा , मस्ती मजाक सब चलता है | कितना अच्छा लगता है जब लोग अच्छे और सच्चे रंगो से होली खेलते है | वरना साल भर तो बस रंग बदलता है , दीखता नहीं है | होली को सबके साथ मनाये | सबको खुसिया मानाने का मौका दे | सबके साथ रंगो को बाटे | भेद - भाव मिटाये | और प्यार के रंग के साथ होली का त्यौहार मनाये | अपने आस - पास भी देखे कही कोइ रंग सफ़ेद तो नहीं | कही कोइ भूखा तो नहीं | कही कोइ परेशान तो नहीं | हमें अपने आस - पास के लोगो का भी ध्यान रखना चाहिए | उनकी मदद करनी चाहिए | सबको मुस्कुराना सिखाना चाहिए | मुस्कुराना भी एक रंग है जहाँ गलो पे गुलाबी रंग बिखर जाता है और आँखों में सतरंगी रंग छा जाता है | बातो से मिठास दे | हमारे शब्दों में इतनी ताकत होती है हम मरते हुए को जीने की राह दे जाते है | किसी गलत को अच्छा बना सकते है | किसी रोते हुए को हँसा सकते है | और ये सब भी एक रंग है | जिसे हम पूरी दुनिया में ला सकते है | अपनों को प्यार का गिफ्ट देके | किसी रोते को म...
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"आम" "आम" शब्द "आम" रह गया कहने वाला राजा हो गया कहते हमरे मंत्री भाई मैं ठहरा "आम" सा आदमी जनता को भोली सूरत दिखाई कुर्सी मिलते ही ठेंगा दिखाई ये "आम" शब्द की मिठाई हर साल सबने खाई बाहर देखे चीनी आता अंदर से करेला ये "आम" शब्द भईया बड़ा है अलबेला || फलो में जब आता हैं तब राजा कहलाता है बड़ा रसीला बड़ा ही सुन्दर लेकिन देखो किस्मत तोडा पथरो से ही जाता है ये राजा कैसा बस नाम का राजा है ईमानदार है तभी तो पत्थर पड़े है क्युकी अक्ल कहा सबको भाता है अंधी नगरी में आँखों का राजा पत्थर ही खाता है तो आम शब्द को आम समझ के तुम न खाना धोका कभी मिलेंगे पत्थर कभी मिलेगा करेला ये आम शब्द है बड़ा अलबेला || प्रिया मिश्रा :)
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"तुम रोज न पूछा करो की मेर हाल कैसा है " तुम रोज ना पूछा करो की मेरा हाल कैसा है क्या बताऊँ , कैसा गुजरता है दिन और रात का हाल कैसा हैं गुजरती शामो में गुजर जाती है मेरी उम्म्मीदे और दोपहर की धुप में जल जाता हैं आँखों का पानी | अब तो ना नींद आती है ना भूक लगती है एक बेरोजगार की जिंदगी तानो में गुजरती है ये तुम्हारा हाल पूछना भी व्यंग है , तो रहने दो हमें अकेले सहने दो हमें अकेले कुछ कर नहीं सकते तो मजे न लिया करो हमारे हमारे आँसुओ पे कुछ तो तरस खाओ मुझे हारा देख मेरा मजाक ना उड़ाओ | गिरे हुए पंख वापस आ जाते है सुखी हुई नदी फिर से हिलोरे मारने लगती है ईमारत गिर भी गयी हो तो नींव में जंग नहीं लगती हौसला बुलंद हो तो जिंदगी भी नहीं रूकती मैं चला हूँ तो , थक जरूर जाऊँ हार के छाले कभी ना आएंगे और हसने वाले , कुछ नजरे चुरायेंगे कुछ पीठ थपथपा के जायेंगे उनके शब्द तब बदल गए होंगे नाकारा अब, लायक हो गया और मेरे दिमाग में उन्हें देख आएगा मेरे दिन फिरते ही कौआ अब गायक हो गया || प्रिया मिश्रा :)
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"गुड़िया टूट गयी " दुनिया की खिलौना थी जो वो गुड़िया आज टूट गयी मेरी बिटिया मुझसे रूठ गयी || लाल चुन्नी माथे पे उसके मेहँदी हाथो में उसके देखा था ख्वाब एक डोली में जाने के उसके हाय , रे निर्मोही रावण सीता हर ले गया क्यों ना वो मेरे प्राण ले गया एक बाप की आज दुनिया लूट गयी मेरी बिटिया मुझसे रूठ गयी || बून्द - बून्द टपकता रहा आसूँ खून बनके रिश्ता रहा ना दया आई उसको दरिंदा भेड़िया उसको नोचता रहा उसकी भूक की बलि चढ़ गयी एक कली पैरो तले रौंदती रही चटका मिट्टी का मासूम बचपन एक सुराही फिर से टूट गयी मेरी बिटिया मुझसे रूठ गयी || अब जला हैं मशाल तब कहा था किसी को मलाल सब थे अपने घरो में मौन था, कौरव समाज आज भी पापी सांस ले रहा कहाँ कोइ फंदा उसके प्राण ले रहा जो थी आस , थोड़ी सी बाकि वो भी अब टूट गयी मेरी बिटिया मुझसे रूठ गयी || दुनिया की खिलौना थी जो वो गुड़िया आज टूट गयी मेरी बिटिया मुझसे रूठ गयी || प्रिया मिश्रा :)