आज आपको देख के देखो न आसमान भी शरमा गया || मैं आपको खूबसूरत नहीं कहना चाहता बस इतना जान लो चाँद आप जलने लगा हैं शायद चांदनी भी गायब हैं लगता हैं इस बार दो अमावश आ गया || आज आपको देख के देखो न आसमान भी शरमा गया || वो जुलाहा भी आज नाज करता होगा जिसने धागे बुने, वो धागा भी नाज करता हैं जो साड़ी बनके आप जा सजा हैं आँचल को संभाल के रखना जो जमीं को छू गया, तो वो भी शरमा जाएगी हाय , ये बला की खूबसूरती कहाँ जाएगी देखो ना आपके साड़ी के गोटे को देख के जुगनू भी जगमगाना भूल गया || आज आपको देख के देखो ना आसमान भी शरमा गया || प्रिया मिश्रा :)
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Showing posts from December, 2019
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टूट सकते हैं मगर बहोत सोचा समझा फिर जाके ऐतबार किया तोड़ न देना कह ना पायंगे तुमसे कुछ हम टूट सकते हैं मगर || जान लो इतना एक बिश्वाश को धोका दिया हैं एक बिश्वाश को पाने के लिए तुमने जो रस्ते बदले कह ना पायंगे तुमसे कुछ हम टूट सकते हैं मगर || एक वादा करो जब कभी ऐसा लगे की तुम ऊब चुके हो मुझसे एक इशारा कर देना मैं खुद की कमिया ढूंढ लुंगी जो तुमने कुछ कहाँ न कह ना पायंगे तुमसे कुछ हम टूट सकते हैं मगर || प्रिया मिश्रा :)
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क्यों सोचे कोइ किसका कौन होगा ये तो वक़्त बताएगा आज भले ही वो मौन होगा || घड़ी दो घड़ी की बात पे, क्या यकीं कर ले खुद के पैरो में जान होगी तो चार कदम चल पाएंगे तेरी बैसाखियो से, कंधे तेरे भी तो झुक जायेंगे तू डरना मत मैं न भी चल पाई तो , तुझे संभाल लुंगी ये वादा हैं कल भी ये वादा निभा लुंगी || प्रिया मिश्रा :)
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जब बारिश के दिनों में मिट्टी के खिलौने बना के खेला करती थी मैं तब बचपन जिया करती थी !! जब गीली मिट्टी में सने मेरे पाँव संग -संग बूंदो के चला करते थे तब मैं रास्ते ढूंढा करती थी !! काले स्लेट पे सफ़ेद से अक्षर कुछ मोटा कुछ पतला कुछ फुल कुछ गमला जब मैं यूँ ही लकीरे खींचा करती थी तब मैं दिल लगा के पढ़ा करती थी !! यूँ ही सीखाने पर जय करना नमस्कार करना होता था तब कहा कुछ अलग था हर सूरत में पत्थर भगवन हुआ करता था हर जगह सर झुका देना मासूमियत से तब मैं हर रोज इस्वर को श्रद्धा से नमस्कार किया करती थी !! अब तो बात -बात पे दिल टूट जाता हैं हर जगह पत्थर नजर आता हैं बारिश की बुँदे बरस के सुख जाती हैं और भीड़ में भी खालीपन नजर आता हैं ये हैं आज की दुनिया हम बड़ो की जहा बचपन तिल-तिल कर के मर जाता हैं !! प्रिया मिश्रा
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बिना अपेक्षाओ के हमारे रस्ते मिलते जा रहे हैं देखना ये हैं की , मंजिल आएगी या मोड़ आ जायेगा || मोड़ आएगा तो कौन मुड़ेगा किसका हाथ किस्से छूटेगा फैसला बहोत मुश्किल होगा जब मोड़ वो करीब होगा या तो वो रस्ते बना देगा या हम रस्ते बना देंगे अगर प्रेम सच्चा होगा तो मोड़ को ही मंजिल बना देंगे न रस्ते आएंगे ना कोइ मंजिल आएगी || प्रिया मिश्रा :)
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वो पढ़ने का आदि हैं मैं सोचती हूँ क्यों ना किताब बन जाऊँ जिसे वो पन्ना - पन्ना शब्द - शब्द पढता रहे || वो सुनने का आदि हैं मैं सोचती हूँ , क्यों न मैं संगीत बन जाऊँ जिसे वो सुने, और मैं उसके रूह में उतर जाऊँ || वो फूलो का आदि हैं , मैं सोचती हूँ , खुसबू बन जाऊँ और वो मुझे छू के गुजरता रहे || प्रिया मिश्रा :)
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मैं डरती हूँ जिस बात से वो बात बार - बार हो जाता हैं खामोसी से छुपा लेते हैं खुद को जाने क्यों प्यार से प्यार हर बार हो जाता हैं || कह के भी क्या करेंगे वो सपना है, टूट ही जायेगा फिर भी उस झूट पे ऐतबार बार - बार हो जाता हैं जाने क्यों प्यार से प्यार हर बार हो जाता हैं || प्यार उम्र नहीं देखता लेकिन उम्र प्यार देखता हैं बातो में न उलझे , ऐसे कई किस्से देखे हैं मैंने जहाँ हीर के बिछड़ते ही राँझा हर बार मर जाता हैं फिर भी , जाने क्यों प्यार से प्यार हर बार हो जाता हैं || प्रिया मिश्रा :)
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" खामोश हैं लफ़्ज क्यों " मुझे नहीं पता मैं क्यों तुझे याद करता हूँ तुझमे जीता हूँ तुझमे मरता हूँ तेरे लिए सोचा करता हूँ मैं ये सब तुझसे भी साँझा करना चाहता हूँ मगर , खामोश हैं लफ़्ज क्यों ? क्यों मुझे भी खबर नहीं क्यों तेरे ख़ुशी से ख़ुशी होती हैं क्यों तेरे गम से रोने लगता हूँ पता नहीं हैं ये सब तुझसे साँझा करना चाहते हैं मगर , खामोश हैं लफ़्ज क्यों ? मैं तुम्हारे साथ अपने जज्बात बाटना चाहता हूँ तुझे अपनी बेतुकी बातों से हसाना चाहता हूँ मगर , खामोश हैं लफ़्ज जाने क्यों खामोश हैं प्रिया मिश्रा :)
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"मैं एक कवी हूँ " एक कवी अपने विचार को प्रकट करके सवछंद नहीं रह पता वो सुखी होते हुए भी अगर दुःख पे कविता लिखे दे लोग पूछ ही देते हैं क्या हुआ भाई ?? अकसर प्रेम में न पड़ा कवी ही प्रेम पे जायदा लिखता हैं और लोग पूछ बैठते हैं किसके चककर में पड़ गए ?? अब कवी ये नहीं कह पता भाई , मैं कवी हूँ मेरे पास भावनाये हैं किसी को रोता देख मेरा कलम रोने लगता हैं किसी को हस्ते देख मेरा कलम हॅंस देता हैं ये खुद को नहीं जीता ये सबसे जीता हैं बस ये कलम हमें आपसे अलग करता हैं बाकि जैसे आप वैसे हम || प्रिया मिश्रा :)
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"रविवार" रविवार का दिन सोने का सबसे अच्छा मौका लेकिन ये क्या बात हो गयी पडोशन की सुबह - सुबह की कीच - कीच शुरू हो गयी मैं भी गया खिड़की खोली उफ़ ये क्या गजब हो गया सामने वाली खिड़की पे कोई मेनिका सी कन्या बाल बना रही थी पता नहीं बाल बना रही थी या मुझे उलझा रही थी अब कम्बख्त कौन सोने जाता हैं || जल्दी - जल्दी पार्लर गया थोड़ा बन- ठन के बाहर आया पहली बार मैं जंगली नहा के आया नहीं - नहीं गलत गए हैं आप , नहाता तो मैं रोज था आज साबुन लगे फेस वाश लगाया तो पता चला नहाना क्या होता हैं वरना मुझे तो पता था की बस पानी बर्बाद होता हैं || अब खुसबूदार होक नए पडोसी का फर्ज निभाने चला सोचा , दिखा दूँ , हम अकेले पडोसी हैं जो आपकी खैरियत पूछते हैं वो देखती ही मुझे मुस्कुराई फिर शर्मा जी की भी हसीं आई , मैं समझ गया मैं अकेला नहीं हूँ कई हैं इस मुहल्ले में जो पहले उठ जाते हैं || मैंने उसे कहा , कोइ तकलीफ होतो हमें कहियेगा और उसने कहा, अच्छा ठीक हैं पर शर्मा जी को ये बात समझ नहीं आई और बोल बैठे , आप इनकी चिंता न करे ये हमारे दोस्त की बेटी ह...
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खुद पे भरोषा रखे | क्युकी आपका भरोषा ही आपके लिए अच्छा हैं | वक़्त कैसा भी आये अगर खुद पे बिश्वाश हैं तो आँधिया भी रुख मोड़ लेती हैं | जितना हमारी आदत में हैं ऐसा बिश्वाश लेके चले | किसी के साथ भी बुरा न करे| क्युकी कदम के पेड़ पे ही कृष्णा आते हैं | तो कदम के पेड़ अपने आँगन में लगाए | जंगली पौधो से दूर रहना काटो को चुभने नहीं देता पाँव में | वो बन्दर ही होता हैं जो मदारी के डमरू पे नाचता हैं शेर तो पिंजरे में भी शेर ही हैं || प्रिया मिश्रा :)
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"फिर उसने मुड़ कर नहीं देखा " हम मिले एक मोड़ पे मैंने सोचा मोड़ हैं उसने भी ऐसा ही सोचा होगा लेकिन हमारे रस्ते अलग ना हो पाए किस्मत को सायद मेरी हार पसंद थी उसने मुझे जितने का मौका नहीं दिया वो रास्ते भर रहा साथ लेकिन हमसफ़र न बन पाया हम रह गए इन्जार करते वो खुद की मजिल तय कर के आया था मेरे बर्बादी का पूरा सामान ले आया था जाते - जाते मेरी मंजिल मेरा रूह मेरी छाया तक चुरा के ले गया और फिर , फिर उसने मुड़ के नहीं देखा || प्रिया मिश्रा :)
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" तू तेरे बारे में ना सोचेगा तो कौन सोचेगा " हमेसा दुसरो पे टाला न करो कभी खुद को भी निहारा करो कभी तो खुद की कमिया देख लो तू तेरे बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा ?? खुद को कमियों को देख के टाल ना देना उसी वक़्त खुद को सुधार लेना नहीं तो वक़्त निकल जायेगा बात बढ़ जाएगी हाथ से निकल जाएगी फिर वक़्त को मत कोशना वक़्त को मत गवा वरना , वक़्त पलट कर तुझपे हसेगा तो सोच ले , तू तेरे बारे में ना सोचेगा तो कौन सोचेगा ?? प्रिया मिश्रा :)
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" समय का मुशाफिर हूँ " मैं अकेला चला हूँ थका हूँ थोड़ा सा थोड़ा सा धुप भी जायदा है लेकिन क्या करू मैं भी तो , समय का मुशाफिर हूँ || एक गाँव को छोड़ा दूसरे को गले लगाया कही ठहरा नहीं कही रुका नहीं न किसी के आँगन का फूल बना न किसी के आँगन का काँटा बना हवा की तरह उड़ता रहा मैं तो , समय का मुसाफिर हूँ || मैं आग की तरह भी जला पानी में मिल के शांत और शीतल भी हो गया मैं राह - राह भटकता रहा लेकिन कोइ शिकायत नहीं हैं मैं तो , समय का मुसाफिर हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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" मैं सीरियस होना चाहता हूँ " मैं सीरियस होना चाहता हूँ पढ़ के लाट साहब की तरह हुकुम चलना चाहता हूँ पर जी नहीं लगता मेरा जी किसी ने चुरा लिया हैं लेकिन ये बात सच हैं मैं सीरियस होना चाहता हूँ || मैं सोचता हूँ कैसे लोग सिर्फ एक कमरे में दिन गुजार लेते हैं मोटे - मोटे किताबो को चट कर जाते हैं मैं सोचता ही रहता हूँ लेकिन ये बात सच हैं मैं सीरियस होना चाहता हूँ || मैंने भी मोटा चस्मा लगाया किताबो को बिखेर के रखना शुरू कर दिया मम्मी की आवाज सुनते ही मैं किताबो में ध्यान लगा लेता हूँ ऐसे मेरा कोइ कुसूर नहीं हैं मेरी उम्र ही ऐसी हैं लेकिन क्या कहु मैं सच में , सुधारना चाहता हूँ मैं सीरियस होना चाहता हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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"मैं डरता नहीं हूँ "" मैं डरता नहीं हूँ आये भूचाल तो आने दो मुझे मेरी मंजिल मिल ही जाएगी मैं डरता नहीं हूँ || कोइ दिन होगा जब मैं भी किसी के ख्वाबो में आऊंगा आज रात हैं तो रात में झाँक के देख लूँ कल ख्वाब में आएंगे न भी आये तो , मैं डरता नहीं हूँ || मैं राह के पत्थर हटाता चलूँगा मैं किसी और के लिए राह बनता चलूँगा मेरी राह थोड़ी दूर हो हो जाये , मैं एक कहानी बनाता चलूँगा मुझे राहों के पथरो से, अब डर नहीं लगता अब मैं नहीं डरता हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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"जिंदगी कुछ सवाल हैं तुझसे" मैं भी थक चुकी हूँ जवाब ढूंढ़ते - ढूंढ़ते तू भी थक चुकी है ये जिंदगी सवाल पूछते - पूछते तो क्यों ना , अब सिलसिला बदल दिया जाएँ अब मैं क्यों न कुछ पूछ लूँ और क्यों तू कुछ जवाब देदे ऐ जिंदगी , जिंदगी कुछ सवाल हैं तुझसे || मुझे मेरे होने का कुछ एहसास करा दे जिन्दा हूँ ये हकीकत बता दे कुछ जवाब मुझे भी देती जा की जिंदगी , वो जिंदगी, कुछ सवाल हैं तुझसे || मेरी आधी - अधूरी सी बातें तुझे परेशां करने लगी हैं मैं खामोश क्यों हूँ ये बात तुझे भी खलने लगी है तो मेरी बातो का सिलसिला अब बढ़ा चल अब मेरे सवालो का जवाब बता सुन ले जिंदगी , की ये जिंदगी कुछ सवाल हैं तुझसे || प्रिया मिश्रा :)
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"मैं रात कहूं तुम दिन समझ लेना " मैं रात कहूं तुम दिन समझ लेना मैं ना कहूं तुम हां समझ लेना एक बार मेरी इंकार को शब्दों में न टटोलकर आँखों में देख लेना जवाब जो मिले उसमे खुद को ढूंढ लेना मैं न कहूं तुम हाँ समझ लेना || मैं कहूं की नहीं हैं फ़िक्र तुम्हारी तुम दरवाजे पर लगी उस चौखट, नजर डालना कई बार पाँव के निशान मिलेंगे तुम उस निशान से सब भेद समझ लेना मैं न कहूं तुम हाँ समझ लेना || मैंने नहीं किया इन्तजार ऐसा जो कहूं मैं , तुम मुस्कुरा देना और मेरी जगती आँखों में वो अनकहा प्रेम देख लेना जो चुभती हो तुमको बातें मेरी तो उन शब्दों में मेरा दर्द देख लेना एक आह मिलेगी तुम वो बात समझ लेना जो ना कह पाई कभी तुमसे मैं मैं रात कहूं तुम दिन समझ लेना मैं ना कहूं तुम हाँ समझ लेना || प्रिया मिश्रा :)
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"उत्सव हैं जिंदगी " प्यार है , रंग है रूप है कभी बादल तो कभी धुप हैं जिंदगी रोज जी लेते है जिंदगी को दिन गुजारते नहीं क्यूंकि, उत्सव हैं जिंदगी || हम कोइ उत्सव नहीं मानते उल्लास की कोइ कल्पना नहीं करते बस खुद ही जी लेते हैं खुद के लिए और जिंदगी मुस्कुरा देती हैं मेरे लिए क्युकी , जिंदगी कुछ और नहीं उत्सव हैं जिंदगी || प्रिया मिश्रा :)
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"शायद मैंने आपको कही देखा हैं " सोचा हैं समझा हैं फिर जाके एक बात जुबान पर आई हैं जाने पहचाने से लगते हो शायद मैंने आपको कही देखा हैं || इस जनम हम अजनबी हैं पर किसी और जनम में मेरे हिर्दय ने तुमसे एक नाता जोड़ा होगा तभी तो इस जन्म भी वो तुम्हे देख के, वो उफान पे आ गया जिससे रुकते - रुकते बात जुबान पे आ गया हैं बुरा न मानियेगा लेकिन मैंने आपको कही देखा हैं || शायद फूलो के रंगो में छिपकर शायद ओश की बून्द में या कही कोइ हवा आपसे होकर गुजरी हैं जिसने मुझे ये एहसास दिलाया हैं की आप अजनबी नहीं अपने हो , बुरा न मानियेगा हम दिल्लगी नहीं करते लेकिन मैंने आपको कही देखा हैं || यूँ तो रोज ही मिलते हैं हजारो से लेकिन हजारो में वो बात नहीं जो बात आपमें हैं तभी तो बात पे बात आई हैं तो कह देते हैं बुरा न मानियेगा ये और बात हैं की हम , आँखों के गुलाम हैं पर मेरी रूह ने आपको पहले कही देखा हैं || प्रिया मिश्रा :)
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" मैं देर तक ठहरा रहा " न तुम आये न आने का कोइ वादा किया घंटे गुजर के साल हो गए मैं वही टकटकी लगाए रहा मैं देर तक ठहरा रहा || तुम तक गयी थी जो हवा छूके मुझे , वो हवा मुझ तक भी आई थी लेकिन तुम्हारी खुसबू नहीं आई मैं हवा से लड़ता रहा मैं देर तक ठहरा रहा || मौसम बदला बरसात बदल के ग्रीष्म आया लेकिन सावन आखों से बरसता रहा मैं रोता नहीं था, मैं बूत बन गया था सब कुछ ठिठक गया मौसम कई बदल गए मैं देर तक ठहरा रहा || मुझे तुम्हारी यादो ने पहरे में रखा मैं कैदी था मैं रोज तिनका- तिनका मरता रहा | तुम न आये , न तुम्हारी यादें आई मैं वही देर तक ठहरा रहा || प्रिया मिश्रा :)
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"प्यार" प्यार मैं तुम्हे शब्दों में समझा नहीं सकती बस इतना जान लो एक मोह हैं, तुमसे तभी घंटो तुम्हारा इन्तजार करते रहती हूँ मुझे तुमसे प्यार नहीं हैं फिर भी तेरे एक एसमएस के, इन्तजार में रात - रात भर फोन को देखते रहती हूँ और तुम कहते हो की प्यार हैं तो समझा दो || प्यार शब्द को बोल नहीं सकती बस इतना जान लो की तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता और जब तुम पास होते हो तो वक़्त , गुजरता चला जाता हैं जैसे उसे भी मिलना हो किसी से मैं नहीं जानती , तुम क्या कहोगे , क्या सोचोगे बस इतना जान लो इन्तजार हैं तुम्हारा लेकिन प्यार समझा नहीं सकती || आज तक कोइ मुझे झुका नहीं पाया इतना गुरुर लेके चले हैं, और तुम्हारे लिए स्वभिमान भी नहीं देखती अब क्या कहु गिरवी रख दूँ खुद तुम्हारे लिए , तुम्हारे चरणों में तो मान लोगे प्यार की परिभासा या फिर भी पूछोगे की प्यार क्या हैं || प्रिया मिश्रा :)
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"बहुत करीब से देखा हैं तुम्हे " बहुत करीब से देखा हैं तुम्हे तुम चाँद सी सुन्दर हो पर तुम्हे चाँद नहीं कह सकता तुममे कोइ दाग नहीं तुम धवल हो तुम सुन्दर हो || तुम्हारे गेसुओं की खुसबू महसूस की हैं पर इन्हे फूल नहीं कह सकता इनमे रात जैसे गहराई हैं || बहोत करीब से देखा हैं तुम्हे , पर जानने की ईक्षा अभी बाकि हैं क्यों समेट लेते हो खुद को मुझसे , की मैं तुम्हारा कवी हूँ और , तुमपे कोइ कविता लिखना अभी बाकि हैं || प्रिया मिश्रा :)
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" कम्प्यूटर " मैं कम्प्यूटर हूँ पूरी जानकारी रखता हूँ आज कल सब कुछ मुझसे ही चलता हैं लेकिन कभी सोचा हैं मुझे भी किसी इंसान ने ही बनाया हैं लेकिन मैंने पैदा होके सबसे पहले इंसान के पेट पे ही लात मारा ये इरादा मेरा नहीं था पर फितरत इंसानो वाली आ गयी बनाया तो मुझे किसी इंसान ने ही हैं पर मैं एक बात कहूंगा , मैं मशीन हूँ मशीन ही रहूँगा लेकिन तुम मशीन न होना क्युकी , कोइ इन्तजार करता होगा तुम्हारा शाम को , आदमी हो आदमी के दिल में रहना मैं मशीन हूँ मुझे मशीन ही रहने दो मुझे इंसानो की सक्ले न दो वरना , इंसान मशीन की सक्ले लेने लगेगा || प्रिया मिश्रा :)
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"मैं तो बस " मैं तो बस एक मुसाफिर हूँ चलना जनता हूँ मंजिल नहीं पता बस रस्ते का साथी हूँ रास्ता जनता हूँ || मैं तो बस फूल हूँ खिलना जनता हूँ मुरझाने का समय नहीं पता बस खिलना जानता हूँ मेरी खुसबू दूर तक फैलेगी मैं तो बस दिलो में बसना जनता हूँ मैं तो बस कहानी हूँ पन्नो में बसना जनता हूँ कोइ पढ़ ले तो मुस्कुरा दे बस हरेक शब्द ऐसा चाहता हूँ || मैं तो बस सुबह हूँ खिलना जनता हूँ सूरज तपे न बस मीठी धुप दे जाये मैं तो इतना चाहता हूँ || मैं तो बस कविता लिखता हूँ पसंद आये तो सुक्रिया कहना न आये तो मुस्कुरा देना मैं कवी हूँ शब्दों से खेलना जनता हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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मैं तुमसे बस इतना चाहता हूँ की तुम मेरे हो इसे समझ लो मैं इश्क की कोइ बात नहीं करूँगा || मैं तुम्हारे बिना खुद की कल्पना भी नहीं कर सकता और जिंदगी की दौड़ में तुम्हारे बिना हार सकता हूँ | फिर भी मैं इश्क की तुमसे कोइ बात नहीं करूँगा || मेरी सुबह तुम्हारे बिना, अधूरी है शाम अधूरा है रात कही खो जाती है और दिन उदाश रहता है मैं अकेला हो जाता हूँ तुम समझ रही हो मैं खो जाता हूँ तुम साथ रहती हो तो मैं जीवन महसूस करता हूँ फिर भी मैं तुमसे इश्क की कोइ बात नहीं करूँगा || तुमसे मिलकर एक नया जीवन सुरु हुआ हैं इस जीवन में एक नया अध्याय खुला हैं उस अध्याय में सिर्फ तुम्हारी कहानी है उस कहानी को मैं दिन भर पढता रहता हूँ मैं खुद में नहीं जीता मैं तुम्हारी साँसों में जिन्दा हूँ तुम समझ लेना मैं इश्क की कोइ बात नहीं करूँगा || मेरे बागों का फूल तुमसे खिलता हैं मेरे चाय में मिठास तुमसे आती है मेरे खाने का स्वाद तुमसे हैं मेरे मकान की नीव तुमसे हैं तुमसे ही घर बस्ता हैं तुम समझ लेना बाकि का मैं इश्क की कोइ बात नहीं करूँगा || प्रिया मिश्रा :)
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" बचपन की मस्ती " बचपन की मस्ती का क्या कहना ख्वाबों का एक झरोखा सा दीखता है जिसमे यादें बस्ती है || वो कागज की कश्ती भी बारिश के समंदर में शान से चलती हैं || हम भी सिंदबाद थे बचपन में हमारी भी कश्तिया उतरा करती थी "कागज की कश्ती " बरसात के समंदर में अरमानो का तिजोरी लिए और हम सिंदबाद सबसे बड़े सौदागर लेकिन तब कभी खुद के सपनो का सौदा न किया आज करने लगे है || बचपन की मस्तियो में आमो के बागो से आम को चुरा के खाना सबसे बड़ी हमारी उपलब्धियों में से एक है || गिलहरियों को फुदकते देखना चिड़ियों का चहचहाना निदियो में दौड़ लगाना बादलों के पीछे भागना ये सब हमारे खेल हुआ करते थे || पाठशाला के किताबो से कहानियो को चुराना हरेक सवाल पे एक और सवाल उठाना कुछ छाड़िया भी मिली जो सबक बन के आज काम आती हैं वो बचपन की मस्ती अब ख़यालो में ही मुस्कुराती है || रात को दादी की कहानिया दादा जी की लोरी और खुले आसमान में सो के , तारे गिनना चाँद से बाते करना ये बचपन का चाँद जाने कहा खो गया दादा - दादी विर्धाश्रम के गुलाम हो गए और...
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अकेले हैं तो क्या गम हैं अकेले हैं तो क्या गम है किसी के यादों का सिसिला साथ चलता है एक बादलो का करवा साथ चलता है थोड़ा - थोड़ा ही सही हर लम्हा साथ चलता है || अकेले हैं तो क्या गम है चाँद भी तो अधूरा और अकेला है सूरज भी तो अकेला चमकता हैं शान से वो पुरे आसमान में अलबेला है हम भी सूरज बन जायेंगे कही प्रकाश बन के जगमगाएंगे अकेले हैं तो क्या हुआ किसी अकेले का साथ निभाएंगे सभी अकेले ही रहते है दिखावे भर की ये महफ़िल है जिस , ग़ज़ल में महबूब का जिक्र होता है उसका भी एक - एक शब्द अकेला होता है हम अकेले शब्दों से इतिहास बनाएंगे अकेले थे अकेले चलते जायँगे प्रिया मिश्रा :)
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" कुछ ख्वाब अधूरे से हैं " कुछ ख्वाब अधूरे से है अभी समंदर का शाम देखना बाकि है किसी की मुस्कराहट में वो रात देखना बाकि है अभी - अभी तो एक ख्वाब पूरा हुआ अभी कई रातो तक जगायेंगे , अभी , कुछ ख्वाब अधूरे से है || एक किरण सुबह - सुबह की अधूरी है एक रात पूरा होक भी अधूरा है कुछ तारे अधूरे है कुछ बात अधूरी हैं कुछ ख्वाब अधूरे है|| अभी पैरो में थकान नहीं आ सकती अभी आखों में नींद नहीं आ सकती अभी सुबह की रौशनी में खुद को निहारना हैं एक काम खुद का भी हैं अभी खुद के वजूद को तराशना है अभी बहोत कुछ बाकि है अभी बहोत कुछ अधूरा है एक , ख्वाब अभी - अभी पूरा हुआ हैं अभी , कुछ ख्वाब अधूरे है || प्रिया मिश्रा :)
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" तू चला चल मुसाफिर " तू चला चल मुसाफिर एक मंजिल तुझे पुकारती हैं वो पर्वतो से गुजरती है बादलो पे रहती हैं वो तेरा एक सपना हैं जो तेरे तकिये के निचे सोती हैं तू थक मत तू रुक मत तू चला चल मुसाफिर एक मंजिल तुझे पुकारती हैं || तेरा पथ कठिन हैं पर तू कहाँ हारा है तेरे कदम के निशान जहाँ होंगे वो सारा जहाँ तुम्हारा हैं तू थक मत तू रुक मत तू चला चल मुसाफिर एक मंजिल तुझे पुकारती है || तू कहा अकेला हैं तेरे साथ ये शाम की बेला हैं सुबह की रौशनी हैं किरणों का मेला हैं नदिया साथ हैं तेरे पंछियो का डेरा हैं तू थक मत तू रुक मत तू चला चल मुसाफिर एक मंजिल तुझे पुकारती हैं || प्रिया मिश्रा :)
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हसीं तेरी हसीं ऐसी हैं जैसे चाँद का आना मेरे दामन में तारो का जुड़ना तेरे मुस्कराहट को मैं टाक लू अपने दुपट्टे में वो भी मुस्कराने लगे मैं , भी मुस्कुराने लगु | आज कल हसी मेरी तेरी हसीं में कही छिप गयी हैं तू लौटा दे मुझे वो मेरी हसीं और तू मुस्कुरा दे की तेरी हसीं मेरे जीने का सहारा हैं || प्रिया मिश्रा :)
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|| क्रांतिकारी || ये क्रांतिकारियों की अजीब समस्या होती है इन्हे प्रेम नहीं आता और हर क्रन्तिकारी की एक प्रेमिका होती है जिससे वो प्रेम नहीं करता लेकिन वो प्रेमिका उससे प्रेम करती है जिसे वो क्रांतिकारी सराहता है ये वो लड़की होती है इनके जीवन में जो इनकी प्रेरणा तो है पर क्रांतिकारी पथ के लिए उसका उसके जीवन में होना उसे भाउक कर जाता हैं अब वो भी क्या करे पत्थर पे फूल तो खिलता है पर क्रान्तिकारियो के ह्रदय में प्रेमिकाए नहीं जन्म लेती इसलिए क्रांतिकारी प्रेम नहीं करता वो अपनी प्रेमिका को लिखता है अपने शब्दों में और वो कविता बन जाती है || प्रिया मिश्रा :)
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|| शब्दकोष || मैंने एक तेरे नोटिफिकेशन , के इन्तजार में जाने कितनी कविताये लिखी सोचा कभी तो तू मुझे सराहेगा लेकिन सब बेकार अब सोचती हूँ एक आग्रह ही कर दू अपने व्यस्त वक़्त का एक सेकंड में आधा सेकंड निकाल और मुझे देदे | तेरा एक शब्द मुझे अनंत शब्द देता हैं किसी को सराहना पाप नहीं तो , मेरा शब्दकोष बन जा जिसे मैं पढ़ती रहुँ समझती रहूँ और लिखती रहूं || प्रिया मिश्रा :)
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बचपन में एक कहानी पढ़ी थी | शेर और खरगोश की | जिसमे एक शेर था जो रोज जानवर खा जाता था | जानवरो ने उस से गुहार लगाई की अगर इस तरह से वो सबको खाते रहेगा तो सारे जानवर जल्द ही ख़तम हो जायेंगे फिर वो किसको खायेगा ? शेर ने विचार किया और उसने जानवरो से पूछा? सभी जानवरो ने सभा में तय किया की, रोज एक जानवर शेर के पास जायेगा ? और इस तरह रोज एक जानवर जाते और शेर शिकार करता रहा | फिर एक दिन खरगोश की बारी आई और खरगोश ने शेर को मार डाला | आज कल वही स्थिति हमारे यहाँ की लड़कियों की हैं | फर्क बस इतना हैं शेर की जगह पे गीदड़ आ गए हैं और शिकार जानवरो की जगह पर हमारी बेटियाँ आ गयी है और जानवर समाज हमारी व्यवस्था हैं जिसने एक - एक बेटियों की बलि की छूट दे रखी हैं || प्रिया मिश्रा :)
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|| गाँव और आधुनिक बिकाश || गावँ जहाँ आज भी सचाई बस्ती हैं | प्रकीर्ति बस्ती हैं | सुंदरता बस्ती हैं | प्यार बस्ता हैं | लेकिन इन्तजार भी बस्ता हैं | तो क्यों न इस इन्तजार को ख़तम करे| माँ - बाप को उनके बेटो बेटियों से मिलाये | अपने छोटे से गावँ को आधुनिकता से भरा हुआ गावँ बनाये | ये मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं हैं | एक प्रयाश करे | जहाँ आपने जन्म लिया वहां की धरती का भी कुछ कर्ज होता हैं | सिर्फ पढ़ के बाहर जाके पैसे कमाने से कर्ज नहीं उतरता | मैं ये नहीं कहती की स्वम के बारे में ना सोचे | लेकिन ये भी तो सोचे आपको समर्थन मिला आपके माँ - बाप का तो आप आगे जाके पढ़ पाए कुछ बन पाए | लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो गावँ से बाहर नहीं जा पाते | क्या हमारा कुछ कर्तब्य नहीं उनके प्रति | और जरा ये सोचे की अगर गाँव का बिकाश होगा तो शहरो से थोड़ी आबादी सायद कम हो पाए और लोग अपनों से बिछड़ न पाए | लोग शुद्ध हवा , सुद्ध पानी और स्वक्ष वातावरण में अपने सपने को पूरा कर पाएंगे | गाँव खाली न हो और कोइ बेरोजगार न रहे | इसका सिर्फ एक ही हल हैं की गाँवों में आधुनिकता को...
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शहर मैं शहर हूँ | मैं पहले जंगल हुआ करता था | मेरे पास पेड़ - पौधे थे | सुबह - सुबह चिड़ियों का झुण्ड मुझे गीत सुनाया करता था | तितलियाँ नाचती थी | सुन्दर - सुन्दर फल , फूल मेरे पास थे | प्रकीर्ति मेरे अंदर बस्ती थी | माँ पृथ्बी का वरदान था मुझे | लेकिन फिर मुझे एक नया नाम देने के लिए सोचा गया "शहर " इस नए नाम ने मेरी पहचान छीन ली | अब मैं खूबसूरत नहीं रहा | काला हो गया हूँ | अब चिड़िया नहीं आती मेरे पास | सब भाग जाते हैं | शोर - शराबो से | मैं अकेला रहता हूँ | अब फल नहीं मिलता मुझे | धुँआ पिता रहता हूँ | मेरे फेफड़ों में काला धुँआ जमा हो गया हैं | अब बारिश भी नहीं आती मेरे पास | सब मेरे साथी मुझसे रूठ गए | अब कोइ भी नहीं आता समय पर | अब जिसको टाइम होता हैं बस अपना काम करने कभी भी आ जाता हैं | अब तितलियाँ नहीं नाचती अब सन्नाटा पसरा रहता हैं | नहीं तो मोटरबाईको के शोर में दम घुटता हैं मेरा | मुझे जंगल से शहर बना के गन्दा कर दिया गया | पहले इंसान बस्ते थे | अब जानवरो का बसेरा हो गया हैं | मैं रोता हूँ , कोइ नहीं सुनता | मैं अब भीड़ में खो गया हूँ | मैं जंगल था तो ज...
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अकेले की दिवाली ( मार्मिक ) एक आहट हुई थी !! दरवाजा खोला तो बस एक संदेसा था !! इस बार नहीं आऊंगा छुट्टी रद्द हो गयी !! दुश्मनो ने फिर हमला कर दिया हैं !! बस इतना ही लिखा था और बाकि का पन्ना कोरा था सिर्फ एक नाम था तुम्हरा रवि !! और जवान की बीवी ने इस बार फिर अकेले ही दिवाली मनाई !! ये हर साल होता था !!सारा हिंदुस्तान जगमगाता था !!जब एक जवान अपने घर से दूर और बहोत दूर अकेले में अपनों को याद करके दिवाली मनाता था !! प्रिय मिश्रा ||
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टूटी झोपडी ( लघु कथा ) टूटी सी झोपड़ी उस से टपकता पानी धीमी लालटेन , और घर में खाली बर्तन बस इतने से सामान से सजा था राम का घर !! अब वो बूढ़ा हो चला था !! पर उसकी यादो में अब भी वही छोटे और मुस्कुराते उसके बच्चे थे !! ऐसा नहीं था की राम के संस्कारो में कोइ कमी थी पर हवा कब रुख मोड़ ले कौन जनता हैं !! ऐसा ही राम के साथ भी हुआ उसके बच्चे अपने काम में व्यस्त हो गए बीवी गुजर गयी और घर खामोश हो गया बिलकुल वीराना सा !! बस कभी- कभी किसी के कदमो की आहट दरवाजे तक आती थी और राम को नींद से जगा देती थी !! ये आहट उसके यादो की थी जिसमे उसके बच्चे बस्ते थे हस्ते खेलते हुए !! पर ये सिलसिला भी ज्यादा दिन न चला !! इस बार आहट तो आई पर राम नींद से न जगा वो सो गया फुर्सत की नींद !! प्रिया मिश्रा :)
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तुम मेरे इंद्रधनुष हो अगर मैं खुश हूं और मुझे फूल चाहिए तुम्हारी हंसी मुझे खिलने देती है अगर मैं दुखी हूँ और, में रोना चाहता हूँ तुम्हारा चेहरा मुझे खुशी देता है ।। अगर मैं अपनी शक्ति खो देता हूँ मुझे ताकत चाहिए आपका शब्द मेरी मदद करता है ... तुम मेरी दुनिया हो .. मैं कैसे रह सकता हूँ .. अगर तुम मुझे छोड़ दोगे ... तुम मेरे इंद्रधनुष हो और मैं तुम्हारी बारिश हूँ ।। प्रिया मिश्रा :)
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चिड़ियों की शोर ने मुझे लगाया रात गुजार के फिर सुबह आया ये सुबह एक पहचान दे जायेगा जाते - जाते किसी को एक नाम दे जायगा मुझे मिलेगा सुबह का आशीर्वाद जाते - जाते शाम का किनारा दे जायेगा रात गुजारी चाँदनी निहारने में सुबह गुजरेगी दुआ मांगने में चलो कुछ नया मांगते हैं चलो जीना मांगते है प्राथना स्वीकार हो जाएगी आज सुबह भी मुस्कुरा रही हैं चलो आज एक वादा करेंगे खुद से हमेसा मुस्कुरायेंगे एक वक़्त आयेगा धीरे - धीरे जीना सिख ही जायेंगे || प्रिया मिश्रा :)
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घर के कोने -कोने में खामोसी थी बस एक लालटेन रोशन थी रखवाली करती हुई उसकी जिसने अपनी फर्ज से शायद ही मुँह मोड़ा हो , एक आहट हुई दरवाजा भी खुला रोशनी हलकी आ रही थी !! घर में कोइ आया और अपनी लापरवाहियों के लिए माफ़ी मांगने लगा वो रोता रहा लेकिन कमरे की खामोसी बरक़रार थी क्यूंकि तस्बीरे बोला नहीं करती सिर्फ सुना करती हैं !! कुछ कहा नहीं करती फिर तो ये माँ की तस्वीर थी, ये कैसे शिकायत करती !! प्रिया मिश्रा :)
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पहली बार जब इश्क का कारोबार चला था हवा जरा तेज था जब नदी को उस से प्यार हुआ था !! दोनों मिले एक ख्वाब देखा पर हवा कहा ठहरता हैं उड़ गया लेके नदी का बहता पानी नम हवा भरी सा न ठहरा न रुका जा के सिमट गया बादल में और बरस गया प्यार बन के , हो गयी धरती गीली - गीली ओढ़ी उसने चादर धानी करके नदी की चादर मैली !! प्रिया मिश्रा :)
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आज की सुबह बड़ी हसीन थी बादल रंगो में डूबे थे कुछ गुलाबी से , इंद्रधनुष निकला था सात रंगो ने मुझे बांध लिया जैसे ही हलकी सुबह में चाय की प्याली हाथ में ली तेरा वो अनकहा शब्द याद आया की , लौट आना मेरे लिए हमारे लिए लेकिन में नहीं लौट पाया इस शहर ने मुझे बांध लिया मैं तुम्हे भूल भी नहीं पाया तनहाई ने मुझे तुम्हे भूलने नहीं दिया तुम मुझमे बस के रह गए जैसे चाँद में रात छिप जाती हैं और दियो में शाम छिप जाता है फूलो में खुसबू की तरह मेरे , साथ - साथ रहे हमारे बिच दूरियाँ थी रास्तो की मंजिल फिर भी एक थी मिल जाना अनंत को समेट के || प्रिया मिश्रा :)
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तुम इस तरह मुझमे बस्ती हो की तुम्हारे बिना गुजारा अब मुश्किल लगता हैं !! वो सुबह की चाय में मिठास भी शायद तुम्हारे हाथो का रहा होगा तुम इसमें अपनी मुस्कराहट जो घोलती हो !! वो तेरा इतराना वो तेरा मुस्कुराना वो तेरा प्यार से गुस्सा दिखाना मेरा जीवन बन चूका हैं !! मैं अब मैं नहीं रहा तुम बन चूका हूँ और मुझमे अब हम घुल चूका हैं !! ऐसा नहीं की जिंदगी में मुस्किले कम हैं लेकिन एक तेरा साथ जाने क्यों थकान का एहसास ही नहीं होने देता !! मैं ग़ालिब नहीं लेकिन एक गजल लिखना चाहता हूँ तेरे नाम को , अपने कविता में घोलना चाहता हूँ !! जिस एहसास को लेके मैं जीता हूँ उस एहसास से तुझे भी जरा सा मिलाना चाहता हूँ की मैं तुझमे सिमट के बस तेरा रह जाना चाहता हूँ प्रिया मिश्रा
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सर्दिया आ गयी हैं | सर्दिया सुरु हो गयी हैं | मुझे बहोत पसंद हैं | आपको भी होगी | सर्दियों में हम जो चाहे खा सकते हैं | पकोड़े के साथ चाय का मजा बारिश के मौसम के बाद सर्दियों में आती हैं | गुनगुनी धुप और ओश की बुँदे दोनों अति लुभावनी होती हैं | गेंदे के फूलो से सारा बगीचा भरा रहता हैं | गन्ने की खेतो में सिर्फ गन्ने दीखते हैं | कम्बल, स्वेटर और पुलोवर का मौसम , "सर्दी का मौसम " | बच्चो के स्कूल की छुटिया भी रहती हैं इस मौसम में | सब कुछ कितना अच्छा होता हैं , हैं ना | लेकिन कभी सोचा हैं | कुछ लोगो को सर्दिया नहीं भी अच्छी लगती होंगी | कभी सोचा हैं क्यों ? क्युकी उनके पास सर्दी से बचने के लिए कुछ भी नहीं | खाने के लिए खाना नहीं | पहनने को स्वटर तो दूर की बात है, कपड़े तक नहीं हैं उनके पास | पकोड़े तो रहने दे उनके पास रोटी का भी सुख नहीं | कुछ लोग फुटपाथ पर ही ठन्डे से मर जाते है | तो ये मजे का मौसम हैं या बिदाई का ? सोचे ? मुझे लगता हैं ये सोचने का वक़्त नहीं हैं करने का हैं | तो कुछ करने की सोचे | जब भी आप किसी को सड़क पे ठन्डे से सिकुड़ते हुए देखे उन्हें एक कम्बल अवस्य दे ...
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मैं तुझमे जीना चाहती हूँ मैं मुस्कुराना चाहती हूँ मैं रोना चाहती हूँ तुझमे डूब के तुझमे खोना चाहती हूँ मैं तुझमे जीना चाहती हूँ || मैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे पंखो से मैं दुनिया देखना चाहती हूँ तुम्हारी आँखों से मैं तुझमे छिप कर रहना चाहती हूँ मैं तुझमे जीना चाहती हूँ || मैं सजना - सवारना चाहती हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए तुम्हारे आँखों में चमकना चाहती हूँ मैं तुझमे जीना चाहती हूँ || मैं सिर्फ तुम्हारे लिए , एक बार खूबसूरत लगना चाहती हूँ मैं तुझमे जीना चाहती हूँ || मैं तेरे लिए तेरी डायरी के, शब्द बन जाना चाहती हूँ तेरी कलम की स्याही बन जाना चाहती हूँ मैं तेरी कविता बन जाना चाहती हूँ मैं तेरी कहानियो में जीना चाहती हूँ मैं तुझमे जीना चाहती हूँ || मुझे मेरी खयालो से निकाल के अपनी पलकों में सजा लो सुनो , मुझे खुद में बसा लो मैं तेरी रूह में उतरना चाहती हूँ मैं तुझमे जीना चाहती हूँ || मैं तेरी कैनवास पे उतर जाना चाहती हूँ तेरी दिल की तस्बीर की तरह रंगो में डूब जाना चाहती हूँ मैं तूलिका बन के तेरी हाथो को छूना चाहती हूँ मैं एक...
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कागजी फूलो से ध्यान हटा के कभी असली फूलो को महसूस कर लो , क्या पता तुम्हारी आत्मा भी सुंगंधित हो जाये | कही मर न जाओ तुम चकाचौंध में बह कर कही ये बाहरी दुनिया तुम्हे डूबा न जाए जरा खुद से कुछ बातें कर लो कही लाश तुम्हारी सड़ जाये | अब ध्यान लगा लो अपनी आत्मा की खुसबू पे , क्या पता तुम्हारी आत्मा ही सुगन्धित हो जाये || प्रिया मिश्रा :)
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हर पुराने संदूक में यादे बंद होती हैं और किसी अँधेरे कमरे में दफ़न कर दी जाती है | कभी कोइ जाये तो खोले उन पुराने किताबो को कोइ सूखा फूल मिलेगा या कोइ मोर पंख दबा होगा पन्नो के बिच जो किसी ने दिया होगा हिर्दय से , जिसमे आज भी वो बस्ता है ऐसे, जैसे किताबो में कहानिया रहती हैं और कहानियों में इतिहास रहता है || प्रिया मिश्रा :)
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मैं और कविता ऐसे है जैसे आत्मा और शरीर जैसे दिया और बातीं जैसे कागज और स्याही जैसे कलम और शब्द सब एक दूसरे के बिना अधूरे हैं और मैं अपनी कविताओं के बिना | मैं बिना आत्मा के सिर्फ शरीर रह जाती हूँ बिना भावनावो के मिटटी की मूरत की तरह जो सबको देखती तो हैं सब कुछ जानती भी हैं पर जी नहीं सकती क्यूंकि उसको व्यक्त करना नहीं आता भावनाये नहीं हैं उसके पास इसलिए वो मूर्ति हैं और इसलिए हम इंसान हैं क्युकी हम अपने को व्यक्त कर सकते हैं शब्दों के माध्यम से | हम शब्द हैं और कागज भी हम स्याह हैं और कलम भी हम आत्मा हैं और शरीर भी हम कविता हैं और भाव भी हम सार हैं जीवन का और शब्दों का मान भी हम कविता में जीते भी हैं और मरते भी है || प्रिया मिश्रा :)
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मुझे लगता हैं सबको कवी होना चाहिए | कवी पर्वत में जान ला देता हैं | दीवारों से बातें करता हैं | और बेजान चाँद में खूबसूरती ला देता हैं | कवी की कल्पना हर चीज को जिन्दा कर सकती हैं | फूल मुस्कुरा सकते हैं | बादल रो सकता हैं | हवा झकझोर सकती है | नदियाँ अंगराईया ले सकती है | जमीं चादर हो सकती हैं और आसमान कम्बल बन सकता है | महबूब दूर भी हो फिर भी कल्पना में मिल सकते है | ये कवी ही हैं जो हर पल को जी सकते है | हर व्यक्ति में कवी जान ला सकता है | किसी को टूटने से बचा सकता हैं तो किसी के साथ शब्दों में रो भी सकता है | वो कही किसी के साथ शारीरिक रूप से न मौजूद हो लेकिन उसके शब्द सबको हँसा सकते सबको रुला सकते है | किसी के आँसू पोंछ सकते हैं और किसी के साथ मुस्कुरा सकते है | कवी की जान उसके शब्दों में होती है | तो आप भी कवी बने और शब्दो के साथ दोस्ती कर ले || सुप्रभात जय हिन्द जय भारत प्रिया मिश्रा :)
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सबको घर जाने की जल्दी हैं कोइ ट्रैन से जाता है | कोइ बस से जाता हैं | किसी की बैलगाड़ी लगी है | कोइ रास्तो के साथ सफर में है | कोइ हमसफ़र के साथ सफर में है | हमने धरती के बिछावन पर चाँद का सामियाना लगाया है | हमारा कोइ घर नहीं हम बंजारे है | न ही कोइ सफर हैं न ही कोइ मंजिल है || बस नदियों के तरह बहते हुए एक किनारे से दूसरे किनारे चलते जाना हैं || प्रिया मिश्रा :)
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|| आत्मशक्ति || आत्मशक्ति अर्थात आत्मा की शक्ति | ये वो शक्ति हैं जो आपको हारने नहीं देती | आपके बिश्वाश को जगाये रखती हैं | आपको आत्मनिर्भर बनाये रखती हैं | इस अमूल्य शक्ति को बाहरी प्रभावों से शक्तिहीन न करे | ये शक्ति आत्मा ज्ञान की देन है | परमात्मा की देन हैं | इसे स्वम के स्वार्थ वस या दुसरो के सस्वार्थ के लिए नष्ट ना करे | इस शक्ति का अपना एक आधार है | आप जितना दुसरो के साथ अच्छा करेंगे | जितना अच्छा सोचेंगे खुद के लिए और दुसरो के लिए ये शक्ति बढ़ती जाती हैं और आपके जीवन में उस वक़्त आपका साथ देती हैं जब आपकी परछाई आपका साथ छोड़ देती हैं | ये आपको प्रकाश की और ले जाती हैं | आपका मार्गदर्शन करती हैं | एक माँ की भांति आपका पालन करती हैं | पर जैसे ही हम नकारात्मक चीजों से घिर जाते हैं | नकारात्मक सोच रखने लगते हैं , ये शक्ति नष्ट होने लगती हैं और उसी परमात्मा के पास लौट जाती हैं जिसने ऐसे दिया था | तो ध्यान रखे जीवन में कोइ ऐसा कार्य न करे जिस से आपकी आत्मशक्ति नष्ट हो क्युकी ये सबसे पहला आपका नुकशान हैं | और एक व्यक्ति का नुकशान उसका परिवार का नुकशान है | समाज की हान...
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मैं ठहरी ओश की बून्द कहा धरती को अभी देखा हैं पल में गिरी पत्तो पर अभी तो फूल पे मुस्कुराया हैं मैं क्या जानु पत्थर क्या हैं ? क्या होता हैं माटी ? इतना कहाँ मुझे वक़्त ही मिलता कहाँ मैं इतना ठहर पाती ? जब धुप पड़ेगी मैं सुख जाउंगी जब पत्ती हिलेगा मैं टूट जाउंगी मैं कहाँ फूल पर अधिक समय मुस्कुरा पाऊँगी कोइ झोका तो होगा बेवक़्त का जो डाली से टकराएगा फिर मेरा घर कहा होगा फूल भी बिखर जायेगा || प्रिया मिश्रा :)
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सुनो द्रोपदी अब मत चीत्कार करो चलो उठो प्रयाश करो कृष्णा न फिर जन्म लेंगे चलो अब खुद ही पापियों का संघार करो || चूड़ामणि को उतार फेको न अब पितामह का ध्यान करो सारी सभा हमेशा मौन ही रहेगी न अब किसी का इन्तजार करो अब ना फिर सुदर्शन आएगा सुनो द्रोपदी , चलो अब खुद ही पापियों का संघार करो || अब गांधारी के बाते ना सुनना अब शार्प दे ही डालो अब ज्वाला फुटनी हैं सारे पापी जिसमे मारे जाये ऐसा एक और महाभारत की शुरुआत करो अब भीम प्रतिज्ञा न ले पायेगा सुनो द्रोपदी , चलो अब खुद ही पापियों का संघार करो || धृतरास्त अँधा ही रहेगा राजा खामोश ही रहेगा सारी नारी का मान तुमको अब ना किसी पापी का सम्मान करो अब धनुर्धर जन्म ना लेगा सुनो द्रोपदी , चलो अब खुद ही पापियों का संघार करो || अब धर्म संकट में हैं फिर धर्मराज न आयंगे पुराना महाभारत ख़तम हुआ अब शकुनि का संघार करो सुनो द्रोपदी , चलो अब खुद ही पापियों का संघार करो || प्रिया मिश्रा :)
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मैं जन्मी चाहे जिस कुल में हर कुल में मेरा नाम होगा एक कुल की रौशनी दूसरे कुल को भी जगमगाएगी हर नारी में वो शक्ति वो बिश्वशक्ति कहलाएगी || आज बंद कमरे में रहती कल सारा बिश्व मेरा धाम होगा एक धाम में पुण्य का लेखा एक धाम में पाप का लेखा जब छुएगा तू महिसासुर बन के वो कालरात्रि कहलाएगी हर नारी में वो शक्ति वो बिश्वशक्ति कहलाएगी || नाम उजागर मेरा काम उजागर मेरा कर लो स्मरण उस फूल को जो सुख के भी खुसबू फैलाएगी हर नारी में वो शक्ति हैं वो बिश्वशक्ति कहलाएगी || मुझे नजरो से मत आको मत कद से मेरा सम्मान करो मेरी आभा उज्वल हैं कुछ उसका भी ध्यान करो अँधेरा तेरा भी जायेगा जब प्रकाश तुझे छू जायेगा मैं तेरे अँधेरे का सूरज तेरे रोम - रोम में किरण भर जाएगी हर नारी में वो शक्ति हैं वो बिश्वशक्ति कहलाएगी || चाहे जितना तिरष्कार करो चाहे जितना इंकार करो वो जगतजननी ही कहलाएगी हर नारी में वो शक्ति वो बिश्वशक्ति कहलाएगी || कलयुग जब तांडव करेगा जब बिनाश मनुष्य पे छायेगा वो करेगा आँचल मैला मेरा और पतन को जायेगा उसकी आँखे भ्रमित होंगी बि...
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घर घर क्या हैं ? ईंट पत्थर का मकान | या जहाँ आप सुकून महसूस करते हैं |या जहाँ महसूस कर सके की आप सुरक्षित हैं कोइ ऐसी जगह | या जहाँ प्यार बस्ता हो एक परिवार बस्ता हो ऐसी जगह | सोचे ? मेरे ख्याल में घर एक ऐसी जगह हैं जहा प्यार बस्ता हैं | कोइ रहता हो उसमे, जिसने उस मकान को घर बना दिया हो | वो कोइ भी रिश्ता हो सकता हैं | जहाँ कोइ आपका इन्तजार करता हो | जहाँ रिस्तो की सही परिभसा मिलती हो | कोइ हो जिसके आँचल में बैठ के आप सुकून महसूस कर सके | कोइ हो जिसके कंधे आपकी ताकत हो | कोइ हो जिसका चेहरा आपको मुस्कुराना सीखा दे | कोइ हो जिसके हाथो की मिठास आपका भूख बढ़ा दे | कोइ हो जो आपको समझ पाए | जो आपके जीवन का अन्धकार मिटा दे ऐसा परिवार मिला के बनता हैं घर | तो मकान और घर में फर्क समझे | खुद को प्यार करे और दुसरो को प्यार दे | खुद का आदर करे और दुसरो को भी आदर दे | क्योंकी जो खुद का सम्म्मान नहीं करता उसका कोइ सम्मान नहीं करता | और जो खुद के परिवार का आदर नहीं करता उसे कोइ और परिवार आदर दे भी नहीं सकता | तो अपनों के प्यार के साथ अपन...
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प्रेम पत्र लिखने को तो लिख दूँ लेकिन भावनाये क्या स्याह रंग ले पाएँगी जज्बात क्या अक्षरों में सिमट पाएँगे क्या सब कुछ लिखा जायेगा जो अनमोल हैं इन मूक कागजो पे जो खुद खामोश हैं वो कैसे समझा पायेगा मुझे तुम्हे और हमें तो क्यों न इस पन्ने को खाली रहने दूँ खाली पन्ना और खामोश शब्द मैं लिख दूँ और तुम मुस्कुरा दो तो खाली कोरा पन्ना सतरंगी हो जायेगा !! प्रिया मिश्रा :)
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बंधन क्यों || मुझे जन्मा तूने बड़े लाड से फिर ये बंधन क्यों | क्यों पहनाये पैरो में पायल क्यों डाला हाथो में चूड़ियाँ क्यों कलम न पकड़ाया ऐसा भेद - भाव क्यों ? ये बंधन क्यों ? क्यों मैं आजाद नहीं क्यों मैं घिरी रही काले बादलो से क्यों मेरा वो इंद्रधनुष नहीं ऐसा भेद - भाव क्यों ? ये बंधन क्यों ? क्यों मैंने ही जाना स्वीकार किया क्यों खुद के आँगन का त्याग किया क्यों पुरषो ने छोड़ा नहीं अपनों का आंगन क्यों मैंने ही जलना स्वीकार किया क्यों मुझे ही बिदा किया क्यों पुरषो को घर में रखना स्वीकार किया ऐसा भेद - भाव क्यों ये बंधन क्यों ? क्यों मैंने पढ़ना नहीं सीखा क्यों मैंने जीना नहीं सीखा ये पायल की बेड़िया मुझे ही क्यों ये चूड़ियों की जंजीरे मुझे ही क्यों ऐसा भेद - भाव क्यों ? ये बंधन क्यों ? क्यों मैं जलती रही क्यों हैवानियत मुझे हर बार कुचलती रही क्यों कोइ स्वर न फूटे क्यों हर बार मैं मरती रही मुझे जन्मा था तूने बड़े लाड से फिर ये अपमानित मौत क्यों ? ये बंधन क्यों ? प्रिया मिश्रा :)
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स्त्री, पुरुष और समाज || हमारे समाज के दो ही अंग हैं | एक स्त्री दूसरा पुरुष | दोनों ही अपना - अपना स्थान रखते हैं | फिर ऐसी कौन सी चीज हैं जो इनको बाट देती हैं | सोच से जायदा कुछ भी नहीं | सोची ही हैं जो समाज को पुरषो का बल जायदा दिखता है वरना स्त्रियाँ पुरसो के मुकाबले जाएदा काम करती हैं | ये सबको पता हैं | वो घर भी देख लेती हैं | बहार का भी काम देख लेती हैं | बच्चे भी देख लेती हैं और खुद को भी संभाल लेती हैं | अगर पुरुष समाज का अभिन्न अंग हैं तो स्त्रियों को कम क्यों आका जाता हैं | ये बात मेरी समझ से बाहर हैं | बहरहाल , मैं यहाँ मेरी चर्चा का बिषय यहाँ "स्त्री" और "पुरुष" नहीं समाज की सोच को आइना दिखाना हैं | वो आईना जिसे हम रोज देखते तो हैं लेकिन खुद के अंदर झाकने की हिम्मत नहीं कर पाते | वरना जो शिव की पूजा करेगा वो शक्ति को नकार नहीं सकता | और जो शक्ति का उपाशक हैं वो शिव को नाकर नहीं सकता है || हमारे समाज में इसीलिए दोनों की पूजा का स्थान हैं | अर्थात बराबरी का स्थान | तो कमतर न आके चाहे वो स्त्री हो या पुरुष समाज निर्माड में सब...