आज जाने क्यों मन हुआ की शाम से कह दूँ की वो पाँव न पसारे !!
लेकिन क्या वो रुक जाती , वही जहा से चली थी गंगा किनारे
शायद नहीं , तो फिर क्यों न खुद को ही छुपा लूँ की ये
गुजरता वक़्त अब देखा नहीं जाता .............
की तेरी याद रह - रह के आती हैं .......
और शाम पाँव पसारे जाती हैं !!

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