आज शाम अँधेरा लिए खड़ा है सुबह भी जरा धीमी थी लगता हैं कोइ फिर सहीद हुई है बेटी जो अपनी थी | क्यों नहीं बनाते उसके भी मरने का शोक वो भी मरी थी तड़प - तड़प के अपने देश की आन बचाने को वो देश की बेटी थी जो लड़ते - लड़ते मरी है उसका भी एक घाट बनाओ माला पहनावों तभी तो पता चले एक वर्ष में कितनी बेटियाँ क़ुरबानी देती है | न तुम्हारा पूरा संसार छोटा पड़ जाये तो कहना इतनी बेटियाँ मारी जाएँगी की घर से बाहर तक सन्नटा छा जायेगा अब चुप हो तब तो जवाब दोगे ही जब भारत माँ का पूरा आँचल बेटियों के खून से रंगा जायेगा || अभी खेल लो जाट - पात धर्म का ढ़ोग रचा लो कल कोइ आंगन सुना होगा कल और एक कैंडिल मार्च होगा और बेगुनाह मारा जायेगा || ये रीत की तरह चली आ रही हैं बेटियाँ जानवरो के हाथो हर सेकंड मारी जा रही हैं आज रोने को दिल चाहता हैं बात ही कुछ ऐसी हो गयी हैं की , आज लड़ने को जी चाहता हैं || प्रिया मिश्रा |
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Showing posts from November, 2019
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अंधे , बहरे और गूंगे || हम अंधे हैं | हमारे सामने सबकुछ ख़राब होता जाता हैं | हम सिर्फ देखते हैं | हम गूंगे भी हैं , हम बोल नहीं सकते, साहस नहीं हैं | और हम बहरे भी हैं | सच्चाई हमें कभी सुनाई नहीं देती हैं | और इसमें प्रमाड की आवशक्ता नजर नहीं आती मुझे | सबकुछ हमारे सामने हैं | काला धुँआ , गंदे बिचार , सड़क पे बढ़ता ट्रैफिक और उस से बढ़ती बीमारिया | किसानो का मरना | खेतो में जहरीले कीटनाशको का छिडक़ाव | मनुस्यो के शरीर में बिष फ़ैल गया हैं | और वो दिन प्रतिदिन दूषित होता जा रहा हैं | पेड़ काटने से लेकर, मिलो के कचरे तक सब मनुस्य की अंधे आँखों का नतीजा हैं | बहरे इतने हो गए हम , हमें किसी की पुकार सुनाई नहीं देती | स्वार्थी इतने की सिर्फ खुद की बहनें दिखाई देती हैं बाकि की बेटियाँ नहीं | हमारे अंधे , गूंगे , और बहरे पन से सारी सृस्टि त्रस्त हैं | हमें कोढ़ लगा लगा हैं | अमानवीयता का कोढ़ | गुलामी का कोढ़ | स्वम के आगे कुछ नहीं दीखता हमें | जब शहर में प्रदुषण फैलता हैं तब लोगो को पेड़ दीखता हैं | ट्रफिको के धुएं दीखते हैं | और पहले मनमानी...
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डरना छोड़ दे या तो जित के आयंगे या हार जायँगे ये खेल हैं जीवन का डरना छोड़ दे || डरना छोड़ दे | हम जीवन में आधे समय डरते रहते हैं और इसी डर में सारी गलतिया करते हैं | किसी गुलामी, एक डर का नतीजा हैं | किसी को धमकाना, एक डर का नतीजा हैं | जो आपको धमका रहा हैं वो खुद किसी वजह से डरा हुआ हैं | तो उससे क्या डरना जो खुद ही डरा हुआ हैं | हमारा समय भी डरा हुआ होता हैं तभी तो हमें डरता हैं ताकि हम डर के गलतिया करे और वो मजा ले | दरहसल समय किसी को भी खुद से आगे नहीं जाने दे सकता यही उसका डर हैं | वो सोचता हैं अगर इसको डरा दूंगा तो ये गलतिया करेगा और मुझसे पीछे हो जायेगा | तो डरे नहीं डट के मुकाबला करे | सारी शक्तिया आपके अंदर हैं | शिव भी हैं शक्ति भी हैं | आप आपके पूरक हैं, खुद को पहचाने | आप खुद के आइना हैं जो देखोगे वही होगा | डर देखोगे , डर दिखेगा | तो डर पे विजय पाओ | जैसा मैंने पहले कहा हम खुद के आईना हैं | हम जो देखते हैं हमें वही मिलता हैं , जैसे कमजोर आदमी कमजोर आदमी को आकर्षित करता हैं , पापी - पापी को आकर्षित करता ह...
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'दिन है तू, रात मैं मिलें कहाँ, कोई कहे' नदी कहाँ किनारे से मिलती हैं टकराती हैं लौट आती हैं किनारा हैं तू , नदी मैं मिले कहाँ , कोइ कहे || तू चाँद सी चमकती हैं मैं सूर्य हूँ , तपता हूँ तू शीतल हैं मैं जलता हूँ चाँद हैं तू , सूर्य मैं मिले कहाँ, कोइ कहे ' एक दिन साँझ बन कर ढल जायेंगे फिर मिलेंगे कही और किसी और जगह जहाँ न तू दिन होगा न मैं रात होंगे , मैं मोती , तू धागा होगी , मिल के प्रीत की माला बनाएंगे कुछ इस तरह एक नया प्रेम हम जगायेंगे , मैं दीपक तू बाती बनना तू सुर मैं ताल बनूँगा मिलेंगे आज नहीं अभी नहीं इस जनम नहीं कही और किसी और जनम में तब ये न होगा मिले कहाँ , कोइ कहे , प्रिया मिश्रा :)
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तुमने आकर मेरे ख्याल को कुछ यु सजा दिया मेरे ईंट- पत्थरो के मकान को घर बना दिया !! जहाँ पहले पड़ी थी बेजान सी बरतने उसमे स्वाद जगा दिया तुमने मेरी ईंट पत्त्थरो के मकान को घर बना दिया !! कुछ बिखरा सा पड़ा था वो पुराना खाली जमीं का टुकड़ा तुमने उसे कुछ यूँ सजाया उम्मीद का पुराना वो फुल खिला दिया मेरे ईंट पत्थरो के मकान को घर बना दिया !! मेरी पुरानी यादो की किताबो में अब नया पन सा दिखने लगा हैं ऐसी कौन सी किरण से तुमने उन्हें भींगा दिया तुमने मेरे ईंट - पत्थर के मकान को घर बना दिया !! पहले मैं था मेरा अकेला वजूद खुद को ढूंढता था तुमने मैं को भुला के हम बना दिया मेरे ईंट पत्थर के मकान को घर बना दिया !!
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एक बार फिर वही फिर वही सोमवार मैं थकी हुई सी न सोई न जगी सारा इतवार गया बेकार उठाया सुबह का अख़बार शुरू किया दिन का पहला कारोबार !! वही पुरानी खबरे वही पुराना शोर ,कुछ नया नहीं ये जितने बेकार के शोर शराबे होते हैं , कुछ काम के क्यों नहीं होते ?? क्यों नहीं कोइ किसान मरता हैं हैं तो लोग सड़को पे उतरते हैं !! क्यों नहीं हंगामा होता हैं क्यों सिर्फ तमाशा होता हैं एक लेख छपता हैं सिर्फ शब्दों में क्यों कोइ किसान रह जाता क्यों नहीं वो हक़ पाता ?? क्यों नहीं जब कोइ इज़्ज़त तार-तार होती हैं तो कोइ हंगामा होता क्यों नहीं हवा दी जाती उस आग को जो सदियों से सीने में धधक रही हैं !! क्यों हर बार सबकुछ अच्छा न होते हुए भी शब्द चुन के डाले जाते हैं क्यों माप तोल के अख़बार के पन्नो पे स्याही डाली जाती हैं ?? क्यों नहीं सारे वाजिब मुद्दों पे आवाज उठाये जाते हैं !! क्यों रोज हजार नियम बनाये हजार तोड़े जाते हैं कोइ उफ़ तक नहीं करता जब सारे आम बेवजह लोग मारे जाते हैं क्यों नहीं कोइ हंगामा वहां होता जब कोइ सैनिक शहीद होता क्यों नहीं कोइ पन्ना अख़बार का उनकी शहादत के...
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प्राथना आज प्राथना स्वीकार होने वाली थी |कोइ लौट के आने वाला था | वो जो बरसो पहले छोड़ के गया था | जिसके पाँव के चिन्ह मिटते चले थे | पर एक आँगन था जो आज भी उसे ढूंढ रहा था | उसके माँ का आँगन उसकी बेवा का आँगन | आज एक चमत्कार होने वाला था | उसके आने की खबर हवाओ ने पहले ही दे दी थी | उसके खुसबू से पूरा घर महकने लगा था | जैसे वो दिल में छुपा बैठा था और आज आजाद हुआ हैं | वो फ़ौजी कई दिनों के लड़ाई के बाद घर आया था | उदाश बर्तन खनकने लगे थे | चूल्हे में खुसबू आ गयी थी | बच्चे दोबारा अपने पिता को देख पाए | और उसकी माँ को फिर से उस दर्द का एहसास हुआ जो उसके जन्म के समय हुआ था | बेटे से फिर मिलने की पीड़ा प्रसूति के पीड़ा से भी जायदा थी | और उसकी बेवा सफ़ेद साड़ी में एकदम उदाश दिन की तरह हो गयी थी | उसके नजर भर देख लेने से उसके सादे सफ़ेद कपड़ो में रंग बसने लगा था | उसके बिखरे बालो से मोगरे की खुसबू आने लगी थी | उसके आँखों में आसूं में काजल थे | और वो जिन्दा लाश की तरह एक टक निहार रही थी उसे | आज एक प्राथना जीती जगती दीखि थी | किसी के पिता के रूप में | किस...
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उसे लगा मैंने चाभियों का गुच्छा अपने कमर में बाँधा हैं || उसे ये नहीं दिखा मैं रात भर कमर दर्द से सोई नहीं मैं बस आधी नींद लेती थी उसके मुकाबले और लाँछन पूरा लिया था जितनी चाभियाँ थी उतने लाँछन थे || अब मैं आजाद हूँ सारा भार उसे देके अब बेपरवाही में राहत हैं || अब तो लांछन मिले या देश निकला सब मंजूर हैं अब मैं अपराधी हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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मैंने जिस बेटे के नाक तक साफ़ किये जिसके छोटी से छोटी जरूरतों का ख्याल मैंने रखा वो बेटा मुझे कहता हैं माँ तू बोझ हैं चली जा || माना मैंने एहसान नहीं किया मेरा स्वार्थ था वहाँ मेरा बेटा था कैसे छोड़ देती पर उस स्वार्थ का इनाम मुझे देश निकला देके मिला हैं हैं न बड़ा इनाम जिसपे हर माँ गर्व करे || प्रिया मिश्रा :)
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"इतने सादा हैं, बैठे हुए हैं खिड़की पर.." की लगता हैं , चाँद फलक पर पूरा हुआ सा हैं कोइ अमावश की रात में अपनी सादगी का इस तरह नमूना पेश करता हैं की चाँद भी ग़ज़ल लिखने को अमावश में दिखा करता हैं !! हैरान हूँ मैं क्या कहुँ की उनकी शादगी के चर्चे इतने हैं , हर गली में उनके दीदार को मेला लगा करता हैं !! मैं अकेला दीवाना नहीं मैं अकेला आशिक नहीं की उसकी शादगी के चर्चे में पूरा कायनात हुआ करता हैं !! प्रिया मिश्रा :)
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मोक्ष का रास्ता एक हैं उसे ज्ञान कहते हैं और उस ज्ञान से साक्षात्कार करने वाले को भगवान कहते हैं उसे इस पृथ्वी पर गुरु का स्थान दिया गया हैं !! भगवान गुरु होते हैं पर सारे गुरु भगवान नहीं होते !! गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः प्रिया मिश्रा :)
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जब आप सुबह निकलते होंगे अपनी बहोत ही व्यस्त कार्यकाल के लिए | आपको कभी रस्ते में एक चाय वाला मिला होगा | वो भी निकला होगा आज कुछ बिक जाएगी चाय तो घर की नई जरूरतों की चीजे लाऊंगा | कोइ अँधा रास्ता पार करता हुआ दिखा होगा | बसे भागती हुई दिखी होंगी | दुकाने मुस्कुरा का आपका इन्तजार कर रही होंगी | मंदिर की घंटिया आपको आकर्षषित करती होंगी | कही से चाय समोसे की खुसबू आती होंगी | कोइ खिलौने बेचता मिला होगा | रस्ते में झगड़ते हुए लोग भी मिले होंगे | नालियों की बदबू भी मिली होंगी | कोइ रोता हुआ भी दिखा होगा | किसी पुराने दोस्त ने भी आवाज दी होगी | कोइ आपसे रूठ के नजरे चुरा के बैठा होगा | कोइ आपका इन्तजार करता होगा | किसी ने आपका मजाक उड़ाया होगा | रोज हजारो बातें हुई होंगी | लेकिन आप नहीं रुके होंगे | आप अपने कार्य में व्यस्त रहे होंगे | फिर आजा कोइ छोड़ के चला गया तो क्यों रुक गए | जाने वाले को क्यों याद करने लगे | कल यही आपके एक मित्र के साथ हुआ था तो आपने कहा था | होता है यार जाने दे | नई मिल जाएगी | जिंदगी थोड़ी न ख़तम हुई हैं | फिर आपकी जिंदगी कहाँ ...
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अंगूठी (संवाद) अच्छा ये बताओ ये सगाई में अंगूठी क्यू पहनाते हैं | अंगूठी इसलिए पहनाते हैं ताकि जिसके साथ नई दुनिया सुरु की हैं उसी के साथ ख़तम हो | देखा नहीं छल्ले में कोइ कट नहीं होती बिलकुल गोल सा होता हैं | जो भी रिस्ता बने उसका अंत न हो उसका सिरा न मिले वो बस चलता जाये एक एहसास एक प्यार के साथ || प्रिया मिश्रा :)
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मैं चांदनी निहारना चाहता हूँ मैं तेरा इन्तजार करना चाहता हूँ आज जरा देर से आना बालो में गजरे डालना आँखो में काजल लगा के आना मेरी नजर आज लग जाएगी मैं आज चांदनी निहारना चाहता हूँ || वो शादी वाली सिल्क की साडी वो कमरबंद तुम्हारे हाथों को चूड़ियों से भर देना हां , खुद की नजर आज उतार लेना मेरी नजर लग जाएगी मैं आज चांदनी निहारना चाहता हूँ || बेली की खुसबू से सजा तुम्हारा गजरा आँखों में मीठा सा कजरा और लाली जरा धीमी लगाना रात को नजर लग जाएगी जरा काली हो जाये तब आना मेरी नजर लग जाएगी मैं आज चांदनीनिहारना चाहता हूँ || जरा रुक के आना चाँद छुप जाये तब आना सितारों को अपने आँचल में सजा लेना मैं चांदनी को नजदीक से निहारना चाहता हूँ मैं जुगनुओं से बातें करना चाहता हूँ आज जरा घूँघट लेके आना मेरी नजर लग जाएगी मैं आज चांदनी निहारना चाहता हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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परिणय परिणय कोइ बंधन नहीं एक वादा हैं | एक साथ खुद को साँझा करने का कसम लिया जाता हैं वो परिणय हैं || परिणय कोइ बंधन नहीं एक वादा हैं || परिणय एक बिस्वाश हैं खुद को और जानने की एक प्रथा हैं ये दिल को टटोलने का एक बहाना हैं परिणय कोइ बंधन नहीं एक वादा हैं || इस साथ में कोइ किसी का खास हो जाता हैं एक हल्का पतला धागा जुड़ता हैं और धीरे - धीरे वो गहरा हो जाता हैं जो कल तक पराया हैं वो अपना हो जाता हैं कुछ अधूरा को पूरा करने का एक ताउम्र चलने वाला एक प्रयाश हैं परिणय कोइ बंधंन नहीं एक वादा हैं || यहाँ शब्दों का कोइ मोल नहीं यहाँ जज्बातो को आगे किया जाता हैं एक थक जाये तो दूसरा उसे गले लगा लेता हैं ये सामजिक नहीं ये आत्मिक रिस्ता हैं परिणय कोइ बंधन नहीं एक वादा हैं || इसमें किसी का सवाल करना एक प्रेम दिखाता हैं किसी को किसी को खोने का डर ही तो प्रेम कहलाता हैं परिणय में अपना अच्छा बाद में आता हैं वो अजनबी दिल को इतना भाता हैं इसमें कोइ ऊपर नहीं आता हैं ये बराबरी का एहसास दिलाता हैं परिणय कोइ बंधन नहीं एक वादा...
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इंसानियत मरती जा रही हैं || इंसान "इंसान " को भूलता जा रहा हैं बिस्वाश की डोर अब टूटती जा रही हैं इंसानियत मरती जा रही हैं || अब सर्दी में बारिश होती हैं गर्मी में सर्दी लगती हैं और सर्दी में धुप कड़ाके की होती हैं प्रकीर्ति भी अब बदलती जा रही हैं इंसानियत मरती जा रही हैं || लोग किसी का बदला किसी से लेते हैं तानो से मासूम लोग मारे जाते हैं मासूमियत अब खंजर लिए घूमते फिरती हैं इंसानियत मरती जा रही हैं || धर्मो के नाम पर अब रोज नए खेल खेले जाते हैं तलवार उठते ही कई सर गिर जाते हैं अब कोइ किसी का भाई नहीं अब कोइ किसी की बहन नहीं अब अँधेरा आगे बढ़के उजाले की मासूमियत छीनते जा रहे हैं || इंसानियत अब मरती जा रही हैं || प्रिया मिश्रा :)
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पुनर्जन्म आंधी आये तूफ़ा आये अब तो पर्वत को पिघलना होगा पुनर्जन्म तो लेना होगा || चली आ रही हैं जो घडी उस घडी को बदलना होगा समय अब चाल बदलेगा दिशाओ को भी संभालना होगा पुनर्जन्म तो लेना होगा || ये आग अब जलती रहेगी रात को दिन दिन को रात में ढलना होगा पुनर्जन्म तो लेना होगा || मरना जीना तय हैं दो धारी तलवार की अब सिने पे नहीं झेलेंगे कहा सुनी बहोत हुई अब तो बिगुल सगुन का बजना होगा पुनर्जन्म तो लेना होगा || प्रिया मिश्रा :)
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मैं अब प्रतिकार करुँगी मैं अब प्रतिकार करुँगी सजा जो भी हो मंजूर हैं || मैं अब नहीं स्वीकार करुँगी मैं अब प्रतिकार करुँगी माना श्राप हैं मुझपे मेरे पूर्वजो का पर अब सबको झुकना होगा अब चट्टान को भी पीघलना होगा मैं अब नहीं स्वीकार करुँगी मैं अब प्रतिकार करुँगी || जीना मरना तो भ्रम हैं इस जीवन चक्र को अब बदलना होगा कही तो बर्फ को अब पिघलना होगा कोइ तो आग जलनि होगी किसी को तो मरना होगा मैं मरना स्वीकार करुँगी मैं अब प्रतिकार करुँगी || प्रिया मिश्रा :)
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तुम मिलना मुझे तुम आज मत मिलना अभी मत मिलना अभी चाँद तुम्हारे आँगन में होगा और चांदनी पंखा झेल रही होगी मुझे तुम तब मिलना जब तुम्हे एक रोशनी चाहिए होगी मैं तुम्हारे रस्ते में जुगनू बिछा दूंगी मैं तुम्हे अंधेर में भी पहचान लुंगी || मुझसे तुम आज बाते मत करो आज नजरे फेर लो आज कोइ एहसान नहीं चाहिए मुझे मुझे तुम तब मिलना जब तुमसे कोइ बातें करने वाला न हो जब तुम्हारे होंठ सिले हो जब तुम्हारे पास शब्द न हो || मैं तुम्हारे शब्द बन जाउंगी मैं तुम्हारी राग बन जाउंगी तुम्हारे कंठ को सुरीला कर दूंगी और तुम्हारे कानो में फूलों के शब्द डालूंगी मैं तुम्हे अंधेर में भी पहचान लुंगी || मुझे तुम आज मत मिलना मुझे तुम अभी मत मिलना आज तुम्हारा आँगन हरा - भरा हैं तुम्हे मेरी जरुरत नहीं हैं मुझे तुम तब मिलना जब तुम्हारा आँगन उदाश हो जब तुम्हे अकेलेपन का एहसास हो मैं तुम्हारे आँगन को हरा - भरा कर जाउंगी मैं तुम्हारे अकेलेपन को मिटा दूंगी मैं तुम्हे इंद्रधनुष की तरह सजा दूंगी मैं तुम्हे अंधेर में भी पहचान लुंगी || मुझे तुम आज मत मिलना मुझे तुम अभी मत मिलना अभी...
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मेरा जन्म मेरा जन्म एक उदेस्य हैं एक श्राप हैं एक सबक हैं और एक कहानी हैं || मेरा जन्म एक छाँव हैं कड़ी धुप हैं शीतल हैं और आग हैं || मेरा जनम एक ऋण हैं एक कर्ज हैं एक अपमान हैं एक सम्मान हैं || मेरा जन्म एक पेड़ हैं एक फल हैं और कुछ फूल हैं || मेरा जन्म एक अभिशाप हैं एक प्राथना हैं एक मंजिल है एक रास्ता हैं || मेरा जन्म मैं हूँ मेरा सपना हैं मेरा अतीत हैं मेरा आज हैं और कल भी हैं || मेरा जन्म एक सिख हैं एक सबक हैं एक सचाई हैं एक झूट हैं || मेरा जन्म कोइ पाप हैं किसी का पुण्य हैं और कोइ पुण्य हैं || मेरा जन्म एक आसा हैं एक निराशा हैं कोइ किताब हैं एक पन्ना हैं कुछ कोरा हैं कुछ भरा हैं || मेरा जनम एक रिस्ता हैं किसी रिश्ते का श्राप हैं किसी का बोझ हैं किसी का आँगन हैं किसी का अभिमान हैं और किसी का कलंक हैं || प्रिया मिश्रा :)
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रिस्ता खंजर की तरह चुभे थे वो शब्द जब उसने कहा था | उसका मेरे परिवार से कोइ रिस्ता नहीं हैं | उसे परिवार का मतलब भी नहीं पता उसने रिस्ता तोड़ दिया || उसने उस माँ का अपमान किया जिसने उसकी कमिया छुपा दी | उसने उस बहन का अपमान किया जिसने उस से जायदा किसी को माना ही नहीं | एक अंधेर दिए ने सब कुछ बुझा दिया || आये दिन उसके ताने चुभते थे और जो अपना था जिस से वो सारी बातें कह सकती थी उसने भी सारे रिश्ते तोड़ दिए || अब वो क्या करती कहाँ जाती उसने खुद को बंद कर लिया और अब शिकायत भी किस से करे जिस से कर सकते थे उस ने कभी सुना नहीं | अब न शिकायते हैं न ताने हैं || मरना भी होगा तो सुकून से कमसे कम कोइ दाने देखर उसका हिसाब तो न लगाएगा || कोइ ये तो न कहेगा खुद की रोटियां खुद ही सेक लो || प्रिया मिश्रा :)
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मेरे सपने में जो बरगद का पेड़ बाहें फैलाये खड़ा था वो मेरा था उसकी जड़े जमीं की छूती हुई जमीं में जम गयी थी ऐसा लगता था माँ से लिपटा कोई बच्चा सो रहा हो | उसके शीर्ष ऊपर तक गए हुए देखो तो आखे चौंधिया जाये वो आसमान को छूता हुआ और दूर तक फैली उसकी डालियाँ जैसे बाहें फैला के मुझे समेट लेगा | उसके जड़ो के किनारे - किनारे हजारो नन्हे पौधे सबका पालनहार वो सबकी तरफ अपनी छाँव बिखेरता और धुप से खेलता मेरा पेड़ मेरे सपनो का पेड़ मेरा बरगद का पेड़ | जिसके सब दीवाने थे पर वो मेरा दीवाना था उसके बाहों में मैं झूला झूली और सपना भोर तक चलता रहा सुबह हुई और वो पेड़ कल का वादा देके चला गया | मेरा पेड़ मेरे सपनो का पेड़ || प्रिया मिश्रा :)
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पवन ने बादल से कहा मैं ऐसा नहीं हूँ बादल टूट गयी और बरस गयी वो उसके आसूँ थे || और क्या करती उसके अहसास को अमानवीय शब्दों में तोला गया और वो फुट गयी || ऐसा भी कोइ करता हैं कोइ याद करे तो प्रश्न उठाये और छोड़ जाये || पर ये हुआ हैं तभी तो आज भी जब पवन बादल से टकराता हैं बादल फुट जाती हैं और उसके आसूँ बह जाते हैं || प्रिया मिश्रा :)
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हवा बिक रही हैं || पहले जमीर का सौदा हुआ फिर मिट्टी का सौदा हुआ बाद में बिकी पानी अब हवा भी बिकती हैं बाजारों में ये आधुनिकता हमें कहा घसीट लाई || जमीर के सौदे में चुके नहीं होंगे ये लोग दोषारोपण कर के बचते रहे ये लोग आज बात खुद पे आई तो बच के निकल लिए कल आएगी तो बेच के निकल लेंगे || ये सोच नहीं हैं एक काला धुँआ हैं जो सबको निगल रहा हैं || तभी तो आज हवा भी बड़े आबरू से बिक रहीं हैं || प्रिया मिश्रा :)
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एक पुराना खत एक पुराना खत मिला पुराने अलमारी के पुराने से संदूक में बंद था पुरानी चीजों के साथ बंद वो पुराना ख़त पिले रंग का हो गया था जैसे उसे धुँआ खा गया हो उसे आग लगी हो लेकिन जल न पाया हो वो समेटे था एक तड़प एक आह एक समर्पण और एक बिस्वाश एक रिश्ते को समेटे था ये पुराना खत एक चोट को छिपाये था एक राज थी जो शब्दों में छिपी थी जिसमे पहले शब्द थे मेरी और आखरी तुम्हारा आगे के शब्द मिट गए थे और मिटे हुए शब्दों के साथ रिश्ते भी धुंदले हो गए थे जाने कौन थी मेरी और जाने कौन था तुम्हारा || प्रिया मिश्रा :)
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तुम मेरे हो || मैं प्रेमिका हूँ तुम्हारी मैं तो ये बताउंगी तुम कैसे हो तुमसे सीधे न मिलु तुमसे सीधे बात न करू पर एहसास दिलाऊंगी मैं प्रेमिका हूँ तुम्हारी मैं तो बताउंगी तुम मेरे हो || तुम्हे एक पल के लिए भी एहसास न आने दूंगी तुम अकेले हो तुम्हारे साथ रहूंगी सामने से न आऊँ शब्दों से एहसास दिलाऊंगी मैं प्रेमिका हूँ तुम्हारी मैं तो ये बताउंगी तुम मेरे हो || तुम्हारा पसंद तुम्हारा नापसंद तुम्हारी हसीं तुम्हारा गम सब मेरे मेरे हैं तुमसे जुडी छोटी सी छोटी से छोटी बात मेरी हैं और मुझसे जुडी छोटी से छोटी बात तुम्हारी हैं ये एहसास दिलाऊंगी मैं प्रेमिका हूँ तुम्हारी मैं बताउंगी की तुम मेरे हो || प्रिया मिश्रा :)
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समय और परिस्थितिया आपका समय कैसा चल रहा हैं और दुसरो के पास कैसी परिस्थति हैं इस बात पर आपका मूल्याङ्कन होता हैं | अगर आपका समय बुरा हैं और दूसरे का अच्छा तो आप का अस्वीकार होना स्वाभाविक हैं | क्यूंकि सामने वाले के पास आपसे अच्छा विकल्प हैं वो क्यों आपको लेगा || इस बात को ऐसे समझे | आप के पास तीन गुलाब के फूल हैं हरा नीला और पीला और आपको इनमे से किसी एक को लेना ही लेना हैं वरना आपका स्वीकार होना मुश्किल हैं | आप क्या करेंगे आपको तीनो ही नहीं पसंद , लेकिन एक लेना हैं | आप तीनो को देखेंगे जैसे नीला और हरा आपको बिलकुल नहीं पसंद तो पीला गुलाब आपका विकल्प होगा | इस समय पिले गुलाब का समय सही हैं और आपकी परिस्थितिया गलत | अब आपके पास एक और विकल्प आ जाये एक और विकल्प उसमे डाल दिया जाये लाल गुलाब का | अब आप क्या करेंगे अगर लाल गुलाब आपका पसंदीदा हो | आप लाल गुलाब को लेंगे | यहाँ पर पिले गुलाब को अस्वीकार किया जायेगा | तो हमेसा याद रखे आप का कभी भी प्रतिस्थापन हो सकता हैं || आपका स्वीकार किया जाना सामने वाले की मज़बूरी भी हो सकती हैं | ...
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सुन रे कहानी जिस कहानी का कोइ नहीं शीर्षक होता | जिस कहानी का कोइ नहीं उदेस्य होता | वो कहाँ प्रसिद्धि पाती हैं | बिना नाम की कहानी गुमनाम हो जाती हैं || सुन रे निंदक मैं गुमनाम होके भी प्रसिद्धि पा लुंगी | मैं आज गुमनाम कहानी हूँ | एक दिन मैं इतिहास बना लुंगी || सुन रे कहानी तू खुद में गुमान ना खा | न खुद को ईश्वर बता | तू बिना शीर्षक की | कहाँ तक जाएगी | तू कुछ भी कर | तू गुमनाम हो जाएगी | सुन रे निंदक , तेरा बिस्वाश धोका खायेगा मैं पर्वत सी खड़ी रहूंगी मेरा पन्ना - पन्ना फिर से लिखा जायेगा तू भी देखेगा कल का मेरा सबेरा मैं ग्रंथ बन के पूजी जाउंगी और तू निंदक ही रह जायेगा || प्रिया मिश्रा :)
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जब - जब पाप चरम पर होगा | जब बात होगी देश के सम्मान की | मैं रानी लक्छमी जन्म लुंगी | और किसी अवतार में || मेरा न कोइ सागा हैं | मेरा न कोइ अपना सपना हैं | मैं देश की बेटी हूँ | सारा देश ही मेरा अपना हैं | लड़ूंगी | मरूंगी | मारूंगी | जब कोइ नाग फ़न उठाएगा | मैं उसे कुचल दूंगी | मैं रानी लक्छमी बाई | मैं फिर जनम लुंगी || प्रिया मिश्रा :)
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ये न्याय क्यों की करे कोइऔर भरे कोइ | अगर ये न्याय बेवस्था हैं तो बदल डालो | वरना भरने वाला पिस्ता रहेगा | और एक वक़्त आएगा जब सब कर्जदार होंगे और सब भरेंगे | पाप को पाप नहीं मारता | पुण्य को जनम लेना ही पड़ता हैं | चाहे वो हजार निर्दोष को मार के जनम ले या लाख | लेकिन जितने निर्दोष मरेंगे उतना ही देरी से पुण्य जनम लेगा || और उतनी ही देरी से पापो से मुक्ति मिलेगी || विकल्प हमारे पास हैं | मुक्ति आज या कभी नहीं || प्रिया मिश्रा :)
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बेहतरीन वक़्त के लिए क्या किया जाये | कुछ यूँ किया जाये | उसके कदम से कदम से मिला के चला जाये | कही तो पहूँच ही जायेंगे | नदी के किनारे - किनारे जाओ | तो शहर आ ही जाता हैं | बसेरा मिले न मिले एक ठोकर लगती हैं और फिर से कोइ किनारा मिल ही जाता हैं | और फिर एक नए शहर की तलाश | हम बंजारों को और क्या चाहिए || प्रिया मिश्रा :)
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इस साल का सबसे बेहतरीन पुरस्कार मुझे मिला हैं | पुरे साल के परिश्रम का पुरस्कार कुछ यूँ हैं जो मेरे आखरी मंजिल तक जायेगा ये वो पुरस्कार हैं जो मुझे बुरे सपने की तरह डरायेगा | बारिश होगी | और बादल सुख जायेगा | ये वो तमगा हैं, जो सिर्फ मुझे मिलेगा कोइ और हकदार नहीं इसका ये ईमानदारी का गवाह हैं ये तौफा मुझे "मुझसे " मेरा परिचय कराएगा | इस साल का पुरस्कार मुझे "मुझसे" मिला के जायेगा || प्रिया मिश्रा :)
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मुझे तलाश हैं एक एहसास की | एक साथ की | एक दोस्त की | जो मेरी सुने और सुनता रहे || मुझे तलाश हैं | एक जीवन की जहाँ मैं भी जिन्दा हूँ ये पता चले || मुझे तलाश हैं | कुछ शब्दों की | एक शोर की | जहाँ कोइ खामोसी न हो | जहाँ मैं चिल्ला सकूँ | जहाँ मैं रो सकूँ | जहाँ मैं हँस सकूँ|| मुझे तलाश हैं | उस जौहरी की | जो मुझे पत्थर से | आफताब बना दे | जो मुझमे से कमिया निकाल दे | जो मुझे जरा सा सराहे | जो मेरी छिपी रोशनी को बाहर लाये || मुझे तलाश हैं | एक कोरे कागज की | जो मुझे कहानी बनाये | जो मेरा इतहास लिख जाये | और मैं अमर हो जाऊँ || मुझे तलाश हैं उस जीवन की | जहाँ भले ही मौत मुझे गले लगा ले | लेकिन मैं जिन्दा रहूँ | प्रिया मिश्रा :)
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सोया हुआ आदमी जब कम्बल छोटा पाता हैं तो कभी सर को कभी पाँव को छिपाता हैं !! जब न छिप पाए पाँव न छिप पाए सर , वो खुद कुछ नहीं करता जाकर लम्बे कम्बल वालो के वहाँ अपनी गरीबी का गुहार लगाता हैं कभी दरवाजा खुलता हैं कभी दुद्कार दिया जाता हैं !! जब न खुले दरवाजा तो खाली हाथ लौटे और जब खुले तो रंगा सियार आता हैं वो देता हैं कम्बल के झांसे और थूक के लार टपकता हुआ चला जाता हैं कम्बल का भूखा कुछ थूक चाटता हैं कुछ वही रह जाता हैं जो थूक बचा उससे एक और नया रंग बनता हैं जो , एक और नया सियार बनता हैं रंगा हुआ !! और जो चांट गया वो फिर दुसरो को वही थूक अपने मुँह से थूक के चतवता हैं !! पर हैरत की बात ये हैं की कम्बल आज भी छोटा ही हैं !! और सियार बढ़ गए हैं थूक से धरती गीली हो गयी हैं आज और भी कड़ाके की ठण्ड लगती हैं पर कम्बल आज भी छोटा हैं न पाँव ढका न सर लेकिन थूकने की कला जारी हैं !! प्रिया मिश्रा !!
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प्रेम परिचय ( भाग २ ) मैं वापस आ गयी | सुबह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा था | वो मुझे बार - बार चिढ़ा रहा था | उसकी बातें मैं नहीं भूल पा रही थी | सोचते - सोचते और रोज के कामो में दिन गुजर गया | शाम अभी बाकि थी | कोइ और कहानी नई आनी थी | मैं शाम को बाबा के लिए चाय लेके गयी वो उनसे बाते कर रहा था | दरहसल मेरे और शर्मा अंकल के घर में सिर्फ दो दरवाजो का फासला था | तो शर्मा अंकल मेरे बाबा सब साथ - साथ ही शाम की चाय लेते थे | उसे देखते ही मुझे सुबह की सारी घटना याद आ गयी | मैंने बाबा और शर्मा अंकल को चाय दिया और जाने लगी | बाबा बोले अरे बेटा श्रवण को भी चाय दो | पहली बार उसका नाम सुना | वो अब भी मुझे देख के मुस्कुरा रहा था | मैं एक और प्याली लाने चली गयी | जब वापस आई बाबा को पहली बार मुस्कुराते हुए देखा दिल से | लोगो के लिए तो सभी हस्ते हैं | पर खुद के लिए हसना कितना मुश्किल हैं ये कोइ मेरे बाबा से पूछे | उसके चेहरे की हसी अम्मा के साथ चली गयी थी | मुझे बाबा का मुस्कुराना अच्छा लगा और मेरी श्रवण से दुश्मनी भी जाती रही | एक बेटी के लिए उसके बाप से बढ़कर...
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प्रेम परिचय ( कहानी ) मैडम आपने इतनी अच्छी किताब लिखी हैं | "प्रेम परिचय " | मैं चाहता हूँ इसे पढ़े बाद में पहले आपके मुँह से सुने | आपमें इतनी प्रतिभा हैं | मैं कल ही प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलवाऊंगा | आप जैसा समझे काका और हाँ मुझे बेटी कहे मैडम नहीं | अच्छा तो पिता के हैसियत से मेरी बात मान लो | और इस प्रेम का परिचय सबसे करवावो | क्या पता वो शब्द तुम्हे खुद ढूंढ ले जिसके पन्ने तुमने कोरे रखे हैं | वो नहीं मिलेगा काका वो अतीत था | अतीत कहाँ वर्तमान से परिचय करता हैं | सच्चे मन से याद करो तो अत्तीत भी वर्तमान बन के वापस आ जाता हैं बेटे | अच्छा चलो कल मिलते हैं | अगली सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस -- मैम आपके कहानी का शीर्षक तो बहोत अच्छा हैं | जरा बताएंगी हमें | क्या बताऊ आप पूछे मैं उत्तर दूंगी | ये कहानी किसके लिए हैं ? ये कहानी नहीं हैं | ये एक प्रेम हैं जो प्रेम को समर्पित किया गया हैं | ये मेरा प्रेम हैं | अब वो प्रेम कहाँ हैं ? पता नहीं द्रश्य रूप से कहाँ हैं पर अद्रिश्य रूप से सदा मेरे हिरदय में वाश हैं उसका | आप काफी भाउक हैं मैम | अच्छा आप इसके जरिये क...
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ये वक़्त एक ठहराव चाहता हैं | वो थक गया हैं | रुकना चाहता हैं || वो छाले महसूस कर रहा हैं | उसके पाँव जख्मी हैं | वो रो नहीं सकता | एक ख़ामोशी चाहता हैं | ये वक़्त एक ठहराव चाहता हैं || पहचान कर ले खुद की | वक़्त भी थोड़ा वक़्त चाहता हैं | ये मसला हैं | आत्मा की पहचान का | ये मसला हैं | कुछ टूटे अरमान का | वो सिमट कर खुद में | कुछ जोड़ना चाहता हैं | कुछ रफू कर ले जिंदगी | कुछ मोड़ना चाहता हैं | ये वक़्त एक ठहराव चाहता हैं || प्रिया मिश्रा :)
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उर्दू के अल्फाजो को लफ्जो में लाने को ताउम्र तरसते रहे एक करिश्मा सा हुआ और हम वही ठिठकते से रहे इश्क बन के आया उस्ताद हम लम्हा -लम्हा उर्दू सीखते रहे जब हुआ इश्क का आगाज अल्फाज लफ्जो में आ गए जज़बातो में सिमट कर फ़सानो में पनप गए !! हंगामा न हुआ न कोइ शोर था कम्बखत इश्क पर किसका जोर था बस समझिये इश्क ही था उस्ताद और हम रफ्ता - रफ्ता उर्दू समझ गए !! प्रिया मिश्रा
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वो दिन || वो दिन वो तारीख वो माह वो साल मैंने समंदर में डाले मैंने गंगाजल मुँह में डाला खुद का तरपन किया फिर मुखाग्नि दी खुद को और पुरानी यादो के साथ मैंने खुद का अंतिमसंस्कार किया || बड़ा मुश्किल था खुद को मारना लेकिन "हम" से "मैं" के लिए एक बार जलना पड़ता हैं रोज सुलगने से अच्छा हैं प्रिया मिश्रा :)
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जब आप खुद के साथ होते हैं | आप सब से अच्छे इंसान के साथ होते हैं | क्युकी वो आपसे झूट नहीं बोलता | तो खुद से बाते करे| खुद की कमिया निकाले | खुद को निखारे || खुद के साथ जरा वक़्त गुजारे || अपने आप को जायदा समझने का प्रयाश करे | क्युकी जो खुद को नहीं समझ सकता वो दुसरो को नहीं समझ सकता | आपका पूरा संसार आपके अंदर बस्ता हैं | तो , अपने संसार को सवारे | और , अपने साथ जायदा से जायदा वक़्त गुजारे || प्रिया मिश्रा :)
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एक शाम ढले मैं दूर निकल जाऊ | क्षितिज के उस पार विलीन हो जाऊ | मैं भी ढल जाऊ और कभी और आऊँ एक नया सबेरा बन के | लुका - छुपी खेलु और छिप जाऊँ फिर सब मुझे ढूंढे | और मैं दूर खड़ी मुस्कुराऊँ | एक शाम ढले मैं दूर निकल जाऊँ | कही पहाड़ो में छुप जाऊँ | पत्तो से खेलु | चादर लेलु आसमा के और स्वर्ग तक धरती नाप के आऊँ | कभी - कभी ख्वाबो का सामियाना अच्छा लगता हैं || और कभी - कभी दूर चले जाना अच्छा होता हैं || प्रिया मिश्रा :)
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शाम पिघल कर पहले गुलाबी हुआ | फिर पिघला मटमैला हुआ | और अब रात में बदल गया | ये गुजरा नहीं बदल गया | कल रात बदल जायेगा | और फिर सुनहरी सुबह हमारा स्वागत करेगी | हम फिर से जन्म लेंगे | एक नए कल में | और आज का कल कहानी बन जायेगा | तो अच्छा करे की कहानी अच्छी हो | अच्छा बोले ताकि कहानी के शब्द सुद्ध हो और आत्मा में घुल जाये | चारो तरफ शांति हो | चारो तरह प्रेम हो | और हम कल फिर गुलाबी शाम देख पाए | और परसो फिर एक कहानी बने | और हम धीरे - धीरे सुनहरे पन्नो का इतिहास बनाये | जय हिन्द | जय भारत | प्रिया मिश्रा :)
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उर्मिला किस से कहेगी आज लक्छ्मण त्यार हैं भ्रात प्रेम निभाने को चौदह वर्ष का वनवास हैं उर्मिला का एक घरी चौदह वर्ष का || कब तक वो विरह सहेगी आखिर उर्मिला किस से कहेगी || सीता बहना तू संग तेरे नाथ के | प्रभु संग तेरा वनवास होगा|| वो वनवास कहाँ होगा | जब प्रभु का साथ होगा || मैं रहूंगी महलो में | ये महल भी मुझे चुभेगा | ये चौदह वर्ष का वनवास | धीरे - धीरे | अजगर बन कर | बिष अपना उडेलेगा | और मैं चुप रहूंगी | आखिर मैं किस से कहूँगी || सुन कर बहना की पीड़ा माँ सीता भी ह्रदय से बिचलित हैं | न होगा कोइ पत्राचार न कोइ आत्मा संग बिहार होगा | उर्मिला होगी महलो में | और लक्छ्मण भैया | वन में | ये कैसा न्याय होगा | उर्मिला कैसे सबकुछ सहेगी आखिर उर्मिला किस से कहेगी | आत्मा की पीड़ा आत्मा ही जाने भरे जल लक्छ्मण लेते बिदाई | संगनी संग धर्म न निभाई | भाई धर्म निभाना हैं | रघुकुल रीत सदा | प्रीत धर्म में | धर्म ने विजय पाई हैं | मेरा प्रीत सत्य हैं | और मेरा धर्म अटल हैं | मैं सुन लूंगा तेरी | वो न कही बातें | हिर्दय से तेर...
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मेरे पास ऐसा जमीं हैं जिसके कण - कण में काँटे हैं | मेरा एक कदम हजार घाव देता हैं | लहू के निशान से एक और कुरुक्षेत्र का जन्म हुआ हैं | और इस कुरुक्षेत्र में पांडव की भूमिका में मैं हूँ | और कौरवो की भूमिका में वक़्त हैं | कृष्ण मेरे अनुभव हैं | जितनी पूछती हूँ उतने ही जवाब देते हैं | वो निहथे हैं | वो धर्म हैं | फिर वक़्त कितना भी मजबूत हो वो हारेगा ही | क्यूंकि वो कौरव हैं वो अधर्म हैं || प्रिया मिश्रा :)
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तू चलता चला चल || कोइ तुझे कितना भी नकार दे तू चलता चला चल || आएँगी मुस्किले तू लड़ता चला चल रूठने दे किस्मत को तू चलता चला चल || बाजुओं में जान हैं तो किस्मत भी बदल जायेगा हैं अगर पैरों में ताकत तो रास्ता भी कट जायेगा चाहें धुप जितनी भी हो तपिस की चिंता न कर तू चलता चला चल || हार के अगर तू रोक लेगा कदम को कैसे आएगी मंजिल मजिल को कर निशाना पैरो की थकान मत देख छाँव आएगी तू चलता चला चल || रात भर जगा हैं तो क्या आँखों को थकने दे अरमानो को हौसला दे सपने को खुली आँखों से देख और नाप ले मंजिल को बढ़ता चला चल तू चलता चला चल || जब - जब तू हारा हैं कमिया तुझमे ही हैं रख दिया तूने आस को गिरवी सर झुका लिया एहसास दिला खुद को वो देखता हैं ईश्वर जो बड़ा हैं मन में एक बिस्वाश जगा और बढ़ता चला चल तू चलता चला चल || प्रिया मिश्रा :) :)
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हमारी आदत हैं हम पहले घर ,मोहल्ला शहर ,राज्य और फिर देश को गन्दा करते हैं उसके बाद मोर्चा निकलते हैं रोड पर सरे आम हुर्दंड उसे भी कुछ नहीं होता तो उस घर , मोहल्ला, शहर ,राज्य और फिर देश को छोड़ के कही और चले जाते हैं !! फिर उसे दूसरे शहरों और देशो में बदनाम करते हैं !! ये हमारी मानसिक्ता हैं कचरा शहर में नहीं सोच में हैं बरसो से !! प्रिया मिश्रा :)
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मैं अकेला चला था लेकिन अकेला कहाँ हूँ || सड़को का मिलना सड़को का मुड़ना बदलाव लेके आया एक गाँव को छोड़ा दूसरा गावँ मुस्कुरा के आया उसने बड़े प्यार से गले लगाया आगे बढ़ा साथ - साथ पेड़ो का करवा चलता रहा हवा छू के गुजरती रही कदमो का साथ धूल ने निभाया मैं चलता रहा और मेरे कदमो ने एक गाँव की मिटटी को दूसरे गाँव से मिलाया || दोनों एक ही थे जिन्हे रंग - रूप ने बाट रखा था ये लोग थे जिन्होंने अलग गाँव बना रखा था || लोगो का सिलसिला ख़तम हुआ अब नदिया साथ थी पर्वत साथ थे चिड़ियों का झुण्ड कुछ दूर चला था और साथ - साथ मेरे मेरा सपनो का जहाँ चलता रहा || मैं अकेला चला था लेकिन अकेला कहाँ हूँ || प्रिया मिश्रा :) :)
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रहने दो आगे की बातें रहने दो आगे की बाते उनमे क्या वक़्त गुजारना जो कल साथ था वो तो बहाने करने लगा हैं ये वक़्त ऐसा चला हैं कछुआ भी शेर को आँखे दिखने लगा हैं || जिसमे कोइ गति नहीं वो चलायमान होने की सलाह दे के जाता हैं वो झरता पत्ता भी मुस्कुरा के अस्तित्वा बताता हैं ये वक़्त हैं प्यारे ये कभी भी बदल जाता हैं || बाते चलती हैं और चलती ही रहती हैं कायरो ने मेरे नाम का ब्यूरो खोल रखा हैं मैंने पैसे नहीं दिए फिर भी मेरे चर्चे करते हैं वो शुमार हो गए मेरे बुरे वक़्त में और मैं आधा बुझा दिया भी दुसरो के अंधियारे का कारन बना अब इस से ही जान लो कितनी आग लेके मैं चलता हूँ बुझ गया हूँ फिर भी हाथ सेकने वाले सेक रह हैं वक़्त इतना भी बदला हो शेर , शेर ही रहता हैं ये वक़्त हैं प्यारे कभी भी किसी का भी बदल सकता हैं || रहने दो आगे की बाते उसमे क्या वक़्त गुजरना हैं || प्रिया मिश्रा :) :)
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जो आग लगी हैं जो आग लगी हैं उस से खुद को जलाओ मत आग को संभाल के रखो || खुद की चिता मत बनाओ खुद के खून में उबाल आने दो मगर वो उबाल संभाल के रखो जो आग लगी हैं उस से खुद को जलाओ मत आग को संभाल के रखो || उस आग को अपनी ऊर्जा बनाओ उस ऊर्जा से अपनी पथ बनाओ अपने पैरो में जरा जान लावो जायदा सोच में वक़्त मत गवाओ आग को संभाल के रखो || उस आग के प्रकाश में खुद की हकीकत देखो अपनी औक़ात देखो अपने अपनों की औक़ात देखो || पहचानो उनसे अपना रिस्ता और उस मोह से बहार आ जाओ जो आग लगी हैं उस से खुद को मत जलवो आग को संभाल के रखो || प्रिया मिश्रा :)
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तू ठहरा नहीं गुजर गया तू ठहरा नहीं गुजर गया मेरे साथ चला था तुझे भागने की जल्दी थी तूने रस्ते बदल लिए तू दूर कही निकल गया तू ठहरा नहीं गुजर गया || मैं ठहरी बाट जोहने पग की मिटटी संभाली थी लोग भी मुझपे हस्ते थे मैं पगली थी दीवानी थी तूने तेरा सबेरा ढूंढा तू किरणों के पीछे भागता गया तू ठहरा नहीं गुजर गया || मेरे दरवाजे तक तेरा निशान जो था जो आता था तुझे याद दिलाने वो हवा उड़ा के लिए ईटे सारी गिर गयी यादों की वो आखरी मकान भी जाता रहा तू ठहरा नहीं गुजर गया || तू बना परदेशी प्रदेश तेरा ठिकाना बना वो चूल्हा घर का जला नहीं वो जर - जर हैं ना कभी उसपे पकवान पके ना कभी उसमे कोइ आग लगी || उमीदे फुकी हमने वो जो धुएं के साथ तेरी खुसबू आती थी वो भी अब जाती रही चूल्हा ठंडा हो गया और अरमान जलते रहे और तू ठहरा नहीं गुजर गया || मैंने बहोत दूर तक देखा था जाते निशान दिखे थे तेरे पैरो के आते कभी दिखे ही नहीं मैं हवाओ से लड़ती रही और वो एक निशान भी जाता रहा तू ठहरा नहीं तू गुजर गया || प्रिया ...
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ये रोज की बात हैं | एक हरी - भरी सी डाली अभी - अभी पत्ते आये थे || मुस्कुरा रही थी | खिल रही थी || एक हवा का झोका आया और पेड़ तनहा हो गया || किसी का कुछ नहीं बिगड़ा पेड़ में डाली दुबारा नहीं आई वो टूटी डाली वही पे पड़ी हैं लेकिन टूट चुकी हैं पेड़ से जमीं को छुआ उसने और उसका धर्म बदल गया || कुशूर किसका ? कौन अब गलती मानेगा जब हवा ने डाली तोड़ के अपना रुख मोड़ लिया || वो हवा हैं रोज रुख मोड़ेगा डाली टूटेगी उसका धर्म बदल जायेगा पेड़ सिसकेगा तनहा हो जायेगा और फिर , फिर हवा रुख मोड़ लेगा || ये रोज की बात हैं प्रिया मिश्रा :) :)
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पचपन में बचपन मैं अपने बगीचे में किताब पढ़ रही थी | उसक आना यूँ हुआ जैसे काली घटा बिजली में घुंगरू बांध के आई हो | हाव - भाव ही कुछ ऐसे थे | सावला रंग | दूधिया सफ़ेद सी दाते | चांदी की पायल और उसमे बंधे घुंगरू | नाक में नथ चाँदी की बड़ी सी वो भी | मैंने पूछा कहा की हैं ? इतराते हुए बोली यही बगल गांव की मेमसाब | आपका नाम प्रिया हैं न | बाबा बोले | मैंने हैरानी से पूछा बाबा कौन बाबा किसकी बेटी हैं तू ? वो "रामनाथ" आपका रसोईया | अच्छा - अच्छा , समझ गयी | तू क्यों आई और पहले कभी देखा नहीं तुझे | रामनाथ के तो सारे सदस्यों से मिली हूँ मैं ? हाँ , मेमसाब वो हमरा गौना ना पांच साल में हो गया था | वही थी | तो अभी मायके घूमने आई हैं ? ना - ना मेमसाब यु छोड़ दिए हमको | शहर में रहते न | कोइ शहरी पसंद आ गयी | मैंने देखा उसका चेहरा | आँखे लाल हो चली थी | आवाज भर्रा गयी फिर भी मुस्कुरा रही थी | उस मासूम से चहरे पे मेरे भी दिल भर आया | कुछ पूछा नहीं मैंने | काफी वक़्त तक कुछ न बोली | वो मेमसाब कुछ काम होतो बता दो | आज से मैं ही करुँगी आपका...
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आँधिया गुजारी थी , मुझे छूके मैं पर्वत सी खड़ी रही || कुछ हलके पत्थर टूटे मैं भी जरा सी हिली थी पर इरादे मजबूत थे मैं डटी थी और डटी ही रही आँधिया गुजरी थी , मुझे छूके मैं पर्वत सी खड़ी रही || दरारे आई रास्तो में मंजिल फिर भी नीव लिए खड़ी हैं || शाम ढल के रात हो आई रौशनी अब भी वही हैं || कोइ काट दे मेरी भुजाओ को ऐसा कोइ साहस का तलवार नहीं || मैंने जहाँ घुटने टेक दिए हो ऐसा कोइ वार नहीं || मुझसे रूठ गयी हो चांदनी लौट के फिर भी आई हैं वो हौसलों से मेरे झुकी हैं दामन में समेट के तारे लाई हैं || मैं एतबार खुद पे करती रही आँधिया गुजरी थी मुझे छूके मैं पर्वत सी खड़ी रही || प्रिया मिश्रा :) :)
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भगवान् की खोज || एक कलयुग के सताए हुए सज्जन भगवान् की खोज में निकले घर से बहोत दूर चलने के बाद उनको बड़ी जोर की प्यास लगी , आस पास देखा कुछ दूर पर एक घर था, वह जाकर दरवाजा खटखटाने पर एक महिला आई और उनके आग्रह पर उनको पानी पिलाया || सज्जन फिर निकल चले आगे बढ़ते गए कुछ देर बाद उनको बड़ी तेज भूख आई , उन्होने भिक्छा से अपनी भूख शांत की || अब थके हुए सज्जन बिश्राम करने पेड़ की छाया में पेड़ के पत्ते बिछा के सो गए || जब उठे तो फिर अपनी यात्रा सुरु की || कुछ दूर जाने के बाद उन् हें एक बूढ़ा आदमी मिला जो अपनी बैल - गाड़ी ले जा रहा था , उसने सज्जन की अपनी बैल गाड़ी में बिठा लिया और कुछ उनकी सहायता की यात्रा में , सज्जन फिर आगे बढ़ गए || और चलने लगे , एक दिन सज्जन को रस्ते में एक चमकता हुआ पत्थर मिला सज्जन ने उठाया देखा और बहोत देर सोचने के बाद उसे फेक दिया वो एक गरीब की कुटिया में जा गिरा , वो गरीब उसे देख कर उनको प्रणाम करने लगा , सज्जन बड़े आश्चर्य से उसे देखते हुए आगे बढ़ गए || एक सज्जन को भिक्छा जरा जायदा मिल गयी , सज्जन ने कुछ खाया और फिर उसे किसी और को दे दिया , वो आदमी स...