अपराधबोध

मैं अपराधी की तरह खड़ी थी
वो मेरे अपराध गिना रहा था
बात विश्वाश की थी
वो मेरे अंतर्मन को कुचले जा रहा था
जैसे उठता हैं भवर समंदर में
मेरे हिरदय भी फटा था
मेरी आँखों से बहता नीर
कहा उसे दिखा था
मैं रोती रही
वो अपराध गिनता रहा
पहले अपराध में
उसने मेरी जमीर नाप ली
दूसरे में मुझे ,
हिरदय बिहीन कर दिया
तीसरे में सांसे छीन  ली
और मैं अपराधी की तरह खड़ी थी
एक अपराधबोध लिए ||


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