वो  बैठ गया जमीं में
मैं बून्द - बून्द बढ़ती रही
रेत और पानी कहा मिला
करते हैं ||

वो टिश की तरह चुभता गया
मैं मरहम की तरह उससे लगी रही
वो हिरदय का दाग बन के रह गया
मैं धीरे - धीरे पिघलती रही ||

वो काजल था मेरी आँखों का
जो , धीरे - धीरे सफ़ेद हो गया
अब उदाश हैं आँखे
वो सपनो सा उड़ गया

सोचती हूँ
अब रहने भी दू
क्या कदम - कदम नापु
जो धूल - धूल उड़ता गया ||

प्रिया मिश्रा :)

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