मन को ठेस वही लगाते है जो मन के सबसे करीब होते है कभी देखा है पश्चिमी की और मुख की हुई हवा को पूरब में तबाही मचाते हुए || प्रिया मिश्रा :)) 24 हर बात पे लोग बात बदल देते है ....... ये बात बदलने वालो से साथ की उम्मीद मत रखना प्रिया मिश्रा :)) 24 आज कल झूठ फ़रेब के सफ़ेद रंग लिए बैठा है || प्रिया मिश्रा :))
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Showing posts from February, 2021
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वो पागल सा लड़का मेरे प्रेम में ... मेरे पैरों के नीचे फूल नहीं बिछाता वो पागल सा लड़का मेरी खुशियों की राह में रोज एक नया गुलाब उगाता है वो पागल सा लड़का मेरे पैरों में पायल नहीं पहनाता है वो पागल सा लड़का मेरी खुशियों की पायल में रोज एक ......नया सा खनकता सा घुंगरू जड़ जाता है है ना,, नादान सबसे अलग वो पागल सा लड़का प्रिया मिश्रा :)) 24
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मौन सराहना है | मौन प्रताड़ना भी है || मौन शांति है | मौन सन्नटा भी है || मौन ऊर्जा है | मौन ऊर्जा का क्षय भी है || मौन प्रकश है | मौन अँधेरा भी है || मौन साहस है | मौन डर भी है || मौन एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है | मौन एक निकृष्ट अभिव्यक्ति भी है || मौन देव है | मौन दानव भी है || मौन अर्थ है | मौन अनर्थ भी है || मौन एक रास्ता है | मौन एक मंजिल भी है || मौन ऋतू है मौन ऋतुओ के बदलने का कारन भी है || मौन सरल है | मौन जटिल भी है || मौन सरस है | मौन नीरस भी है || प्रिया मिश्रा :))
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सुनो ,, वो सूरज की लालिमा ..........ढलते वक़्त ..कितनी .........चम्पई हुई जाती है ....................... ठीक वैसे ही ...................जैसे तुम्हारे तारीफ़ करने पर .......मेरे गालो का रंग || सुनो ,, वो सूरज कितना चमकता है ............................... ठीक वैसे ही ........................जैसे मेरी आँखे ....................... तुम्हे निहारते वक़्त || प्रिया मिश्रा :)) 24
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खिलाने वाले की नियत ................ प्रथम व्यक्ति कैसा लगा खाना बेटा ..........और लाऊँ .......अरे -अरे शर्माओ मत .........ये रोटियाँ तो खाओं | दूसरा व्यक्ति आपका हो गया तो ...........थाली ले जाऊँ तीसरा व्यक्ति .............. किचन में ..........खुसुर -फुसुर ये रोज -रोज क्या आ जाता है मरने ................ सामने ............... बेटा ............. तेरे अंकल का भी ना हाथ तंग चल रहा है................. बुरा ना मानना कल से कही अपना देखो || प्रिया मिश्रा :))
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बच्चो को सिखाया जाता है बड़े होके ........... अच्छा आदमी बनना है ये नहीं बताया जाता की अच्छा आदमी क्या है ? अच्छा आदमी कौन था ? अच्छा आदमी बना कैसे जाता है ? अच्छा आदमी बनने के परिणाम क्या -क्या है ? लाभ और हानी और बताने वाला ये भी नहीं बता पाता अच्छा क्या है ? अच्छा क्या था ? अच्छा क्या होगा ? नाही वो ये बता पता है की उसे भी ................ बचपन में यहीं सिखाया गया था बाद में ......................... इस वाक्य को भुलाने पर मजबूर किया गया ..................... और ये लोग वही लोग है .. जिन्होंने ....... अच्छा आदमी बनने को बच्चे को सिखाया था || प्रिया मिश्रा :)) 24
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एक गरीब से घर में आई हुई नई बहु .................चूल्हे में आग जला के .............बर्तन में पानी रख दिया करती थी ................फिर उसे कलछी से चलती रहती .......इस तरह से ........पड़ोसियों को कभी ये एहसास ना होने दिया की ........वो रोज भूखे सोते है || प्रिया मिश्रा :)) ख़ाली बर्तन ............ पैरों में फ़टी बेवाय ............और झड़ता बसंत ........ हवावों से आती हुई रजनीगंधा के फूल .................और चन्दन की सुगंध ......................सब एक साथ ..............थकी हुई आश में ...बस एक बार .........प्रियतम का प्रथम स्पर्श जैसा है || प्रिया मिश्रा :))
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इंदु ( लघु कथा ) इंदु का बचपन मैं नहीं जानती .......उम्र में मेरे से बड़ी थी | जब वो मेरे मुहल्ले में रहने आई थी..... उसकी शादी हो चुकी थी | वो अपने मायके में रहती थी ..........उनका दूल्हा किसी और से शादी कर चूका था | इंदु एक पढ़ी -लिखी औरत थी .............. समझदारी का पता नहीं ...........लेकिन अपने ही घर वालो और समाज के दकियानुशी ख़यालो में मारी गयी थी | इंदु की शादी उसके माँ -बाप ने एक ऐसे लड़के से कर दी .............जो पहले से शादी -शुदा था | सिर्फ घर वालो के पास जमीं , पैसा ये सब देखकर | बाद में पता चला की वो शादी - शुदा है | इंदु को वहाँ से घर ले आये अपने | इंदु के माँ - पापा ने कभी भी उसके दूल्हे को नहीं कहा की वो इंदु को ले जाये | उन्होंने कभी भी उसकी दूसरी शादी के लिए भी नहीं सोची | इंदु का जीवन बस यूँ - ही चलता रहा | कुछ सालो बाद .............उनके माँ -पापा गुजर गए | रिश्तेदारों ने अपने असली रूप से परिचय करवाया | इंदु अपने बहन के घर रहने लगी | उनकी बहन ने खाने -पिने की चीजों में रोक लगनी शुरू कर दी | फ़्रीड्ज़...
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जिस दिन मौसम रूठा होगा और सूरज अपनी तपीश में होगा पेड़ ठूठ हो चुके होंगे हर जगह अँधेरा पाँव पसार रहा होगा उस दिन कही से कोइ स्त्री का आँचल ... बादल बन छा जायेगा और उसके घुँघरुओ से एक संगीत उत्पन्न होगा और मोहित कर देगा सम्पूर्ण संसार को फूटेंगे कई स्वर उन स्वर से ऊर्जा उत्पन्न होगी उस ऊर्जा से आकाश में कम्पन होगा उस कम्पन्न से से वर्षा होगी तब पुरुष फिर से हल उठा लेगा और ..... उसके पसीने से जमीन में दरारें पड़ेगी फिर स्त्री डालेगी बीज़ नई सृष्टि का || प्रिया मिश्रा :)) 24
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वो शहर मेरा ऋणी रह जायगा जहां से मैं खाली हाथ लौटी हूँ प्रिया मिश्रा :)) सुनो ,, तुम्हारे शहर में भी क्या ?? सन्नाटे का शोर है || प्रिया मिश्रा :)) मैं नहीं भूली उस शहर का नाम जिसके .....गलियों में कभी मेरा भी एक पता हुआ करता था || प्रिया मिश्रा :)) मैं फ़क़ीर हूँ तो क्या हुआ ? आदते मेरी नवाबों जैसी है || प्रिया मिश्रा :))
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लिखने चले थे कविता .... तेरा नाम लिख गए प्रिया मिश्रा :)) ज़ुबान की ख़ामोशी जहर है अगर मन चीख रहा हो || प्रिया मिश्रा सबसे बड़ा बदलाव इंसान जानवर होते जारहे हैं और .. जानवर विलुप्त होते जा रहे हैं प्रिया मिश्रा :)) हमने कभी तुम्हे भुलाने की कोशिस नहीं की वरना तुम और याद आते || प्रिया मिश्रा :)) मैं नफ़रतो के मरुअस्थल में हूँ प्रेम की बारिश का ख़्वाब सजाये || प्रिया मिश्रा :))
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एक ख़त डाकियाँ एक ख़ाली पड़े मकान में डाल गया .................खत कुछ दिनों तक बंद पड़ा रहा ........हवा उसे इधर -उधर उड़ती रही .................फिर जोड़ की हवा ने थपड से उसे फाड़ दिया ...............पन्ना चीख कर .....फड़फड़ाने लगा ........और सारे घर में चीख के कह रहा था माफ़ करना,, मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ || ख़ामोशी हंस रही थी ...........पन्ना रो रहा था ........मिट्टी उड़ रही थी ... पन्ना गुजरते दिन के साथ विरह में पीला पड़ रहा था || प्रिया मिश्रा :))
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लोग बेश्याओ में अनेको ................पंक्तियाँ लिख देते है मुझे जाने खेद है ...इस स्त्री समाज पे उठी हुई ऊँगली से .......ये इनपे लिखे हुए किसी भी तरह के व्यंग या उलाहना या गलत उदहारण से ....... मैं कोइ समाज सुधारक नहीं हूँ........... कोइ ग्यानी नहीं हूँ ...........नाही कोइ दार्शनिक हूँ .............एक स्त्री हूँ ...........इसलिए एक स्त्री का मन पढ़ सकती हूँ | बेश्याए अपने आप नहीं बनती ..........मजबूरियां बनाती है | माँ - बाप की मज़बूरी प्रेम में धोखा दहेज़ न मिलने पर घर से निकली गयी स्त्रियां या पति द्वारा त्रिस्कृत स्त्रियां बाल्य्काल में चुरा ली गयी बच्चियाँ बलात्कार .... हमारे सभ्य समाज में .........दहलीज के बहार पाँव रखते है .........हर लड़की बदल जाती है .... वो दूसरे की बेटी दूसरे की बहन और दूसरे की पत्नी और माँ होती है ... शायद ये भी कारन है ....................बेश्यावो के जन्म का और कई ऐसे मानशिक घाव होते है .........जो एक हस्ती खेलती स्त्री को बेश्या की उपाधि दिला देते है | लेकिन ......बेश्या कभी भी अकेले कार्य नहीं करती इसमें हमारा सभ्य समाज भी शामिल है ..........जिसने सफ़ेद ...
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स्त्री दहलीज लाँघ दे ऐसा कुछ गज़ब मत कर जाना तुम्हारे चौखट से तुम्हारी ...बिटियाँ के पैर......... बिना कोइ निशाँ छोड़े ही चले जाएँ ऐसा कोइ काम ना करना सारे गीले -शिकवे मिटा देना महावर के छाप उलटे अच्छे नहीं लगते सुखी सफ़ेद एड़ियों में पायल नहीं सजते घुंगरू सिर्फ आवाज नहीं तुम्हारे आँगन की सोभा है कभी अपने आँगन को वीरान मत करना || प्रिया मिश्रा :)) 24
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मैंने असंख्य कवितायेँ लिखी है ..परन्तु .... मैं नहीं लिख सकती .........तुम्हारे किसी भी भाव को अपने शब्दों में .....नाही तुम्हारे प्रेम को लिख सकती हूँ ,, मैं नहीं बांध सकती अपनी आँखों से बहने वाले उन अश्रुवो को .. ना ही मैं उन ओश की बूंदो को तुम्हारे होठो से चुरा कर कोइ कविता लिखना चाहूंगी कभी .............. जो गुलाब की पंखुड़ियों में छीप कर मेरे चेहरे को आकाशी रंग दिया करते है || प्रिया मिश्रा :))
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मैं कोइ वीरांगना नहीं हूँ मैं एक साधारण स्त्री हूँ मुझसे प्रेम मांग लेना मैं सहर्ष ही ..... आँचल में सजा के दे दूंगी ......................... मुझसे कोइ मिथ्या वचन ना कहना जो आहात हुई तो .................... शस्त्र उठा लुंगी मैं कोइ वीरांगना नहीं हूँ परन्तु बात अगर धरती पर प्रेम बचाने की हो ... मैं मिथ्याभाषी का सर ............ प्रेम की चरणों में चढ़ा दूंगी ........... प्रिया मिश्रा :)) 24
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किशोरावस्था वाला प्रेम मैं जब पांचवीं कक्षा रही होंगी तब आया था वो मेरे मोहल्ले में ........... दिखने में साधारण से भी साधारण था | कद मुझसे भी छोटा ..........वो सांवला सा लड़का | उसकी मम्मी बीमार रहती थी .......... पापा की उम्र थोड़ी ज्यादा ही थी | उसकी ७ बहने थी वो घर में सबसे छोटा था | लेकिन उसके सारे काम बड़े लोगो वाले होते थे | मुझसे उम्र में ज्यादा बड़ा नहीं था .......तीन साल बड़ा था ..... | पढ़ाई में तो इतना होशियार था ... मेरा उसी से कम्पटीटशन रहता था हमेसा ..... उसको मालूम भी ना हो सायद | मेरे घर आया -जाया करता था | मुझे याद नहीं मैंने दसवीं से पहले कभी उस से अच्छी से बात की हो | एक बार तो इतनी डाँट लगाई थी ... घर रोता हुआ गया था | मुझे पता नहीं उस से किस बात का गुस्सा था ................ वो था बहोत प्यारा सब उस से बहोत प्यार करते थे .... और मुझे यही बात चिढ़ाती थी .... मेरी माँ मेरे से ज़्यादा उसका ख्याल रखती थी | हमेसा अभिनाश ......अभिनाश और कोइ नाम आता ही न हो जैसे उसे | और मुझसे बड़ी चिढ हो जाती थी | मैंने सायद पहली बार उस से अच्छे से बात की...
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मैं अजीब लड़की हूँ मुझे सजना -सवरना नहीं आता ....... मैं अपने केशो को ... कभी -कभी सवारती हूँ कानो की बालियाँ भी नहीं है मेरे पास ... मेरे आँखों में काजल भी कम दीखता है .... मेरे पास चूड़ी ... बिंदियाँ पायल कुछ भी नहीं है मैं हर वक़्त भूतनी ... लगती हूँ और .. मुझसे भी अजीब वो लड़का है जो बुलाता मुझे भूतनी है ... और जिसे मैं ही ... सबसे .. सुन्दर दिखती हूँ प्रिया मिश्रा :))
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मैं गेहूं के साथ गुलाब की फ़सल भी उगता हूँ मैं .......... रोजमर्या के जरूरतों में प्यार भी लाता हूँ || प्रिया मिश्रा :)) 24 आग का अपना कोइ घर कोइ मकान नहीं होता वो किसी के चूल्हे से निकल कर किसी का घर जला देती है आग का कोइ धर्म कोइ इमान नहीं होता || प्रिया मिश्रा :)) मैंने कई धुन सुने तुम्हारी आवाज के संगीत जितना मीठा कुछ नहीं || प्रिया मिश्रा :)) सुनो ये गुलाब मैंने बिना पूछे चुरा लिया है तुम्हारे लिए ... ठीक वैसे ही ..... जैसे तुमने मुझसे बिना पूछे मुझे चुरा लिया है प्रिया मिश्रा :)) जब मेरी आँखे थक जाती है तुमको निहारते हुए मैं अपनी आँखे .... बंद कर लेती हूँ और सपनो में तुम संग नवजीवन ... सजाती हूँ प्रिया मिश्रा :))
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जुलुस न्याय के लिए हो तो हो सकता है जीवन से परिचय करा जाये जुलुस सिर्फ जीवित है ये जानने के लिए है ... तो कई घरो में मातम का कारण भी बनता है .... ये जुलुस संभल के अपने जीवन को तलाशिये .. कही ऐसा न हो आपकी झूठी तलाश ..... एक जंगल बना दे कई भटक जाये इसमें ...... मशालों को भी संभल के जलाये .... रक्त धमनियों को गर्म करने का और रास्ता चुने ऐसा ना हो लाखो घर जल जाये और आप झूठा जीवन तलाशते रह जाएँ संभल के जरा संभल के || प्रिया मिश्रा :)) 24
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जब तक हम गुलाम रहे वाह -वाही बहोत कमाई जब से हाथ की लकीरे बदलने की ठानी है जमीं पे बदमानी का चादर लिए सोते है ये चादर मेरे पैर से बड़ी है सब देख के राह बदल लेते है मैं नई राह बना लेता हूँ मैं बदनाम क़ाफ़िर हूँ आसमान का नीला रंग नहीं लाल मिश्रित कला रंग ओढ़ के सोता हूँ मैं अब रोज नई लकीरे बनाता हूँ और रोज नई कहानियाँ सजाता हूँ मैं पत्थर सा मैं ........ झरने सा बह जाता हूँ मैंने अपने पैरों के निचे लकीरे नहीं खींची ..... मैं गिरता हूँ रोता हूँ संभालता हूँ हस्ता हूँ खुद पे और फिर नई लकीरे बनाता हूँ || प्रिया मिश्रा :))
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लव लेटर्स कल मिली वो हमको | गुलाबी सूट पहिने थी | इतनी सुन्दर लग रही थी, का कहे जी चुरा एक ले गयी हमारा | हम बिहार से है ..........पटना में रहते है पढ़ाई करते है | यही हॉस्टल में रहते है | अब का करे नया उम्र है ,, सुन्दर लड़की देखे तो प्यार -स्यार तो हो ही न जाता है | अरे ...छोड़िये हमारी बातें .... मैडम के बारे में बताते है.... आपको | हम यही अपने कोचिंग के सर से बतिया रहे थे ... तभी आई एकदम हेरोइन के जइसे ..... खट -पट उनकर सेंडिल करत रहिन | हम मुड़ के देखे आ देखते ही रह गए .......... इतनी सुन्दर , बा गजब ... तीखे -तीखे नाक -नक्स ..... घुंघराले बाल , माध्यम कद ..... एकदम हमरे लिए हमको परफेक्ट लगी | सोचे तनिक कुछु बतिया लेंगे ..... लेकिन हम खो गए ... कही ,, आ मैडम चली गयी तुरंते || खैर सर्च ऑपरेशन चालू है ........... मिलते खबर करेंगे आप सभी को ... अरे जे मैडम के बारे में बताते- बताते एगो बातें बताना भूल गए | कल यही सड़क पर पड़ा हमको एक लव लेटर मिला था ............ पढ़े थे लिखा था प्रिय ..झुलनिया कैसे हो ? क्लास कहे ...
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सोच बदलने की जरूरत है सोच बदलने की जरुरत है , लेकिन कैसे ? ऐसा क्या करे की जीवन में कुछ नया हो समाज में कुछ नया हो | हमारे बच्चे कुछ नया सीखे ,उनमे कुछ नया करने की ललक हो .....इसके लिए हमें क्या करना चाहिए ? हमारे देश , हमारे समाज और हमारे परिवार में कुछ नयापन आये इसके लिए हमें क्या करना चाहिये ? कहने को हम सदियों से सदियां बदलते आ रहे है | रोज जाने कितने लोग मरते है कितने पैदा होते है | असंख्य है ऐसे जो रोज नए सपने बुनते है और उनपे काम नहीं कर पाते | कारन कई हो सकते | जैसे उनका ख़ुद का डर समाज का डर माँ -पापा का डर ख़ुद की रोटी न कमा पाने का डर और जाने कितने डर होते है | ध्यान से देखा जाये तो अगर हम कुछ न करे और बस किसी की नई सोच को नई और सही हवा भी प्रदान कर दे ना तो हम एक नए सोच के मालिक होंगे || लेकिन नहीं हम सब ये सोच के चुप कर रह जाते है ..... बरसो से चले आ रहे कानून को कैसे तोड़े | हम ही क्यों तोड़े ? मेरा बेटा या बेटी ही क्यों तोड़े ? लेकिन हम कभी ये नहीं सोचते की कहीं से तो शुरुआत करनी होगी | कहीं तो आग जलानी होगी | कहीं तो क्रांति लानी हो...
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ये सड़को पे जितने चीथड़े पड़े है न उसमे से कुछ झूठे प्रेम के नाम बलि चढ़े है कुछ अंधे बिश्वाश के और...... कुछ .. आँखों से गिरती पानी के शिकार हो गए || हाय ... हम मनुष्य कितने बीमार हो गए सुनो ... भेड़ियों खेलना है तो खुद से खेल के देखो गुड्डे -गुड़ियों को भी मत छूना अपने पापी हाथ से वो भी ....... कही तुम्हारी तरह बीमार न हो जाये वो भी कारोबार शुरू कर दे किसी को प्रेम के नाम पे लुटे ..... और कही बिश्वाश का गला न घोंट जाये || प्रिया मिश्रा :))
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सूरज से एक परी आई पेड़ो से उतर कर दे गयी हमें ढेर सारा ऑक्सीजन और ढेर सारे फल धरती की हरियाली दे गयी और दे गयी ढेर सारा असीस ... वो आसमान की पेड़ो वाली परी .... बोली हमसे सुन लो मेरी बात मैं पेड़ो की सहजादी बताऊ तुम्हे एक बात पेड़ लगावो पेड़ लगावो जग को हरा -भरा बनाओ नहीं तो मैं कभी नहीं आउंगी फिर कैसे खाओगे प्यारे -प्यारे फल ..... अगर आज पेड़ नहीं लगाए तो कैसे दोगे अपने बच्चो को हरा -भरा सा कल मैं अलबेली सहजादी परियों की तुम्हे सिखाती कहानी नन्हे पेड़ो की देते हमको ऑक्सीजेन और देते हरियाली ये पेड़ मेरी नानी ने लगाए झूले इसपे मेरी माँ ...... मेरी माँ ने लगाए जो पेड़ उसके फल मैं खाऊँ बोलो बच्चो कौन लगाएगा कल पेड़ .. मैं बस उसके लिए ही .... आसमान के फल लाऊँ प्रिया मिश्रा :)) https://www.youtube.com/watch?v=1-h-altUNJg