फूल और आसमान का बादल

फूल
जो कल ही खिली हैं
उसे भवरे नहीं भाते है ||

वो बादल को तकती है
जो आसमन पे छाते है ||

वो मुस्कुराती है
बादल छट जाता है
वो उदाश हो जाती है
बादल बरस जाता है

बादल भी उसे देखते गुजरता है
कैसे वो  खिलती है
जब बादल बरस जाता है
कैसे उसके पंखुरियों पे
कुछ बुँदे ठहर जाती है
और वो शर्माती है


फूल जमीं की हैं
पसंद उसे आसमान है
बादल आवारा है
लेकिन बरसता फूल पर ही है

ये जमीं और आसमान का प्यार हैं
इसलिए खालीपन दीखता है
और उस खालीपन में
सिर्फ इन्तजार होता हैं
प्यार वाला इन्तजार ||

प्रिया मिश्रा :)





Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog