मैं जब रोज सुबह की
खबर पढ़ती हूँ
वही अपनी अखबार से
जो जिवंत पेड़ो को काट के
लाशो की खबरे लाते हैं |
हाँ , वही खबरे जिसे पढ़ के
रोज के दिन बिताये जाते हैं
चर्चाओ का एक समां बँधता हैं
उन बातो पर ,
की कैसे देश को बदलने का सपना
देखने वाले क्रन्तिकारी
सरे आम लटकाये जाते हैं |
एक दरिन्दगी के कैसे
खुला तांडव होता हैं
और तस्बीरों में दिखाए जाते हैं |
हम रोज पढ़ते हैं
किसी टूटे घर का मशाला
और रोज हम भी मरते जाते हैं |
वो दिन अब दूर नहीं जब
जब रस्ते - रस्ते पर नंगी लासे होंगी
और हम घर में पड़े
उनकी चित्रो का तमाशा देख रहे होंगे |
एक तस्वीर खिचेगी और हम बेच रहे होंगे |
प्रिया मिश्रा :)
खबर पढ़ती हूँ
वही अपनी अखबार से
जो जिवंत पेड़ो को काट के
लाशो की खबरे लाते हैं |
हाँ , वही खबरे जिसे पढ़ के
रोज के दिन बिताये जाते हैं
चर्चाओ का एक समां बँधता हैं
उन बातो पर ,
की कैसे देश को बदलने का सपना
देखने वाले क्रन्तिकारी
सरे आम लटकाये जाते हैं |
एक दरिन्दगी के कैसे
खुला तांडव होता हैं
और तस्बीरों में दिखाए जाते हैं |
हम रोज पढ़ते हैं
किसी टूटे घर का मशाला
और रोज हम भी मरते जाते हैं |
वो दिन अब दूर नहीं जब
जब रस्ते - रस्ते पर नंगी लासे होंगी
और हम घर में पड़े
उनकी चित्रो का तमाशा देख रहे होंगे |
एक तस्वीर खिचेगी और हम बेच रहे होंगे |
प्रिया मिश्रा :)
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