उसने एक गूंगी कविता लिखी शब्द शांत थे कोइ हलचल नहीं थी और पन्ना फिर से कोरा रह गया प्रिया मिश्रा
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Showing posts from October, 2019
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राजनीती रही सदा बढ़ चढ़ के शाशक ने देश संभाला हैं पर हम क्या अपाहिज हैं जो सब कुछ उनपे डाला हैं ! क्या खुद के घर की गंदगी दूसरे के सर पे डालेंगे हैं अपना बर्तन झूठा पड़ा कब उसे खंगालेंगे !! नारी बिकाश शिक्षा बिकाश रोड विकाश नगर बिकाश कहा से सुरु होता होता क्या घर का मालिक शासक नहीं होता हैं फिर क्यों भीख मांग के राजनीती को बढ़ावा देते हो क्या खुद की मत मारी गयी हैं जो खुद की नहीं चुनते हो क्या शीक्षा घर वालो का काम नहीं क्या हम इतने अपाहिज हैं की उसके लिए भी राजनीती आएगी क्या हमारी जरूरतों के के लिए भी राजनीती खेली जाएगी !! कोइ कहेगा मैं दूंगा शिक्षा का अधिकार कोइ कहेगा मैं दूंगा जीने का अधिकार धिकार नहीं हैं हमपे जो हमारे कर्तब्य को गिना के कोइ और जुआ खेल रहा हैं जरा देख आखे खोल के रावण नारी सुरक्षा को अपने सत्ता के तराजू में तोल रहा हैं !! कब तू जागेगा ये मनुष्य कब तुझे इतना गुमान होगा कब तेरा अभिमान खंडित न होगा कब तू आग लागएगा कब ये हमारे कर्तब्यो के बोझ तले हामरा इमां न कुचला जायेगा देख जरा तेरा धर्म क्या हैं क्या तू सक्षम नहीं तेरा निर्णय...
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अमिया की गोद भराई आज शाम मैं निकली जब बाग़ अपने घूमने को झुकी हुई थी अमिया शरमाई सी , लजाई सी || कानो - कान खबर फैली मंजरिया आने वाली हैं चंपा - चमेली सब आये हैं अमिया की गोद भराई हैं || देखो तो कैसे झुकी हुई हैं कल तक जो अल्हड़ थी हवा में उछलती लहराई सी दिखने वाली आज हैं वो अमिया शरमाई सी बादल -वर्षा सब आये हैं अमिया की गोद भराई हैं || ममत्वा का एहसास ये प्यारा तनी - तनी सी अमिया खिली - खिली सी दिखती हैं कल तक जो उखड़ी रहती थी आज हॅंस के सबसे मिलती हैं भवरे - तितली सब आये हैं अमिया की गोद भराई हैं || प्रिया मिश्रा :)
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इन्तजार तेरे इन्तजार में सुबह गुजर गया शाम गुजर गयी रात गुजरने वाली हैं || खाली बर्तन टूटी आस सब तेरी राह तकती हैं || तू जाके प्रदेश मनमीत कोइ और बना बैठा हैं गले लगा के मुझको किसी और से प्रीत लगा के बैठा हैं || चलो अच्छा हैं खुश रहना ये घर भी तुझे भुला बैठा हैं || तेरी यादो की समंदर को खुद के महासागर में हमें बहा दिया हैं || अब तू नहीं तेरी याद नहीं हमने सब कुछ भुला दिया हैं || प्रिया मिश्रा :) :)
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आज कि सुबह || आज कि सुबह एक नई उड़ान लेके आई हैं ये नए पंख देके जाएगी ये नए अरमान लेके आई हैं आज की सुबह नई उड़ान लेके आई हैं || ये पहाड़ो पे चढ़ेगी ये पंछियो से खेलेगी ये पेड़ो की टहनियो से गुजरते हुए नदियों तक जाएगी ये किरणों को बिखेरेगी ये दूर अट्टालिकाओ तक जाएगी ये नए उम्मीद दूर तक पहुचायेगी आज की सुबह एक नई उड़ान लेके आई हैं || ये खुशिया बन के बिखरेगी गई किसी के चेहरे पे ये चमक जाएगी किसी के आँखों में ये रात का सन्नाटा मिटाएगी आज की सुबह नया उपहार देके जाएगी ये नए पंख देके जाएगी आज की सुबह नए उड़ान लेके आई हैं|| प्रिया मिश्रा :) :)
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मैं ठहरी तेरी मीत तू माया बन के आया हैं || डूबा के ले जायगा तू वो नईया बन के आया हैं || ख्याल तेरे लूट ही लेंगे तू जाने क्यों लुटेरा बन के आया हैं || तू पँछी , मै टहनी पेड़ की मैं ठहरी , तू उड़ जायगा || प्रीत मेरा भी हैं बावरा ले के मुझको तू गहरे पानी पिया तू पंख फैलाएगा मैं बुलबुले पानी संग घुल जाउंगी और तू , तू पिया उड़ जायेगा || मैं ठहरी तेरी मीत तू माया बन के आया हैं || प्रिया मिश्रा :) :)
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रात का चाँद रात का चाँद मुझे उमीदो का उजाला दे के जायेगा|| ये ढल के भी सुनहरा सबेरा दे के जायगा || रात का चाँद मुझे उमीदो का उजाला दे के जायेगा || सितारे साक्षी होंगे मेरे विजय का और चाँद मुस्कुरा के बधाई दे के जायेगा || रात का चाँद मुझे उमीदो का उजाला दे के जायेगा || वो चाँद नहीं मेरा सपना हैं रात भर उसे देख के ही जागना हैं वो जाते - जाते एक किरण दे के जायेगा रात का चाँद मुझे उमीदो का उजाला दे के जायेगा || वो शीतल हैं , वो शांत हैं वो रात नहीं कितनो की आस हैं वो आस मुझे नया खास देके जायेगा मुझे मेरे प्रयाश का फल मिलेगा वो चाँद जाते -जाते एक उम्मीद दे के जायेगा || रात का चाँद मुझे उमीदो का उजाला देके जायगा || प्रिया मिश्रा :)
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आज की शाम आज की शाम मेरे लिए उजाला हैं दिन का वो गुजर नहीं रही हैं वो बसेरा हैं मेरे जित का वो ख्याल नहीं वो हकीकत हैं मेरे उदय का मेरा सूर्य शाम में उदित हुआ मैं हारी नहीं कड़ी धुप में खड़ी थी , लोग गुजरे मैं अड़ी रही || कुछ हसें कुछ हाथ छुड़ा के निकल लिए मैं अकेली धुप में तपती रही मैं शाम तक थकी नहीं मुझे मेरे उमीदो ने थकने नहीं दिया मुझे मेरे इरादों ने टूटने नहीं दिया मुझे मेरे ख्वाबो ने जगा के रखा इस शाम तक और ये शाम , ये शाम उजाला हैं मेरे दिन का || प्रिया मिश्रा :) :)
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तुम कपास न हुईं तुम कपास क्यों न हुईं जो तू कपास होती थोड़ी तुझसे मैं एक मदद लेता कुछ तुझसे बुनता थोड़ा मैं सुलझता !! थोड़ा -थोड़ा बुनते सुलझाते हम अरमानो का समयाना बुनते , थोड़ा उसमे मैं छिपता थोड़ा तुम्हे छिपाता ॥ तुम कपास न हुईं तुम कपास क्यों न हुईं !! अच्छा चलो शिकायतों का सिलसिला ख़तम करते हैं चलो न कुछ नया बुनते हैं मैं कपास हो जाऊँ सायद मैं तेरा दर्द समझ जाऊँ फिर तू जुलाहा बन जा कुछ नया सोच और कुछ नया मुझे बना हुआ क्या कुछ नया जो कुछ हुआ हो तो मुझे भी बता ॥ हम दोनों एक होने को बंधन में बंधे थे फिर क्यों अलग -अलग , तू कपास मैं जुलाहा मैं कपास तू जुलाहा क्यों न दोनों मिल के एक हो जाये तुम कपास भी रहो और जुलाहा भी तुम खुद खिलो तुम खुद बुनो तुम खुद सामियाने की तरह मुझे ढक दो और मैं तुम हो जाऊँ और तुम्हे यकीं हो जाये की मेरे खवाबो के सामियाने भी तुमने बनाए मुझे सजाया मुझे सवारा तुम कपास ही तो हो.. जुलाहा भी फिर भी एक कमी सी थी तुम ही रह गयी सब कुछ मैं तुम्हारे मुकाबले कुछ भी न बन पाया क्या मैं बन जाऊँ कपास और तुम जुलाहा क्या मैं बांट लूँ...
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ऐसा नहीं हैं की खुद की तकलीफे कम हैं !! पर दुसरो की तकलीफे चुराना अच्छा लगता हैं !! हसने के बहाने ढूंढते हैं खुद के लिए पर दुसरो का मुस्कुराना अच्छा लगता हैं !! वो लोग बड़े प्यारे होते हैं जो खयालो में आके गुदगुदा जाते हैं अपनी बातो से , एक भ्रम ही सही उनके आने का कभी कभी किसी का दबे पॉव आना अच्छा लगता हैं !! प्रिया मिश्रा :)
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मैं आना चाहती हूँ तेरे पास || मैं आना चाहती हूँ तेरे पास तुझे कहने तुझे बताने तुझे ये एहसास दिलाने मैं तेरे साथ हूँ पर तूने इतने काटें लगा रखे हैं अपने आँगन में हर रोज एक काँटा चुभता हैं मुझे और मैं हर रोज वो घाव लेती हूँ फिर भी मैं आना चाहती हूँ तेरे पास तुझे कहने तुझे एहसास दिलाने तुझे बताने की , मैं तेरे साथ हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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मैं खो बैठा || मैं सुबह के इन्तजार में शाम का नजारा खो बैठा मैंने तुझे खोया और पंछियों का नजारा खो बैठा || तू सुबह बन के आई मैं शाम में ठहरा रहा और मैं सुबह के इन्तजार में शाम का नजारा खो बैठा || तू नदी बन के आई मैं किनारो में अटका रहा भूखी आँखों से पेड़ को ताकता रहा और अब मैं प्यास बुझाने की इन्तजार में नदियों को ताकता रहा || तू सुबह बन के आई मैं शाम में ठहरा रहा || तू ख़ुशी बन के आई मैं गमो में उलझा रहा और अब खुशियों के इन्तजार में अपने सुने पन में उलझ बैठा || मैं सुबह के इन्तजार में शाम का नजारा खो बैठा || प्रिया मिश्रा :)
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रह गया वो पथिक वहाँ जहाँ से वो चला था || रह गया वो अकेला जो एक भीड़ लेके चला था || ले गयी बहा के हवा भीड़ को किसी दूसरे किनारे || वो दूर खड़ा देखता रह गया उसके कदमो में बेड़िया लग गयी और शाम तक तनहा रह गया || ऐसा हुआ क्यों क्यों कर वो तनहा रह गया || एक सवाल उसने पूछा खुद से और जवाब बड़ा भिन्न था सबसे वो भाग्य के भरोसे बैठा रहा वहाँ जब लोग कर्म कर रहे थे वो हस्ता रहा दुसरो पे उसने एक पग भी कर्मा के न रखे वो भ्रम में रहा , आँखों पे उसकी पट्टी सी थी दिखा नहीं लोग गुजर गए कारवां लेके और वो वो पथिक रह गया वहाँ वो पथिक जहाँ से वो चला था || प्रिया मिश्रा :) :)
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तू धवल चमकता चाँद हैं मैं धूमिल घटा की चांदनी तू सरल हैं तू सुन्दर हैं मैं तेरे आँगन की साँझ री || तू छाया मेरे आँगन का मैं धुप में जलती रेत री || तुम कंचन हो मैं काया हूँ || तुम भगवन हो मेरे मैं माया हूँ || तुम प्रीत हो , तुम जित हो मैं काली सी , घटाओ में लिपटी कोइ हार की छाया हूँ || तू धवल चमकता चाँद हैं मैं धूमिल घटा की चांदनी || तुम कंचन हो मैं काया हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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लिविंग रिया तुमको नहीं पता तुमने आज कितना बड़ा तोफा दिया हैं मुझे। अब सिर्फ तुम मेरी हो मैं तुम्हारा हमेशा हमेशा के लिए || सच में तुम बाकि सब को भूल जाओगे , दिल यकीं करना चाहता हैं लेकिन ? लेकिन क्या तुम्हे मुझपे यकीं नहीं ? हैं पर , तुम कमिटमेंट से डरते हो , तुम्हे शादी से डर हैं तुम लिविंग में रहना चाहते हो मेरे घर वाले नहीं मानेंगे || कैसे मनाऊंगी उनको ? क्या कहूँगी ? कौन सा रिस्ता हैं हमारा ? रिया क्या प्यार के रिश्ते से भी बड़ा कोइ रिस्ता होता हैं ? है होता हैं न बिश्वाश का रिश्ता जिसे दोस्ती कहते हैं | तो तुम कहना क्या चाहती हो ? बस इतना ही की जब तक हम एक दूसरे को समझ न जाये दोस्त बने। प्यार रहे न रहे दोस्ती रहे | ये नहीं हो सकता मैं तुमसे प्यार करता हूँ | आई लव यू यार , आई वांट यू || प्ल्ज़ पूछो अपने घर से | अच्छा कल बताती हूँ || जल्दी , मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता | अच्छा बाबा अब जाऊँ तभी तो ओके बाई || ट्रिंग - ट्रिंग ओह्ह वाओ तुम्हारे घर वाले मान गए | नहीं घर छोड़ के आई हूँ तुम्हारे लिए | एक बात स...
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जब हम पहली बार चलना सीखते हैं जाने कितनी बार गिरते हैं | लोग हस्ते हैं , पर हमें खबर नहीं होती | हमारे पास चेतना नहीं होती सिर्फ प्रयाश होता हैं और वो प्रयाश हमें खड़े रहने की प्रेरणा देता हैं || गिरने से जो चोट आती हैं वो हमें संभालना सिखाती हैं | सँभालते हुए जब हम आगे बढ़ते हैं, तो कई और बधायें आती हैं | और जब हम सारे बाधाओं को पार कर देते हैं तो हमें जीत हासिल होती हैं और ये वो जित हैं जो हमारा पहला कदम तय करता हैं तो चलते रहिये || कोइ साथ दे या न दे मंजिल हमारी हैं, तय हमें करना हैं प्रिया मिश्रा :)
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इस दिवाली इस दिवाली मैं आँगन के साथ खुद को भी रोशन करुँगी || अपने आँगन के दिए से थोड़ी रौशनी बाटूंगी थोड़ा रोशन अपने आस - पास को भी कर दूंगी इस दिवाली मैं आँगन के साथ खुद को भी रोशन करुँगी || मैं दिए लगाउंगी उमीदो के रोशन उसे अपनी लगन से कर दूंगी मेरे अरमानो की बाती होगी और ईश्वर के आशीर्वाद से वो जलेगा और , रोशन होगा वो दूर तक रौशनी मैं कर दूंगी इस दिवाली मैं आँगन के साथ खुद को भी रोशन कर दूंगी || उमंगो की मोती में अरमानो की चासनी डालूंगी थोड़ा मीठा और हो जाएंगे अगर मैं प्यार उसमे बांध दूंगी इस दिवाली मैं सपनो के लड्डू बनाउंगी उससे सारा संसार मीठा कर दूंगी इस दिवाली मैं आँगन के साथ खुद को भी रोशन कर दूंगी || प्रिया मिश्रा :)
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क्यों डरना हैं क्यों डरना हैं इन हवाओ से वो कही का रुख ले मुझे क्या करना मुझे क्यों डरना हैं जब ईश्वर मेरे साथ हैं || मुझे बस बढ़ते चलना हैं कोइ हाथ दे या न दे मुझे बस चलते चलना हैं कोइ साथ दे या न दे कोइ गिरेगा मैं संभाल लुंगी मुझे गिरने से क्या डरना हैं जब ईश्वर मेरे साथ हैं मुझे क्यों डरना हैं || चलेंगी तेज आँधिया टकरा के मुझसे रुख बदल लेंगी बादल बरस जायेंगे मेरे बंजर जमीं को फलने से क्या डरना जब ईश्वर मेरे साथ हैं मुझे क्यों डरना || मेरे राह की बाधाएँ कही दूर से मुझे देख के अपना रुख बदल लेंगी वो हार के डर से मुझसे नाता तोड़ लेंगी कोइ आये न आये मुझे बस चलते चलना हैं जब ईश्वर मेरे साथ हैं मुझे क्यों डरना हैं || प्रिया मिश्रा :)
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आशीर्वाद आज आशीर्वाद माँ का था मैं चला था आसमान नापने आज आशीर्वाद माँ का था || मैं गुजरा कई मोड़ो से मैंने कई गलियों के खाक छाने मैंने दिखी सुनहरी सी दुनिया जब मैं , झुका माँ के पैरो में मेरा सारा जहाँ वहाँ था आज आशीर्वाद माँ का था || मेरी जन्नत करीब थी मेरा मुक्कदर करीब था मैं घंटो बैठा रहा वहाँ जहाँ ईश्वर भी झुकते हैं मैं क्या उसे दूंगा जो मेरी जननी हैं सब कुछ मेरा उसी का दिया था आज मैं हूँ ऊचाईयों पे वो बनाया मेरे माँ का था आज आशीर्वाद मेरे माँ का था || प्रिया मिश्रा :)
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दिवाली दिवाली दीपो का त्वोहार फिर क्यों ऐसे मनाया जाता हैं || बिजली के बल्ब होते हैं | दूसरे देशों की लाइट होती हैं अपने देश की मिटटी के दिए क्यों नहीं बिकते | क्यों जो दिए बनाते हैं उनके ही घर में अँधेरा होता हैं | अपने देश की मिटटी की कीमत यहाँ भी क्यों कम आकि जाती हैं || जवाब हमारे ही पास हैं | हम इतने भ्रमीत हो गए हैं ,चकाचौँध देख के की दस हजार की चीजे हमें महंगी नहीं लगती और ५ रुपये के दिए महंगे लगें लगते हैं | हम दिए की जगह मोमबतिया लगाने लगे हैं | पेड़ो की जगह प्लास्टिक के पौधे घर में सजाने लगे हैं | नदियों को सूखा के फैक्ट्रिया लगने लगी हैं | पिने के पानी को बचने की जगह उसकी कीमत लगाने लगे हैं | अलग -अलग घरो में रहने के लिए पेड़ो को कटवाने लगे हैं | अपने बच्चों की खुशिया को छीन के पैसे बनाने लगे हैं || घर के लिए वक़्त नहीं और बहार मौज मानाने लगे हैं | पास के कमरे में किसी ने खाया की नहीं ये खबर नहीं सोशल मिडिया पे मिठाईया बाँट रहे हैं || अपने पुराने दोस्तों को त्वोहार वाले दिन भी कॉल करने की फुर्सत न...
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दिए आज कुछ दिए बिक जायेंगे तो गुड़िया लाऊंगा अपनी गुड़िया के लिए उसे पटाखे ला के दूंगा कुछ मिठाईया लाऊंगा अगर, आज कुछ दिए बिक जायेंगे तो घर में मेरे भी रौशनी होगी मेरा मिटटी का घर जरा जगमगा जायेगा अगर , आज कुछ दिए बिक जायँगे तो माँ को नई साड़ी लेक दूंगा कितनी फीकी पड़ गयी हैं वो उसकी साड़ी बिलकुल उसके रंग की तरह आज लाऊंगा उसके चेहरे पे खुसिया अगर , आज कुछ दिए बिक जायँगे तो मैं बबलू की किताबे लाऊंगा वो नहीं पढ़ पाया अब तक कुछ मैं उसे पढ़ाऊंगा अगर , आज कुछ दिए बिक जायँगे तो अच्छा बताओ , तुम्हारे लिए क्या लाऊँ मेरे लिए ? मेरे लिए अपनी आखो की चमक और अपने प्यार की चासनी लाना अगर , दिए न भी बीके तो उदाश न होना मुस्कुराते हुए आना हम खुसियो की दिवाली मनाएंगे खीर बनाउंगी तुम्हारे मुस्कराहट की मिठास परोसूँगी तुम्हारे प्यार की बच्चो को पटाख़े देंगे कागज के बना ...
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खिड़की खिड़की मेरे कमरे की पूरब की और आती हैं अच्छा स्थान चुना था मेरे दादा जी ने सूर्य नमस्कार यही से हो जाता हैं || ये खिड़की भी जरा सी धुप सेक लेती हैं ये कमरे की वो जगह लेती हैं जिसके आज्ञा के बिना कोइ आ नहीं सकता कोइ जा नहीं सकता इसको सभी नमस्कार करके ही मेरे कमरे में दाखिल होते हैं कल चाँद महाशय आये खिड़की ने बाहर से ही रोक लिया मुँह फुलाए खड़े रहे फिर जाकर कही खिड़की को दया आई और उनको आने मिला वरना, वही से बस झांक रहे थे जब कमरे में आये पहले सेठ की तरह मेरे कुर्सी पर बैठे फिर किताबो को पलटा , उसमे जरा सी धूल जमी थी किताबे भी उन्हें देख रही थी किताबे बोली , आप ही पढ़ लो मेरे पन्ने अब जरा कम पलटे जाते हैं जंग सी लगी हुई हैं जरा पलटेंगे तो नसे खुलेंगी जरा धूल हटेगी चाँद महाशय बोले रहने दो मुझे फुर्सत नहीं आज कल तुम्हे वैसे भी कोइ नहीं पढता मेरे पास इंटरनेट हैं || वैसे तुम पेड़ो के काटने से बने हो, मुझे बिलकुल पसंद नहीं पेड़ो को काटना अच्छा मैं नन्ही किताब इतना बड़ा कारन हूँ पेड़ को काटने के और ये जो मनुस्य रोज अलग -अलग घरो में रहें की इक्छा लिए घूमते ह...
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विर्धाश्रम मैं विर्धाश्रम हूँ चार और से दीवारे हैं मेरी आगे मेरे बड़ा सुन्दर खुला मैदान हैं हरा - भरा || मैं अपने आप को बड़ा खुशनसीब मानता हूँ मैं रोज माँ का आँचल छू के उन्हें प्रणाम करने का सौभाग्य पाता हूँ बाप की ऊँगली पकड़ कर खड़ा हूँ मैं विर्धाश्रम हूँ मैं निर्जीव हूँ पर संवेदनशील हूँ || हजारो माँ वो का आशीर्वाद प्राप्त हैं मुझे हजारो के सपने जुड़े हैं मुझसे मेरे तो कण - कण में माँ - बाप बस्ते हैं इसलिए मैं जर - जर नहीं हुआ मैं बेटा हूँ हजारो का इसलिए मैं जवान हूँ मेरे कंधे मजबूत हैं मैं विर्धाश्रम हूँ मैं निर्जीव हूँ पर संवेदनशील हूँ || जब कोइ माँ रोती हैं अपने - अपनों के लिए मेरा कलेजा फटता हैं मैं चीखे मरता हूँ मेरी भी आवाज उनके साथ गूंजती हूँ और मेरी दीवारों में दरार आ जाता हैं वो मेरी कमजोरी नहीं मेरी मजबूती हैं वो मेरी लहुं में दौडता दूध हैं जो मुझे चुकाना हैं इसलिए मैं मजूत हूँ मेरे कंधे श्रवण के कंधे से भी मजबूत हैं इसलिए मैं जमीं से जुड़ा हूँ मैं विर्धाश्रम हूँ मैं निर्जीव हूँ पर संवेदनशील हूँ || मैं अपनी माताओ का लाल हूँ मैं अपने पिताओ की ल...
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मैं तुझसे इस जन्म शायद ना मिलु मिलूंगी जरूर कही और तुझसे || मैं तेरा शाया बन के चलूंगी और तुझे समेट लुंगी अपने आँचल में शायद इस जन्म में न सही कही और किसी और जन्म में मिलूंगी जरूर तुझसे मैं || जब तू पवन बनेगा मैं वर्षा बन जाउंगी पहले तुझसे टकराऊँगी फिर तुझे समेट के बरस जाउंगी ये होगा , कही और किसी और जन्म में मिलूंगी जरूर तुझसे मैं || तू चित्रफलक बनना मैं रंग बन तुझमे सिमट जाउंगी इस जन्म न हो पाए एक रंगो भरा जीवन ये होगा , कही और किसी और जन्म में मिलूंगी जरूर तुझसे मैं || तू आत्मा बनना मैं शरीर बनूँगी तू काया बनना मैं शाया रहूंगी ये होगा , कही और किसी और जन्म मिलूंगी जरूर तुझसे मैं || तू बादल बनना मैं बिजली बनूँगी तू किनारा बनना मैं नदी बनूँगी ये होगा कही और किसी और जन्म में मिलूंगी जरूर तुझसे मैं || तू पर्वत बनना मैं झरना बनूँगी तू प्रेम बनना मैं प्रीत बनूँगी ये होगा कही और किसी और जन्म में मिलूंगी जरूर तुझसे मैं || तू भाग्य बनना मैं कर्म बनूँगी तू शुर बनना मैं ताल बनूँगी तू चाँद बनना मैं चांदनी बनूँगी ये होगा , कही और...
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ये हौसलों की उड़ान हैं ये हौसलों की उड़ान हैं ये रुकेगी नहीं || पाँव थक जाये अगर छाले आ जाये अगर पथरीले रास्ते हो ये रुकेगी नहीं ये हौसलों की उड़ान हैं || चमकनी हैं बिजली चमक जाये घटा को फटना हैं फट जाये चाहे राह कितने भी पथरीले हो चलते चले जाना हैं ये रुकेगी नहीं ये हौसलों की उड़ान हैं || वक़्त शातिर हैं कुछ तो शादीश कर रहा होगा कुछ न कुछ उसके मन में भी चल रहा होगा वो रोकेगा , पथ से पथिक तू हटना मत तेरा ईश्वर तेरे साथ हैं तू चलता रह तू नहीं रुकेगा तू नहीं थकेगा ये रुकेगी नहीं ये हौसलों की उड़ान हैं || तू अभिमन्यु बन जा अपने हाथ से वक़्त का पहिया घुमा सारे बाधा रूपी कौरव मारे जायेंगे तू हिम्मत दिखा चाहे चक्रब्यूह कितना भी बड़ा हो तुझे कोइ न रोक पायेगा तू बिजेता बन के आएगा तू रुक मत तू थक मत ये रुकेगी नहीं ये हौसलों की उड़न हैं || धुप तेज होगी हवाएं भी अपना रुख बदलेंगी दिशाएँ मूड जाएँगी चांदनी रूठ जाएगी तू रुक मत तू थक मत ये रुकेगी नहीं ये हौसलों की उड़ान हैं || कुछ रूठ जायेंगे कुछ छूट जायेंगे कुछ बातें करे...
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सुबह की शुरुआत || आज की सुबह की शुरुआत कुछ ऐसे करते हैं | आपसे साँझा करते हैं अपनी कुछ बात || तो चाय के साथ आप आईये और हमारे मण्डली में शामिल हो जाईये || खुद को आगे बढाईये और दुसरो को मौका दीजिये || किसी गिरे हुए इंसान को उठाने का प्रयाश कीजिये || किसी के अच्छे प्रयाश को सराहना दीजिये || खुद को खुद ही आंकिये खुद के कर्मो पे ध्यान दीजिये || खुद को सदा आगे बढ़ाने में प्रयाश दीजिये || याद रखे कभी भी कुल्हाड़ी का प्रथम प्रयाश पेड़ को नहीं काटता , लेकिन बिना प्रथम प्रयाश के अंतिम प्रयाश की गड़ना हो भी नहीं नहीं सकती || इसलिए रोज प्रथम प्रयाश करे || हमें रोज एक दिन प्रयाश के लिए ही मिलता हैं || इसका सदुपयोग करे और खुस रहे जय हिन्द जय भारत प्रिया मिश्रा :)
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वो एक दिन वो एक दिन मुझे मिला था | उससे मिलने का उससे बातें करने का | लेकिन मैं कही गुम था | पता नहीं कहाँ उसकी आँखों में शायद | उसकी आँखे मुझसे पूछ रही थी | मेरा गुनाह बता तो , जो इतने दिन गुजर गए और आज एक दिन के लिए मिले हो | मैंने कितने वक़्त गुजरे तुम्हारे बिना | एक दिन कई सदियों के सामान गुजर गयी और तुम सिर्फ एक दिन के लिए मिले हो | मैं क्या जवाब देता | मैं चुप रहा जैसे पहले था | मुझे पता था वो मेरी खामोसी पढ़ लेगी और मुस्कुरा के कहेगी रहने दो मुझे पता हैं मेरी किस्मत में सारे ऐसे ही हैं | मैंने उसे कोइ वादा तो नहीं दिया बस एक बार उसे गले लगा लिया | ये बताने को की हमारी दुरी ही हमारा प्यार हैं और फिर हम एक दूसरे का अनकहा एहसास लेके लौट आये | भींगी आखो से वो मुझे दूर तक ताकती रही होगी, मुझे पता था लेकिन मैं नहीं मुड़ा | खुद को पत्थर बना के चलता रहा | आज तक चल रहा हूँ कोइ मंजिल लिए बिना , कैसे लूँ कोइ मंजिल सारे रास्ते उस से होकर ही गुजरते हैं ||
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तो मैं क्या न खुद को सवारु मैं क्यों न खुद को सवारु मुझे बनाया बनाने वाले ने फुर्सत से , उसकी इस मेहनत को क्यों मैं जाया करू मैं क्यों न खुद को सवारु || मुझसे बेहतर ये दुनिया होगी मान लेती हूँ सबकी बात लेकिन मैं , क्यों खुद को कम देखु मुझमे क्या कमी हैं मुझे भी बनाया बनाने वाले ने फुर्शत से तो क्यों, क्यों न मैं खुद को सवारू || आज जरा कम होंगी कल मैं सबसे ऊपर होंगी उनको गुरुर होगा खुद पे मैं हर रोज एक कदम बढ़ रही होंगी वो खुद को आसमा समझ बैठे हैं तन के और मैं , तारा से सूर्य और सूर्य से ब्रह्माण्ड बन जाउंगी मैं वो खुसबू हूँ जो दूर चमन तक जाउंगी मुझे बनाया हैं , बनाने वाले ने फुर्शत से तो क्यों , क्यों न मैं खुद को सवारु || प्रिया मिश्रा :)
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बिकलांग || मैै बिकलांग हूं अपाहिज नही कुछ खो गया हैै मेरे शरीर से जान गवाया नही, जरा सा दुख हैै पर तरस खाने की जरूरत नही || मै इनसान हूं कूछ खोया हैै तो कूछ पाया भी हैै हौसलो की उड़ान हैं उमिदो के पंख है हैै खूद पे इतना बिशवास लड़ ही लेंगे ऐ जींदगी तूझसे क्योकिं मै विकलांग हूं अपाहिज नही || प्रिया मिश्रा 😊 😊
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शुरुआत दिन की शुरुआत हमेशा अच्छे से करे | क्यूंकि शुरुआत अगर अछि होती हैं तो अंत और अच्छा होता हैं || इसको कुछ ऐसे समझे अगर आपके अलमारी में किताबे सुरु से कतार से न रखी हो | कोइ यहाँ कोइ वहां पड़ा हो तो क्या आप ऊपर के उसकी कतार में किताबे अच्छे तरीके से रख पाएंगे ? नहीं ना || इसलिए दिन की शुरुआत हमेसा अच्छे से करे || ताकि दिन भर आपकी ऊर्जा बनी रहे | दुसरो के लिए भी दिन अच्छा करे | याद रखे आपका एक गलत शब्द किसी की पूरी जिंदगी ख़राब कर सकता हैं | जब आप किसी को अकारण बोलते हैं , अकारण लांछन लगाते हैं | वो शब्द उसके दिमाग में जाके छप जाता हैं और वो पूरी उम्र या तो मानशिक पीड़ा में जीता हैं या आपके जैसा ही कड़े शब्द बोलने वाला बन जाता हैं || इसलिए गंदे और कड़े शब्दों को बोल कर समाज और किसी व्यक्ति की जीवन के जीवन की शुरुआत ख़राब न करे || इसलिए अच्छा बोले , कम बोले और मुस्कुरा के दिन की शुरुआत करे जय हिन्द , जय भारत सुप्रभात प्रिया मिश्रा :)
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रात रात हो गयी चलो अब सोते हैं आज की बात हो गयी कल कुछ होंगी रहने दो बातो को चलो अब सोते हैं मीठे सपनो में खोते हैं || कल का सबेरा एक नया सपना सजाने का हैं चलो आखों में कुछ सपने भर लो जागते नैनो को ज़रा सीतलता से भर लो कुछ कल करना नया आज बहोत हो गयी आज की बात हो गयी कल कुछ होंगी चलो कुछ सपने देखते हैं रात हो गयी चलो अब सोते हैं || प्रिया मिश्रा :)
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वो क्या सोचेगी ?? रिपोर्टर : - और तालियों के साथ स्वागत कीजिये हमारे पहले मेहमान श्री नमन जी का नमन :- धन्यवाद् , आप सभी का धन्यवाद् रिपोर्टर :- महासय आज आप जिस मुकाम पे हैं इतनी कम उम्र में वहां सायद ही कोइ होता हैं आप कोइ इंट्रोडक्शन के मोहताज नहीं | बच्चा - बच्चा आपको जनता हैं | मैं बस इतना जानना चाहता हूँ की कोइ ऐसी बात कोइ ऐसा पल और कोइ ऐसा वक़्त था आपके जीवन में जो आपको आज खोने का एहसास हैं || नमन :- ऐसी सिर्फ एक ही थी , जिसके मैं करीब था | पर मैं उसकी महत्वा समझ नहीं पाया उसने हर मोड़ पे मेरा साथ दिया | वो मेरी खामोसी समझ जाती थी | और मैं उसकी आँखे नहीं पढ़ पाया | मैं इतना व्यस्त था खुद को म...
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सूर्य आज का सूर्य एक सबक दे जायेगा जाते - जाते कितनो की आँखों में चमक दे जायेगा वो अकेला हैं पर उदाश नहीं उसकी दो आँखे हैं और कितनो को आँखे दे जायेगा आज का सूर्य एक सबक दे जायेगा || उसकी आँखों में जो चमक हैं सूर्य की देन , उस सबेरे की देन हैं जो सूर्य अपने साथ लाया हैं वो खुस हैं , आज वो एक बार फिर खुद को देख पाया हैं वो जो मारा नहीं अभी जिन्दा हैं अब कुछ कर के जायेगा आज का सूर्य एक सबक दे जायेगा || आज वो फिर से मिलेगा सब से आज फिर वो मुस्कुरा के जायेगा कितनो को हसी देगा कितनो को मंजिल दे जायेगा आज का सूर्य एक सबक दे जायेगा || कुछ को उदासी मिलेगी लेकिन वो ठहरेगी नहीं वो कुछ सीखा के जाएगी जो सिख जायेगा उसे गति मिल जाएगी वो सूर्य की तरह चमक जायेगा आज का सूर्य एक सबक दे जायेगा || आज पत्ते भी चमकेंगे रोज की तरह आज नदी फिर से झिलमिलायेगी आज चाँद भी जरा कम दिखेगा वक़्त चलेगा और चमक जायेगा आज का सूर्य एक सबक दे जायेगा || प्रिया मिश्रा :)
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जिंदगी अभी बाकि हैं मैं जितनी बार गिरूँगी उतनी बार उठूंगी जिंदगी अभी बाकि हैं || मुझे जितनी बार इंकार किया जायेगा उतनी बार प्रयाश करुँगी सब कुछ जा चूका हो शायद , लेकिन जिंदगी अभी बाकि हैं || मैं जिन्दा हूँ , मेरे पाँव थके नहीं , तो क्यों रुकेंगे वो चलते ही रहेंगे क्यूंकि , जिंदगी अभी बाकि हैं || मुझसे होकर ही गुजरना होगा उस जित को जो आज खुद पे इतरा रहा हैं वो मुझे ही मिलेगा मेरा होकर रहेगा वक़्त भी मेरा होगा सब कुछ जा चूका हो सायद लेकिन , जिंदगी अभी बाकि हैं || वो लौट के आएगा अभिमानी अहंकारी उसे जरूर लाएगा मेरा वक़्त जो आज गुरुर खाये बैठा हैं वो मुझे भूल नहीं सकता उसे आना ही होगा वो कितनी भी दूर गया हो उसका इन्तजार करुँगी मैं मरी नहीं जिन्दा हूँ और , जिंदगी अभी बाकि हैं || मैं अपाहिज नहीं हूँ आज भी मेरी आँखे खुलती हैं दुनिया देखती हैं मेरे हाथ सदा आगे आते हैं मदद के लिए मेरे पैरो पर मैं खड़ी हूँ तो क्यों न , क्यों और कहा जाएगी वो मेरी जित आएगी , जरूर आएगी क्यूंकि , जिंदगी अभी बाकि हैं || प्रिया मिश्रा :)
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थपड़ आज एक नया थप्पड़ लगा मुझे उसने मुझे फिर से ये एहसास करा दिया मैं नहीं थी कही नहीं थी उसके लिए वो सब कुछ भूल चूका था सब कुछ मेरा प्यार मेरे दोस्ती सब कुछ और सामने से गुजर कर उसने एक और थप्पड़ दिया मुझे जो सायद जीवन भर याद रहे मुझे लेकिन मैं उसे सुक्रिया करना चाहूंगी मुझे फिर से एहसास करने के लिए अपनी पुरानी दोस्ती का और थप्पड़ वाले दर्द का || प्रिया मिश्रा :)
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मदद मैडम अब कौन सा किताब लिखेंगी | शीर्षक क्या होगा ? शीर्षक होगा मदद , और नायक होगा ? क्या बताऊँ आप खुद पढ़ लेना | अच्छा मैंडम कुछ तो बताये अपनी नई कहानी के बारे में | कहानी नहीं ये आप बीती हैं | ये किताब का हर पन्ना मैं हूँ और शब्द उसके नाम का हैं बस इतनी सी कहानी हैं | कोइ पन्ना खाली नहीं छोडूंगी | हर पन्ने पे उसको उभारूंगी अपने सपनो की तरह | मैं इस किताब में उसको एक चेहरा देना चाहती हूँ एक ऐसा चेहरा जो सदा सबको याद आये और ललकार के कह जाये मैं गुजरा नहीं हूँ | बलि चढ़ा गया हूँ | इस खोखले समाज का | मुझसे तब सबने आँख मोड़ ली जब मुझे सबसे जायदा लोगो की जरुरत थी | राह का हर जाता हुआ आदमी मुझे मरता छोड़ गया था | मैं तड़प रहा था और लोग फिल्म बना रहे थे | अपनों के गुजरने का भी फिल्म बनाया हैं क्या ? उसकी लाल आँखे और उसका दर्द दिखाना चाहती हूँ की कैसे वो तड़पा होगा , कैसे उसे पीड़ा हुई होगी | कैसे वो आखरी वक़्त में अपने अपनों से मिलने की इक्छा रखते हुए चला गया और मैं आखरी वक़्त में अपने सात फेरो का कसम न निभा पाई जरा सा देर न हुई होती तो वो यहाँ...
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मैं अकेली कहाँ हूँ तेरी यादो को समेटे मैं तुझसे रोज मिलती हूँ एक वादा करती हूँ तेरी ही रहूंगी फिर अपने पागलपन पे मुस्कुराने लगती हूँ|| मैं हर रोज तेरी बनाई गलियों से गुजरती हूँ तुझसे तेरे बिना ही बातें करती हूँ तुझसे शिकायते करती हूँ और लौट आती हूँ अकेले , कैसे लेके आऊं तुझे मेरी यादो में, आज कल वहां भी पहरा हैं और मुझे तुझे कैद करना पसंद नहीं इसलिए तुझसे रोज विदा लेती हूँ || मैं तेरी हर कदम को नापते हुए किनारे -किनारे नदियों के गुजरती हूँ वो ठहर के, मेरे पागलपन पे हस्ती हैं और मैं शर्मा जातीं हूँ || मैं तुझमे कुछ ऐसे खो जाती हूँ की , हवा भी छू ले तो मैं शर्मा जाती हूँ मैं अकेली कहाँ हूँ तेरी यादो को समेटे मैं तुझसे रोज मिलती हूँ प्रिया मिश्रा :)
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इस गुजरते वक़्त के साथ एक वादा करो कह दो की तुम हमारे हो || मेरी मंजिल बन जाओ मुझे अपना ठिकाना बना लो ठहर जाओ मुझमे इस तरह की मिल जाये हम जमीं आसमा की तरह || इस गुजरते वक़्त के साथ एक वादा करो कह दो की तुम हमारे हो || मुझे अपना सफर बना लो तुम मेरा वादा बन जाओ चलो कसम खा ले जुदा हमें सिर्फ मौत कर जाएगी फिर दिया जलेगा तेरे- मेरे नाम का और तू दिया में सिमट जाना मैं बाती बन जाउंगी मिल के जलेंगे और जाते -जाते उजाला कर जायेंगे एक प्रेम का सबेरा कर जायेंगे || इस गुजरते वक़्त के साथ एक वादा करो कह दो की तुम हमारे हो || प्रिया मिश्रा :)
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सुबह एक नई सुबह हमेशा एक नई शुरुआत और एक नई सोच लेके आती हैं || उस नए सोच से एक वादा निभाए || इस पृथ्बी ने जितनी अच्छी सुबह हमें दी हैं || हम उसे बचाएंगे और खुद को भी || खुद के खुसियो के लिए मोटरगाड़ियों के अधिक प्रयोग द्वारा इसे प्रदूषित नहीं करेंगे || ये सब चीजे आपके पैसे भी खर्च कराती हैं और आपकी प्रकृति को भी हानि पहुँचाती हैं || बेहतर हो इनसे दूर रहे || इस से अच्छा हैं आप बाई सइकिल का प्रयोग करें || और उन पैसो को अपने हेल्थ इन्सुरेंस या अपने भविस्य के लिए संभाल के रखे || अपने कमाई हिस्सा जरुरत मंदो को जरूर दे || दुआ देंगे , वो भी एक कमाई हैं जो बुरे वक़्त में काम आती हैं || कभी भी अपने कमाए हुए सारे पैसे भावनाओं में बह कर कही भी किसी को भी न दे दे ये तय कर ले की वो आदमी आके पैसे का सदुपयोग कर रहा हो दुरुपयोग नहीं || स्वम के लिए हमेसा सेविंग रखे || ये आपको एक सोच देगा , आगे बढ़ने की ताकत देगा और आपके जरुरत पे आपको काम आएगा || जायदा से जायदा सब्जिया उगाने का प्रयाश करे या फिर हमारे सामान्य मार्किट से...
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चाँद चाँद की आहट हुई हैं रात अभी बाकि हैं || कोइ जगा हैं कही किसी के इन्तजार में कोइ ढूंढ रहा हैं कुछ खाने को किसी को ठिकाने नहीं हैं सब कुछ अधूरा हैं बात अभी बाकि हैं चाँद की आहट हुई हैं रात अभी बाकि हैं || बिजली चमकेगी बादल गरजेगा कोइ किसी से मिलने को शायद उम्र भर तरसेगा यही गुजार देगा वो रात करवटो में वो आएगा नहीं चाहे पलके कितनी भी भींग जाये इम्तहां अभी बाकि हैं चाँद की आहट हुई हैं रात अभी बाकि हैं || कोइ चांदनी में नहायेगा कोइ चाँदी में खायेगा फर्क बस इतना होगा चांदनी वाला भूका होगा और चाँदी वाला लुटायेगा फर्क और हैं बस सबक अभी बाकि हैं चाँद की आहट हुई हैं रात अभी बाकि हैं || प्रिया मिश्रा :)
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इतिहास मैं एक इतिहास रचना चाहती हूँ जायदा कुछ नहीं चाहती बस पूरा आसमा और पूरा जमीं चाहती हूँ मेरी कलम पहुंचे गलियों में और मेरे पन्नो पे भी कहानी लिखी जाये कुछ ऐसा हो मैं जिन्दा रहूं सबकी बातो में मेरे किस्से से सबकी रगो में उबाल आ जाये ऐसी चमक हो मेरी आँखों में की सूरज भी कहे , मैं क्या रौशनी दूँ तुझे तू जहाँ भी जाये वहाँ रौशनी की बहार आ जाये चाँद की तरह सीतलता छोड़ू और चांदनी की तरह सबकी आँखों में मुस्कुराऊं मैं जायदा कुछ नहीं चाहती बस पूरा आसमान और पूरा जमीं चाहती हूँ || मैं एक ऐसा इतिहास रचना चाहती हूँ || प्रिया मिश्रा
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अँधेरा यहाँ क्या कर रही हो बिच सड़क पे तुम आये नहीं , और मुझे अँधेरे से डर लगता हैं | ओहो अँधेरा खा थोड़ी जायेगा | आवो चलो बैठो और ये देखो मैं क्या लाया हूँ | क्या हैं ये | तुम्हारी माँ के यहाँ जाने की टिकिट खुस हो न अब | मैं अब चला जाऊंगा अपने काम पर चला जाऊंगा | तुमको पता हैं न हमें छुट्टी जरा काम मिलती हैं | सरहद पर हमारी जरुरत हैं | और सुनो मेरे जाने के बाद अँधेरे से मत डरना रात को चीरते हुए सबेरा लाना | आखिर एक फौजी की बीवी हो | अच्छा चलो अपना सामान बांध लो और मेरा भी बस आज रात तक हूँ जी भर के बातें करेंगे अच्छा सुनो पकौड़े बना देना प्ल्ज़ | तुम्हारे हाथो में वो जादू हैं बिन डर के पकोड़े खता हूँ चटनी जगाऊँ या न लगाऊं सारा चट कर जाता हूँ || हो गया तुम्हारा , अब जाओ और हाथ मुँह धो लो पकोड़े त्यार हैं || सिमा सिमा कहा हो तुम्हारे पकोड़े त्यार हैं यहाँ अँधेरे में क्या कर रही हो तुम्हे डर नहीं लगता नहीं माँ वो जाते जाते कह गए थे , अँधेरे से मत डरना रात को चीरते हुए सबेरा लाना आखिर फौजी की बीवी हूँ , थी उसके आँखों में चमक थी और आसु...
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काश काश ये गम कागज की कश्ती होती तो मैं इसे बारिश के समंदर में बहा देती फिर घंटो देखती उसे डूबता हुए जैसे वो मुझे देखता हैं और मुस्कुरा के कहती चलो अब अलबिदा कह दो की ऐ गम तुझे मैंने हरा दिया तू मुझसे लिपटना चाहता था और मैंने तुझे गंगा में बहा दिया अब सर्धांजलि ले ले और चला जा की अब तेरा कुछ भी नहीं यहाँ बस खुसियो का बसेरा हैं तू पराया था और पराया ही रह गया तू कागज बन के बह गया खुशियाँ खुदा बन के रह गयी प्रिया मिश्रा :)
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गिरो नहीं रुको नहीं तुम साहसी हो डरो नहीं उठो चलो और चिल्लाओ इतना की आसमा फ़ट जाये जमी में दरार आ जाये और किस्मत में निखार आ जाये || गिरो नहीं रुको नहीं तुम साहसी हो उठो चलो और हौसला इतना रखो की पर्वत भी काँप जाएँ वो छोटा समझे खुद को और तेरे कदमो में झुक जाये || गिरो नहीं रुको नहीं तुम साहसी हो उठो चलो खून में उबाल लाओ पसीने को इतना बहावो की बंजर जमीं का सीना फट जाये दूध उतरे उसके सिने से और कोइ अंकुर कही फूट जाये || गिरो नहीं रुको नहीं तुम साहसी हो उठो चलो पग को कुछ ऐसे बढ़ावो की काँप जाये ये धरती नदियों का बहना थम जाये तेरे में चमक हो इतनी की ये सूरज भी फ़ीका पड़ जाये ||
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मैं तुम्हे कैसे सोचती हूँ मैं तुम्हे कैसे सोचती हूँ मैं तुम्हे ऐसे सोचती हूँ जैसे चाँद चकोर को सोचता हैं || मुझे तुम्हारा इंतजर कुछ ऐसे हैं जैसे एक भूके को रोटी के लिए तड़पता हैं एक बच्चा माँ के लिए और एक जमीं जैसे बारिश के लिए तड़पती हैं || मैं तुम्हे ऐसे चाहती हूँ जैसे तुम्हे पाने के लिए दुआ मांगी थी और तुम मेरी आखरी ख्वाइश हो || मैं तुमको कैसे सोचती हूँ मैं तुमको ऐसे सोचती हूँ जैसे चाँद चकोर को सोचता हैं || मैं सितारा बन जाना चाहती हूँ और तुम्हे चाँद बना के तेरी इर्द - गिर्द एक घेरा बना लूँ मैं तुझे करीब से महसूस करना चाहती हूँ || मैं तुम्हे कैसे सोचती हूँ मैं तुम्हे ऐसे सोचती हूँ जैसे चाँद चकोर को सोचता हैं || प्रिया मिश्रा :)
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मेरी प्राथना मेरी प्राथना बस इतनी हैं मैं दुनिया के साथ मुस्कुराऊँ और दुनिया मेरे साथ मुस्कुराये || मेरी प्राथना बस इतनी हैं कोइ रोये भी तो मुस्कुरा के और कोइ इतना मुस्कुराये की उसके आँखे भर आये || मेरी प्राथना बस इतनी हैं मैं किसी की लाठी का सहारा बन जाऊँ मैं भूखे की रोटी बन के उसकी दुआएं पाऊँ || मैं किसी के घर की खुसिया बन जाऊँ मैं हसूं तो जहाँ हॅंस दे और मैं दुआ बन जाऊँ || मैं किसी की किताब बन जाऊँ मैं किसी की कलम बन के कागज पे उसकी स्याही बन उतर जाऊँ मेरी प्राथना बस इतनी हैं की मैं मरते वक़्त भी मुस्कुराऊँ और किसी को मुस्कराहट दे जाऊँ || प्रिया मिश्रा :)
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तू मत हार तू मत हार जिंदगी अभी बाकि हैं और तू अभी जिन्दा हैं तेरी साँसे चल रही हैं और कदमो में जान हैं ये पहचान हैं तेरी तू मत हार तू अभी जिन्दा हैं || उठ बंजर जमीं में फसलें ऊगा दे वो चाँद जरा आज उदाश हैं उसे आईना दिखा दे वो मुस्कुरा दे तू भी किसी की मुस्कराहट बन जा जरा मुस्कुरा दे तू मत हार तू अभी जिन्दा हैं || ये काफी हैं की तेरी आँखे आज की सुबह देख पाई फक्र कर खुद पर तू दुनिया देख सकता हैं तेरी आवाज में वो दम हैं आसमा तक अपनी आवाज पंहुचा तू मत हार तू अभी जिन्दा हैं || कल की ही बात हैं तुझे तेरी माँ ने दुआए दी हैं तेरी पिता के कंधे तुझे पुकार रहे हैं उनकी ऊँगली पकड़ के चला उठ अब वो कर्ज चूका दे चल अब जरा संभल जा माँ और पिता में जिन्दा हो जा तू मत हार तू अभी जिन्दा हैं तू बारिश की बुँदे बन जा भींगा दे इस दुनिया को प्यार के बारिश में खुद भी जरा मुस्कुरा तू हार मत तू अभी जिन्दा हैं तू हार मत तू अभी जिन्दा हैं || प्रिया मिश्रा :)
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तलाक वो अपने पापा से झूट बोलता था और हम लॉन्ग ड्राइव पे जाते थे || वो क्लास बंक करता था और हम मूवी जाते थे || वो अपनी माँ से झूट बोलता था की उसे भूख नहीं हैं और हम बाहर रेस्त्रां के भठूरे चटकाते थे || वो अपने माँ - बाप के पैसे उडाता था और मैं कहती थी हाउ स्वीट तुम मुझे कितना प्यार करते हो इतना महंगा गिफ्ट मेरे लिए ?? अपनी बेकार की जिद में मैंने उस से कभी पूछा ही नहीं || तुम्हारी जेब में क्या हैं || मैंने कभी उस से नहीं पूछा वो बार - बार झूट क्यों बोलता हैं || वो क्लासेस क्यों बंक करता हैं || उसका भविस्य कहा हैं || मैंने पूछा ही नहीं की मैं कहा हूँ उसके दिल में या बदलने वाले वक़्त में जहा मैं, नहीं कोइ और होगा और फिर कोइ और || मैं उस से पूछा नहीं ये बाइक की रफ़्तार किसकी वजह से हैं || मैंने कभी नहीं पूछा की उसके पापा चपले घिसी हुई क्यों पहनते हैं || मैंने कभी ये नहीं पूछा की उसकी बहने कहा हैं || कही वो अंधरे में ग़ुम तो नहीं || मैंने ये कभी नहीं पूछा की उसकी माँ के घुटनो का दर्द कैसा हैं || मैंने कभी उसकी जिमेदारियो का एहसास ही नहीं करवाया || और वो आदते जो पहले मेरी पसंद ...
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कभी -कभी हम अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने के फैसले में अपना पूरा जीवन पतन की और ले जाते हैं || खुद के लिए जीना अच्छी बात हैं लेकिन अगर उसमे दूसरे के लिए जीना आ जाये तो जीवन लाजवाब हो जाये, हैं ना || एक किनारे से खुद को सवारों एक किनारे से दुसरो को सवारों तो जीवन में संतुलन बना रहता हैं वरना एक और का खिचाव सिर्फ गिराता हैं और , गिरना इत्तेफाक होना चाहिए स्वभाव नहीं || प्रिया मिश्रा :) :)
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चाय चाय एक दिन की शुरुआत एक मिठास एक सुबह की किरण एक एहसास एक प्यार एक रिश्ते की कमाई || कितना कुछ आ जाता हैं ना , जब हम चाय के बारे में सोचते हैं || सोच कोइ भी हो चाय सुकून दे जाता हैं वो मुस्कुरा के चाय क्या दे गयी हम दीवाने हो गए रिश्ते की बात चलते - चलते कुछ यूँ मंजिल तक गयी || चाय के पानी का सादा पन हमारा बचपन पत्तियों का रंग जवानी के जोश और चीनी की मिठास प्यार का एहसास अदरक का स्वाद जरा सा कड़वा , जिंदगी जीने का सबक दूध की खुसबू माँ का हाथ और अब बनी ये चाय साठ की उम्र में चाय की चुस्की और अपने फर्ज के पूरा करने का सुकून , और समाचार पत्र के साथी के रूप में चाय || चाय की उबाल और जिंदगी का कड़वापन , और फिर सबक || चाय जितनी जायदा उबलती हैं उतनी जायदा स्वाद बनती हैं चाय की तरह ही जिंदगी जितने जायदा उबाल के इम्तहान लेती हैं सबक चाय की मीठे की तरह देती हैं || हैं ना , अदरक , जो चाय का स्वाद बढ़ता हैं वो टेढ़े - मेढ़े सा कुरूप सा मिटटी से जुड़ा हुआ कितनी बड़ी सबक दे जाता हैं रंग - रूप के भेद की मिटा जाता हैं ये वो ताश का पत्ता हैं जो दीखता ...
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मुझे भूलने की सोचोगे तो रो पड़ोगे मेरी मुस्कराहट जो तुम्हे याद आएगी || यूँ कैसे ठुकरा पावोगे मेरे शब्दों को तुम्हारी जुबान भी लड़खड़ा जाएगी || कैसे कह दोगे, तुम मुझसे अनजान हो तुम्हारी रूह काँप जाएगी || मुझे भूलने की सोचोगे तो रो पड़ोगे मेरी मुस्कराहट जो तुम्हे याद आएगी || यूँ , मेरी बातें सबसे करते ही हो मुझे मालूम हो , कैसे छोड़ोगे ये आदत कहाँ कही और बात तुम्हे याद आएगी अगर निकाल दोगे मुझे अपने शब्दों से तुम्हे कौन सी बात सूझेगी || जो निकल दोगे मुझे अपने ख्यालो से तो रो पड़ोगे मेरी मुस्कराहट जो तुम्हे याद आएगी || प्रिया मिश्रा :)