हमारा प्रेम

हमारा प्रेम तब शुरू हुआ था
जब पता भी ना था प्रेम क्या होता हैं

वो स्कूल के बस्ते
लिए आती थी
और फिर हम बन जाते हैं
एक सफर के एक राही

हमसफ़र बनने जैसा तो सोचा
भी नहीं था कुछ
लेकिन आज हम
एक थाली में
एक रोटी के आधे - आधे
टुकड़े में जो स्वाद लेते हैं
वो स्वाद सायद ही कही मिला हो ||

वो अब पहले जैसे नहीं रही
कमर झुक गयी हैं
हाथो की मेहँदी बालो में आ गयी हैं
 मैं भी अब पहले जैसा नहीं रहा
  लेकिन प्रेम आज भी हमारा
पहले जैसा ही हैं ||

न उसके बालो की सफेदी
ने मेरे प्रेम को कम किया
न मेरी खर्राटों ने उसके प्रेम को ||

आज भी इतने बरसो बाद
एक ही थाली लगती हैं
और आधी - आधी
रोटी साँझा करते हैं हम ,
जिंदगी की तरह
आधा - आधा
इसलिए न वो बूढी होती हैं
न मैं बूढ़ा होता हैं ||

सिर्फ तारीखों के साथ वक़्त बदला हैं
हमारा कैलेण्डर आज भी सोलह साल का ही हैं ||

प्रिया मिश्रा :)

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