"ये शाम ढल ना जाये "

कल का पीपल का पेड़
जो पौधा हुआ करता था
वो अब बड़ा हो गया हैं
अब वो बाहें फैलाये खड़ा है
उसकी बाहों में असंख्य सितारे छुपे है
सबको छुपाता वो पेड़
मुस्कुराता सा वो पेड़
ऐसा लगता है
जैसे खुद को बच्चो को गले लगाया है
अभी कल की ही बात थी
एक अनजानी बेल उसपे आ टिकी
वो बेल उसके जीवन की डोर हो गयी
वो साँस लेने लगा उसमे
वो बेल के सहारे पलने लगा
लेकिन वो बेल
अब धीरे - धीरे उतरने लगी है
पेड़ भी अब उदाश होक सूखने लगा है
डर लगता हैं
बेल सुख ना जाये
पीपल की अरमान डूब ना जाये
कही ढलते - ढलते
ये शाम ढल ना जाये ||

प्रिया मिश्रा :)

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