सपने में कहानी !!
मैं एक कहानी लिखना चाहती थी !! ये एक पुरानी बात हैं !! पर वो इक्छा कही न कही दबी हैं !! सोचती हूँ कुछ सपने में ही देख लू !! लेकिन दीखता कुछ नहीं !! कभी- कभी कुछ ख्याल आता भी हैं जैसे
ख़ाली जिंदगी के बारे में ही लिख दूँ!! अपनी न सही किसी और की !! पर वो भी अभी अधूरा ही हैं !! एक नई अच्छी सुन्दर सी डायरी में कुछ अधूरा लिखना भी नहीं बनता !! करू क्या ये भी नहीं सूझता !! पर हर रोज सोचती थी मुझे सपना क्यों नहीं आता कुछ अच्छा सपना एक नई कहानी का सपना !! हर रोज सोचते सोचते सो जाती थी !! कोइ सपना नहीं दीखता था !! लेकिन कल दिखा एक सपना उसमे कहानी और फिर जाने कितनी कहानियाँ !! एक अंगूर की एक लता से एक फल जमीं पर गिरा कोइ लेने न आया इस बचे फल को !! आज कल कहाँ किसी के पास टाइम हैं बगीचे की सैर करने को बस यूँ ही सैर के नाम पर चार दौड़ लगा आते हैं कही आस - पास की !! आज कल जैसे माँ -बाप बच्चों के लिए तड़पते हैं !! वैसे ही प्रकृति मानवता के लिए !! वो फल भी गिर के इंतजार करता रहा कोइ आएगा ले जायगा !! कोइ न आया !!
पहले थोड़ी उसपे धूल जमी फिर जरा सी बूंदा बांदी और अंकुर फुट आया !! अब वो फल बीज बन के नन्हे पौधे में बदल गया !! फिर पेड़ बना और उसपे फल आये !! राहगीर आते रहे लेकिन वो अंगूर का फल कब गिरा कब बीज बना कब पौधा किसी को खबर भी न हुई !! बस कुछ लोगो को उसके लत्ते की छांव की आदत हो गयी !! ये पेड़ भी अजीब हैं न किसी से कुछ नहीं लेते सिर्फ देते ही हैं !! सायद यही कारन रहा इनके कटने का !! अगर कोइ चीज उपयोगी हो और गूंगी हो कोइ अपराध न बनता हो उसके हलाल का तो कटा ही जाएगा और परोस के सब मजे में खाएंगे !!
लेकिन इस अंगूर की पेड़ की माँ से इसकी कहानी थोड़ी अलग हैं !! इसके फल को एक बच्चा चुरा के अपने घर ले गया और भूल गया वही पीपल की पेड़ के निचे !! बेचारे अंगूर के बीज बिछड़ के अपने माँ से रोये थे लेकिन अब इनकी कौन सुनता हैं लोग इन्हे खाये या कुचले इनका जनम तो परोपकार के लिए हुआ हैं !! इनको खबर भी तो नहीं वक़्त बदल गया हैं !! अब परोपकार एक जुर्म हैं !! जिसमे सजा के तौर पर बाकायदा दुर्गति निश्चित होती हैं !! भगवन श्री राम ने दुर्गति की परिभासा बड़ी अच्छी दी हैं !!
की जब इंसान हार जाये, जब उसे त्याग दिया जाये, वो मौत की मांग करे और उसे वो भी न प्राप्त हो !! इस गति को दुर्गति कहते हैं !! इसलिए किसी कार्य की वजह से हार कासामना करना पड़े तो मौत की मांग मत करो !! वरना दुर्गति दरवाजे पर दस्तक देती हैं !! हारे हो ठीक हैं !! जो कुछ करता हैं वही हारता हैं !! तो ये एक तरह का अनुभव हुआ !! हार एक अनुभव हैं !! इस से सिख लेके आगे बढ़ाना हमारा कर्म हैं !! खैर मैं सपने में भी मुद्दे से भटक जाती हूँ !! अंगूर कुछ दिन वहाँ रहे !! वही पीपल के पेड़ के निचे फिर
उनपे भी वही धूल जमी जरा सी बूंदा - बांदी और एक और पौधा उग आया !! अब आप सोच रहे होंगे लड़के ने चोरी तो अंगूर के गुच्छे की कि थी फिर एक ही पौधा क्यों आया अधिक आने थे न !! दरहसल इनकी भी किस्मत वैसे ही होती हैं जैसे बारिस कि बूंदो कि अगर समुन्दर में गिरा तो खरा, नदी में गिरा तो मीठा, गंगा में गिरा तो पवित्र, और सिप में गिरा तो मोती !! पर इस बार के अंगूर कि लतो कि कहानी पिछले बार वाले से थोड़ी अलग हो गयी !! इस बार जो बच्चा अंगूर के गुच्छे चुरा के लाया था !! वो एक किसान का बेटा था !! तो ये अंगूर किसान के यहाँ पले- बढे !! इस बार ये लावारिस नहीं थे !! किसान बेचारे खुद को भूखा रख ले लेकिन अन्न का पेड़ इनके माँ के सामान ही होता हैं !! जिसे ये अपने खून से सोचते हैं !! वो बात अलग हैं कि आज कल खून भी बिका करते हैं !! किसान इन अंगूरों को देख के बड़ा खुस हुआ !! उसने सोचा कुछ खाने को रख लूँ कुछ को बेच के आता हूँ !! अचे दाम मिलेंगे तो इस अंगूरों के पेड़ के लिए जरा खाद आ जाएगी !! किसान बेचने गया और जमींदार के आदमी खरीद ले गए !! बड़ी मोल भाव हुई तब जाके सोना पीतल के भाव बिका !! आज कल यही होता हैं चमक हैं तो पीतल भी सोना और अगर नहीं तो सोना पित्तल जितना भी नहीं !! वक़्त बदल गया हैं !! रुपया बढ़ गया हैं !! विचार तो गिरेंगे ही कौड़ी के भाव !! पर ये जो अंगूर जमींदार के यहाँ गए इनके क्या कहने !! चाँदी के थाली में सजे !! पित्तल कि कुर्सी पर बैठे !! जमींदार के मुँह में गए !! जिसको इसने चंदन से धोया था कई मजबूरो का खून पी के!! जो बचे वो फेक दिए गए उसी के आँगन में !! एक फल फिर बीज बना और पौधा इस बार जमींदार के आँगन में !! देखने वालो कि भीड़ लगी हैं जब इसपे फल आये हैं !! कल जो अंगूर का पेड़ बगीचे में था उसे कोइ न देखता था !! अब देखो जमींदार के घर में सब देखते हैं !! जैसे गरीब का बेटा राजा ने गोद ले लिया हो !! चाहे स्वाद में खट्टा ही क्यों न हो पर मजाल हैं कोइ इसे खट्टा कह दे !! कल जब ये सोना था पित्तल के दाम बिका था !! और आज पित्तल हिरे कि दाम बिक रहा हैं !! कुछ तो उपहार भी भेजे गए हैं !! यहाँ के सेठ के वहाँ !! जमींदार से भी बड़ा सेठ हैं !! जमींदार तो सिर्फ मजबूरो के खून पिता था इसका तो महल ही लाशों पर खड़ा हैं !!ये लोग सफ़ेद कपड़ा पहन के रहते हैं !! अब जिसमे मानवता न हो !! भावना मर गयी हो !! वो लाश हैं और लाशे तो कफ़न में ही लिपटी रहती हैं !! ये सेठ बड़ा चालु निकला !! इसने ये अंगूर रखे ही नहीं तुरंत आम के आम गुठलियों के दाम बना लिए !! इसे एक राजनेता के यहाँ खातिरदारी में शामिल कर दिया !! ये राज सत्ता भी कमाल कि चीज हैं !! खुद कि लार चाँदी कि थाली में ऐसे परोसी जाती हैं जैसे पसीने बहा के गंगा में लपेट के सौगात भेजा हो !! ये राजनेता भी कम नहीं हैं !! इसने अपना चुनाव चिन्ह ही अंगूर के फल बना लिया !! बोला भाईयो और बहनो हमें ये हमारे दोस्त ने भेजा था !! लेकिन हमने इसे खाया नहीं बल्कि देश के कल्याण के लिए लगाया !! आपके कल्याण के लिए लगाया !! और मेरे प्यारे देश वासियो इसे हर शहर में लगाया जायेगा !! हर मुहल्ले में भेजा जायेगा !! जाती क्या हैं ??!! इसकी खबर नहीं !! बस वही पता चल जाये तो हम इसका सदुपयोग करे !! ये उपकारी हैं परोपकारी हैं !! लेकिन कुल जान लेना उचित हैं !! अब गन्ने कि खेत में ऊगा होगा तो हमारे लिए हानिकारक होगा !! क्यूंकि उसे खाने से हमें मधुमेह कि बीमारी हो सकती हैं
!! अगर करेले के बिच ऊगा होगा तो कड़वा होगा !! हम इसे भी आपको नहीं दे सकते क्यों कि ये आपकी जुबान को कड़वा बना देगा !! और अगर निम्बू के बिच ऊगा होगा तो खट्टा होगा हम और भी इसे आपको नहीं दे सकते !! क्युकी ये खट्टा होगा तो आपके दाँत ख़राब करेगा !! तभी एक खादिम राजनेता से बोला मालिक ये तो तीनो से होकर आया हैं !! पिछले का पिछले अंगूर गन्ने के खेत में ऊगा था !! बिच वाला करेले के और उसके बाद वाला निम्बू के और तो और मालिक जो आपके हाथ में हैं मालिक वो तो हरी मिर्च के बिच ऊगा हैं !! इसपर राजनेता फुट - फुट कर रोने लगा और कहा दोस्तों , मैं इसे खुद खाऊंगा इसे किसी को न न दूंगा !! मैं आप लोगो के लिए सारे जहर खाने को त्यार हूँ !! और इस तरह वो राज नेता सारे अंगूर वही खा गया !! अब न फल रहे न बीज उगे !! और भासन सुन ने वाले वो मजबूर ख़ाली पेट फिर से घर को लौट गए !! अब ख़ाली पेट किसको नींद आती हैं तो मेरा भी सपना टूट गया !! जहाँ देश टूट जाये तो सपने तो टूट ही जाया करते हैं !!
प्रिया मिश्रा !!
मैं एक कहानी लिखना चाहती थी !! ये एक पुरानी बात हैं !! पर वो इक्छा कही न कही दबी हैं !! सोचती हूँ कुछ सपने में ही देख लू !! लेकिन दीखता कुछ नहीं !! कभी- कभी कुछ ख्याल आता भी हैं जैसे
ख़ाली जिंदगी के बारे में ही लिख दूँ!! अपनी न सही किसी और की !! पर वो भी अभी अधूरा ही हैं !! एक नई अच्छी सुन्दर सी डायरी में कुछ अधूरा लिखना भी नहीं बनता !! करू क्या ये भी नहीं सूझता !! पर हर रोज सोचती थी मुझे सपना क्यों नहीं आता कुछ अच्छा सपना एक नई कहानी का सपना !! हर रोज सोचते सोचते सो जाती थी !! कोइ सपना नहीं दीखता था !! लेकिन कल दिखा एक सपना उसमे कहानी और फिर जाने कितनी कहानियाँ !! एक अंगूर की एक लता से एक फल जमीं पर गिरा कोइ लेने न आया इस बचे फल को !! आज कल कहाँ किसी के पास टाइम हैं बगीचे की सैर करने को बस यूँ ही सैर के नाम पर चार दौड़ लगा आते हैं कही आस - पास की !! आज कल जैसे माँ -बाप बच्चों के लिए तड़पते हैं !! वैसे ही प्रकृति मानवता के लिए !! वो फल भी गिर के इंतजार करता रहा कोइ आएगा ले जायगा !! कोइ न आया !!
पहले थोड़ी उसपे धूल जमी फिर जरा सी बूंदा बांदी और अंकुर फुट आया !! अब वो फल बीज बन के नन्हे पौधे में बदल गया !! फिर पेड़ बना और उसपे फल आये !! राहगीर आते रहे लेकिन वो अंगूर का फल कब गिरा कब बीज बना कब पौधा किसी को खबर भी न हुई !! बस कुछ लोगो को उसके लत्ते की छांव की आदत हो गयी !! ये पेड़ भी अजीब हैं न किसी से कुछ नहीं लेते सिर्फ देते ही हैं !! सायद यही कारन रहा इनके कटने का !! अगर कोइ चीज उपयोगी हो और गूंगी हो कोइ अपराध न बनता हो उसके हलाल का तो कटा ही जाएगा और परोस के सब मजे में खाएंगे !!
लेकिन इस अंगूर की पेड़ की माँ से इसकी कहानी थोड़ी अलग हैं !! इसके फल को एक बच्चा चुरा के अपने घर ले गया और भूल गया वही पीपल की पेड़ के निचे !! बेचारे अंगूर के बीज बिछड़ के अपने माँ से रोये थे लेकिन अब इनकी कौन सुनता हैं लोग इन्हे खाये या कुचले इनका जनम तो परोपकार के लिए हुआ हैं !! इनको खबर भी तो नहीं वक़्त बदल गया हैं !! अब परोपकार एक जुर्म हैं !! जिसमे सजा के तौर पर बाकायदा दुर्गति निश्चित होती हैं !! भगवन श्री राम ने दुर्गति की परिभासा बड़ी अच्छी दी हैं !!
की जब इंसान हार जाये, जब उसे त्याग दिया जाये, वो मौत की मांग करे और उसे वो भी न प्राप्त हो !! इस गति को दुर्गति कहते हैं !! इसलिए किसी कार्य की वजह से हार कासामना करना पड़े तो मौत की मांग मत करो !! वरना दुर्गति दरवाजे पर दस्तक देती हैं !! हारे हो ठीक हैं !! जो कुछ करता हैं वही हारता हैं !! तो ये एक तरह का अनुभव हुआ !! हार एक अनुभव हैं !! इस से सिख लेके आगे बढ़ाना हमारा कर्म हैं !! खैर मैं सपने में भी मुद्दे से भटक जाती हूँ !! अंगूर कुछ दिन वहाँ रहे !! वही पीपल के पेड़ के निचे फिर
उनपे भी वही धूल जमी जरा सी बूंदा - बांदी और एक और पौधा उग आया !! अब आप सोच रहे होंगे लड़के ने चोरी तो अंगूर के गुच्छे की कि थी फिर एक ही पौधा क्यों आया अधिक आने थे न !! दरहसल इनकी भी किस्मत वैसे ही होती हैं जैसे बारिस कि बूंदो कि अगर समुन्दर में गिरा तो खरा, नदी में गिरा तो मीठा, गंगा में गिरा तो पवित्र, और सिप में गिरा तो मोती !! पर इस बार के अंगूर कि लतो कि कहानी पिछले बार वाले से थोड़ी अलग हो गयी !! इस बार जो बच्चा अंगूर के गुच्छे चुरा के लाया था !! वो एक किसान का बेटा था !! तो ये अंगूर किसान के यहाँ पले- बढे !! इस बार ये लावारिस नहीं थे !! किसान बेचारे खुद को भूखा रख ले लेकिन अन्न का पेड़ इनके माँ के सामान ही होता हैं !! जिसे ये अपने खून से सोचते हैं !! वो बात अलग हैं कि आज कल खून भी बिका करते हैं !! किसान इन अंगूरों को देख के बड़ा खुस हुआ !! उसने सोचा कुछ खाने को रख लूँ कुछ को बेच के आता हूँ !! अचे दाम मिलेंगे तो इस अंगूरों के पेड़ के लिए जरा खाद आ जाएगी !! किसान बेचने गया और जमींदार के आदमी खरीद ले गए !! बड़ी मोल भाव हुई तब जाके सोना पीतल के भाव बिका !! आज कल यही होता हैं चमक हैं तो पीतल भी सोना और अगर नहीं तो सोना पित्तल जितना भी नहीं !! वक़्त बदल गया हैं !! रुपया बढ़ गया हैं !! विचार तो गिरेंगे ही कौड़ी के भाव !! पर ये जो अंगूर जमींदार के यहाँ गए इनके क्या कहने !! चाँदी के थाली में सजे !! पित्तल कि कुर्सी पर बैठे !! जमींदार के मुँह में गए !! जिसको इसने चंदन से धोया था कई मजबूरो का खून पी के!! जो बचे वो फेक दिए गए उसी के आँगन में !! एक फल फिर बीज बना और पौधा इस बार जमींदार के आँगन में !! देखने वालो कि भीड़ लगी हैं जब इसपे फल आये हैं !! कल जो अंगूर का पेड़ बगीचे में था उसे कोइ न देखता था !! अब देखो जमींदार के घर में सब देखते हैं !! जैसे गरीब का बेटा राजा ने गोद ले लिया हो !! चाहे स्वाद में खट्टा ही क्यों न हो पर मजाल हैं कोइ इसे खट्टा कह दे !! कल जब ये सोना था पित्तल के दाम बिका था !! और आज पित्तल हिरे कि दाम बिक रहा हैं !! कुछ तो उपहार भी भेजे गए हैं !! यहाँ के सेठ के वहाँ !! जमींदार से भी बड़ा सेठ हैं !! जमींदार तो सिर्फ मजबूरो के खून पिता था इसका तो महल ही लाशों पर खड़ा हैं !!ये लोग सफ़ेद कपड़ा पहन के रहते हैं !! अब जिसमे मानवता न हो !! भावना मर गयी हो !! वो लाश हैं और लाशे तो कफ़न में ही लिपटी रहती हैं !! ये सेठ बड़ा चालु निकला !! इसने ये अंगूर रखे ही नहीं तुरंत आम के आम गुठलियों के दाम बना लिए !! इसे एक राजनेता के यहाँ खातिरदारी में शामिल कर दिया !! ये राज सत्ता भी कमाल कि चीज हैं !! खुद कि लार चाँदी कि थाली में ऐसे परोसी जाती हैं जैसे पसीने बहा के गंगा में लपेट के सौगात भेजा हो !! ये राजनेता भी कम नहीं हैं !! इसने अपना चुनाव चिन्ह ही अंगूर के फल बना लिया !! बोला भाईयो और बहनो हमें ये हमारे दोस्त ने भेजा था !! लेकिन हमने इसे खाया नहीं बल्कि देश के कल्याण के लिए लगाया !! आपके कल्याण के लिए लगाया !! और मेरे प्यारे देश वासियो इसे हर शहर में लगाया जायेगा !! हर मुहल्ले में भेजा जायेगा !! जाती क्या हैं ??!! इसकी खबर नहीं !! बस वही पता चल जाये तो हम इसका सदुपयोग करे !! ये उपकारी हैं परोपकारी हैं !! लेकिन कुल जान लेना उचित हैं !! अब गन्ने कि खेत में ऊगा होगा तो हमारे लिए हानिकारक होगा !! क्यूंकि उसे खाने से हमें मधुमेह कि बीमारी हो सकती हैं
!! अगर करेले के बिच ऊगा होगा तो कड़वा होगा !! हम इसे भी आपको नहीं दे सकते क्यों कि ये आपकी जुबान को कड़वा बना देगा !! और अगर निम्बू के बिच ऊगा होगा तो खट्टा होगा हम और भी इसे आपको नहीं दे सकते !! क्युकी ये खट्टा होगा तो आपके दाँत ख़राब करेगा !! तभी एक खादिम राजनेता से बोला मालिक ये तो तीनो से होकर आया हैं !! पिछले का पिछले अंगूर गन्ने के खेत में ऊगा था !! बिच वाला करेले के और उसके बाद वाला निम्बू के और तो और मालिक जो आपके हाथ में हैं मालिक वो तो हरी मिर्च के बिच ऊगा हैं !! इसपर राजनेता फुट - फुट कर रोने लगा और कहा दोस्तों , मैं इसे खुद खाऊंगा इसे किसी को न न दूंगा !! मैं आप लोगो के लिए सारे जहर खाने को त्यार हूँ !! और इस तरह वो राज नेता सारे अंगूर वही खा गया !! अब न फल रहे न बीज उगे !! और भासन सुन ने वाले वो मजबूर ख़ाली पेट फिर से घर को लौट गए !! अब ख़ाली पेट किसको नींद आती हैं तो मेरा भी सपना टूट गया !! जहाँ देश टूट जाये तो सपने तो टूट ही जाया करते हैं !!
प्रिया मिश्रा !!
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