आड़ी - टेढ़ी रेखाएँ खींचते हुए जब मैं मात्रा सीखते गयी तब मैं धीरे - धीरे मातृभासा में बदलती गयी || जब शब्दों के बवंडर में गोते लगाए कुछ अनकहे जज्बात निकले कुछ अधूरी कहानिया निकली जब मैं सबको एक माला में पिरोती गयी मैं लिखने लगी धरती और आसमान को और वो कविता बनती गयी || प्रिया मिश्रा :)
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Showing posts from July, 2020
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मैं कभी कह ना पाया की तुम कैसे हो आज कहना चाहता हूँ जैसे सुबह की चाय और रोज की खबरे होती है मेरे लिए, तुम तुम वैसी हो, फर्क बस इतना है तुम चाय सी मीठी और एक अच्छी काल्पनिक खबरों की तरह झूठी हो || तुम सुबह के खिली धुप और दोपहर में सुना आसमान सा हो तुम पीतल दिखाती हो खुद को लेकिन तुम बिलकुल खरा सोना सा हो || तुम मेरे सुबह की नास्ते की तरह जिससे मैं लेके, ऊर्जावान महसूस करता हूँ तुम मेरी दोपहर की रोटी हो जिसमे घुल जाती है चासनी वाली मीठी चटनी जब तुम मुस्कुराती हो और तीखा सा लगता है वो सरसो का साग जब तुम आँखे दिखाती हो तुम मेरे लिए थोड़ी खट्टी , थोड़ी मीठी थोड़ी तीखी भी हो || तुम शाम में आती राहत की तरह हो तुम ग्रीष्म की छुटियों की तरह हो तुम मेरे लिए सावन की हरी चूड़ियां तुम बारिश में भींगता मौसम तुम जेठ की कड़ी दोपहरी में रात की सीतलता का इन्तजार हो तुम एक ही हो जिस में बस्ता मेरा पूरा संसार हो मैं नहीं लगाना चाहता फेरे दुनिया के आओ तुम्हारे सात फेरे फिर से लगा लूँ मेरे बिश्व भ्रमण पूरा हो || प्रिया मिश्रा :)
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मुझे रात की तरह ढलना नहीं आता मैं सुबह की तरह खील ही जाती हूँ मैं चाँद की तरह खूबसूरत नहीं जिसपे कई शायरों ने शायरी लिखी है मैं सुबह की मीठी धुप हूँ जिसपे कवी कविता लिखते है || प्रिया मिश्रा :) ** बजाये गए है ढोल की आबादी बढ़ गयी है किसी ने ये खबर ना जानी की , किसान कंगाल हो गया गावँ बदहाल हो गया तभी तो शहरो का ये हाल हो गया लोग नहीं बढे है लोग खुले आसमान से निकल कर एक कमरे में बंद हो गए है कमरा छोटा है सोच छोटी करते जा रहा है || प्रिया मिश्रा :) ** आदमी "आदमी " से बचने के लिए राक्षस होते जा रहा है इसलिए समाज परिवर्तित होते जा रहा है | रहेगा ना पानी तो खून पी जायेंगे ये अपने बगल वाले बचाने कभी ना आयंगे बचना है तो जंगल के टेढ़े पेड़ हो जाओ नहीं बचना है तो जंगल ढूंढ रहा है सीधे पेड़ो को साफ़ पानी को और हवा की सुगंध को प्रिया मिश्रा :) ** तेरे पैरो के महावर का लाल रंग मेरा उगता हुआ सूर्य है, सुबह का || प्रिया मिश्रा :)
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मित्र सुबह की तरह होते है उनके होने से सब कुछ नया सा लगता है उदासिया हमें छू भी नहीं पाती वो हमारे लिए उगता हुआ सूर्य है मेरा एक मित्र खो गया है कही भीड़ में मेरा सूरज भी ढल गया है कही समंदर के नीर में सोचती हूँ नाप लूँ समंदर को लेकिन कौन से समंदर को नाप लू वो सबमे खोया है थोड़ा - थोड़ा || प्रिया मिश्रा :)
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ये तुम्हारा इश्क मुझे ले डूबता लेकिन मैंने बना ली नईया तुम्हारे नाम की || प्रिया मिश्रा :) ** भगवान् ने इंसानियत के चार भाग किये पहला भाग जानवरो को गया दूसरा परिंदो को तीसरा पेड़ ले गए चौथा जल को गया इंसान पीछे खड़ा था वो खाली हाथ ही रह गया || प्रिया मिश्रा ** मैं रात भर जग के तुम्हारा नाम लूँ इससे अच्छा है, मैं नींद से धनवान रहूं प्रिया मिश्रा **
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मैं किसी भी सवाल का उत्तर ढूँढू प्रिया मिश्रा :) _____________________________________________________________________________________ मैं लिखते - लिखते थक गयी थी शब्द मुझे समझ ना पाए थे ये कहानी थी मेरी जो इतिहास बननी थी लेकिन बूंदा - बांदी हूँ वक़्त की और मेरे शब्द ठहर ना पाए थे || अब फिर से लिख रही हूँ एक नई कहानी एक नया कुछ एक नई आत्मा एक नई मैं || प्रिया मिश्रा :) _____________________________________________________________________________________ जो हमारे लिए आवाज नहीं उठा सकता वो हमारे लिए कोइ कदम कैसे ले सकता है जो एक कदम भी नहीं बढ़ा सकता हमारे लिए वो कैसे तय करेगा , हमारी दुरी को तो क्या प्रतीक्षा एक प्रश्न नहीं रह जायेगा वहाँ जहाँ उत्तर निढाल पड़ा है || प्रिया मिश्रा --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- हर व्यक्ति को अपनी भूल सुधारने की सिर्फ एक ही युक्ति सूझती है , भूल को भूल समझ के भूल जाओ प्रिया मिश्रा :) ------------------------...
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मैं स्वप्न देखती हूँ और आँखों की अलसाई नींद से उठ के फिर से देखती हूँ, एक जिवंत स्वप्न || किसी मुशाफिर से कभी न पूछना वो कहा को चला है , बस उसके जूते में पैर डालना , एड़ियां अगर जमीं को छू जाये तुम्हारी तो समझ लेना उसने बड़ा लम्बा सफर तय किया है || प्रिया मिश्रा :) मुझे ढूंढ़ने की कोसिस तुम्हारी हमेसा अधूरी रहेगी ये मेरा श्राप है हर अधूरी कोसिस को और हर अधूरे आदमी को जो छुप के रहता है और अधूरे वादे करता है प्रिया मिश्रा :) _________________________________________________________________________________ वो रात भर का जलता दिया सुबह की रौशनी में ग़ुम जायेगा संभाल लो अभी वक़्त है , क्युकी सूरज फिर शाम ढल जायेगा || प्रिया मिश्रा :)
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गावँ के अपने मजे होते है वहाँ शादगी इतनी होती है की सामने वाला आपके कुर्ते, पे लगे कीचड़ को देख के सामने ही हँस उठता है वो कोइ और जरिया ढूँढता आपके ऊपर खीचड़ उछालने का || प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________________ मैं सुबह की रौशनी में शाम नहीं ढूंढ़ती मैं मनुष्य को मनुष्य ही समझती हूँ मैं कभी उनमे भगवान् नहीं ढूंढ़ती मुझे पता है की वो भी नहीं जानता अपनी कमियों अपनी खूबियों को मैं एक नफरत भरे सहर में शांति का बागबान नहीं ढूंढ़ती वो भी तो नहीं ढूंढ़ते , शांति सुख और एक सीधा सुझला हुआ समाज और मैं भी नहीं ढूंढ़ती अब , बादलो में चाँद वो कल की बात थी अब मैं, आज में आज भी नहीं ढूंढ़ती || प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________ इश्क एक मसला है इसे अमन का तमगा ना दे वरना एक तिश्नगी रह जाएगी और उम्र जाया हो जाएगी लफ़्जो के मायने बदल जायँगे और कायनात का खुदा भी नहीं पिघलेगा || प्रिया मिश्रा :) ______________...
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मैं दूर से जिसे देख के लौट आई हूँ बहोत पहले वो घना जंगल अब भी है मेरे पीछे हैं ऐसे, जैसे कोइ दानव हो घने बालो वाला अब क्या करूँ सपने भी तो नहीं देखे ते ऐसे , जैसे जिंदगी कट रही है तेरे बिना और तुझसे होकर भी प्रिया मिश्रा :) *********************************************************************************** पुरषों की तुलना में महिलाये कम रोती है क्युकी पुरुष रोते नहीं शिशकीया लेते है वो भी सन्नाटे वाली | इनकी यही शून्यता इन्हे जीने नहीं देती है और मरते भी नहीं इन्होने ओढ़ रखा है एक भ्रम की पुरुष रोते नहीं इन्हे हक़ नहीं मांगने का ये बस देना जानते है बचपन से पच्चपन तक ये नहीं बटोर सकते खिलौने अपनी बहनो की तरह क्युकी इनके हाथ में है जिम्मेदारियों का एक गुड्डा , जो कभी हस्ता नहीं दिल खोल के रोता नहीं दिल खोल के वो देखता रहता है अपनी नीली आँखों से की कैसे दबता है जब वो बोझ तले तो एक आवाज आती है शिशकीयों की वो रुदन नहीं है उसे रुदन कह के अपमानित मत करना पुरुष ने रख दिया निकाल के अपना कलेजा, घर के छत पर इसलिए अब घर में ...
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मैं सोना चाहती हूँ गोद में माँ के एक ही करवट और निहारना चाहती हूँ उसका आँचल उसकी लोरियाँ सुनना चाहती हूँ और खो जाना चाहती हूँ उसी दुनिया में और लेना चाहती हूँ एक अंतिम साँस क्या ये सब एक साथ संभव है प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************ तुम लिखना चाहो मेरे जीवन पे कोइ कहानी तो लिख लेना लेकिन उसे इतिहास बनाओगे , हम क़तई बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे क्युकी , जैसे तुम्हारी थाली में तुम्हे भिंडी अच्छी लगती है वैसे ही अच्छे लगते हो तुम , मुझे मेरे जीवन में || प्रिया मिश्रा :) *********************************************************************************** वो शख्स हमेसा याद आता है जिसे हम कभी याद नहीं आते अजीब हैं ना लेकिन हकीकत है छुटकारा कैसे मिलेगा आत्मदाह या आत्मा समर्पण || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************* जब तुम नहीं देख पाये की मैं कौन हूँ मुझे कैसे दिखेगा की तुम कौन हो तुमने खुद ही लपेट रखा है एक आवरण झूट का और कह...
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भूखे के भी अपने कायदे कानून है लेकिन सायद वो सिमट के रह गयी है रोटी की गोल सी मानचित्र में उसने राष्ट्र का आकार नहीं लिया वो शहरो के आकार में भी नहीं ढला वो सिमित रह गया एक रोटी के आकार में वो नहीं ढल पाया सदाचार में वो बस ढूंढता रहा एक अन्न का आसन और अन्न का ही ओढ़ना अन्न का घर और अन्न का ही स्वपन्न बस इसी कायदे कानून में वो सिमट गया जो उसके भूखे पेट ने बनाये और उस तक ही सिमट के रह गए जैसे सिमटती जा रही है पृथ्वी , मानवता के अभाव में || प्रिया मिश्रा :)
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कुरुक्षेत्र ( एक इतिहास ) बचपन से ही पांडवो ने झेला था एक श्राप लेकिन एक वरदान भी मिला था केशव का साथ दुर्योधन की मूर्खता और शकुनि की निति या कहे भाग्य की अनीति सब था पांडवो के मार्ग में एक पर्वत की तरह झेल रही थी कुंती भी अपनी करनी का एक श्राप कर प्रसन्न जो सूर्य देव को मांग लिया वरदान तनिक भी बिश्वाश नहीं था उसे , जो मिला था उसे वरदान प्रसन्न सूर्यदेव ने दे दिया एक पुत्र बड़ा होकर वो बना दुर्भाग्य वस सूतपुत्र लेकिन कहाँ सूर्य का तेज वो बालक छुपा पाया था जो आगे चलकर कर्ण कहलाया था ललकारा था उसने अर्जुन को भरी सभा में तब द्रोण आगे आये थे जैसे ठगा था उन्होंने एकलव्य को वही वाणी लाये थे अर्जुन उनका शिस्य था उन्हें पता था एक म्यान में दो तलवार नहीं ठहरते एक युग में दो अर्जुन नहीं सवरते | तब बढ़ के आगे दुर्योधन आया वो नहीं सुयो...
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प्रकृति की इस सुंदर चित्रण को देख के मन में प्रश्न उठ आया है ये जो माला गुँथी गयी है और ये जो मँडप सजा है इसको क्या समझू मैं क्या ये संकेत है फिर से मिलने का प्रकृति और विष्णु का या फिर कोइ मोहक कल्पना जो कल्पना से भी परे है || क्या समझूँ मैं की ये शिव की कोइ मोहक छबि है श्रावण का त्वोहार है ये फिर शिवा के गले का हार है जो उपहार है प्रकृति का शिवा को शिव को उनके प्रेम को और संकेत है की हे विष्णु अभी प्रेम बाकि है मुझमे चाहे मैं गुजरी जिन परिस्थितयों से न मेरा प्रेम मरा नाही मेरा ममत्वा प्रिया मिश्रा :)
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जिंदगी ( एक और मौका ) प्रियांश : आपसे मिल के बहोत खुसी हुई क्या हम फिर कभी मिल सकते है अंकिता : हाँ कभी किश्मत ने मिलाना चाहा तो जरूर मिल सकेंगे | प्रियांश : आप किस्मत पे बिश्वाश रखती है अंकिता : हां क्यों नहीं ? आप नहीं रखते ? प्रियांश : नहीं मैं नहीं रखता अंकिता : क्यों ? प्रियांश : यु ही | अंकिता : अच्छा अब चलती हूँ | प्रियांश : आपने बताया नहीं फिर मिल सकते है या नहीं ? अंकिता : कहा तो किश्मत में हुआ तो जरूर मिलेंगे | अभ...
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प्रेम प्रेम एक खाल है जब खाल उतर जाता है लोग मांस को पका के खा जाते है प्रेम भूक की बलि चढ़ जाता है || प्रेम परिस्थियों का गुलाम है जब परिस्थितियाँ बदल जाती है प्रेम बदल जाता है और वो समय की बलि चढ़ जाता है || प्रेम सुंदरता का भी गुलाम है एक चेहरे में अगर शाम हो जाये वो दूसरे चेहरे में सुबह ढूंढ लेता है इस तरह वो शाम - सुबह में डूब जाता है || प्रेम शब्दों का भी मान नहीं रखता वो बदलता रहता है अपने शब्द और कहानी बदलती रहती है पीढ़ी दर पीढ़ी वो आधीन है , पराजित है उनसे जिन्हे शब्दों को बदलना आता है || प्रेम कोइ पूजा करने की देवी नहीं ना ही देवता है वो तो एक तिरस्कार है उसे तिरस्कृत ही होना चाहिए क्युकी आने वाले समय में वो एक श्राप है || प्रिया मिश्रा :)
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एक आदमी मरते वक़्त कितना मर जाता है पूरा नहीं मरता है शायद वह रह जाता है अपने बाग़ - बगीचों में अपने झूठे किये हुए बर्तनो में उसके कमरे में एक खुसबू की तरह किसी के दिल में यादों की तरह वो तस्बीरों में रह जाता है रंगो की तरह एक आदमी जो मर गया है वो नहीं मारा है उसके छाप है हर जगह उसकी उँगलियों ने जो छुए है जो स्पर्श है वो याद है उसे , जिसे उसने छुआ था एक पेड़ में वो रह गया है बीज की तरह एक आदमी मर के भी नहीं मारा वो रह गया है कही किसी कोने में खामोसी की तरह वो गुनगुना रहा है अपनी खामोसी किसी के कान में वो गुजरा नहीं है वो रह गया है वो बस गया है उन लोगो में जो जीवन को जी रहे है वो भी जिन्दा है कही न कही किसी में किसी के ह्रदय के कोने में और देख रहा है अपना भविस्य अपना कल और आज वो जिन्दा है और जिन्दा ही रहेगा जो कल मर गया है प्रिया मिश्रा :)
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कभी - कभी रातो को नींद नहीं आती स्वप्न करवट लेने लगते है प्रिया मिश्रा :) _____________________________________________________________________________________ हजारो इक्षाओं में एक ईक्षा और ईक्षा में हजारो पल हजारो पलों में एक मैं एक मेरी खुद की कहानी बुनने की ईक्षा और उस कहानी में एक सपनो का महल और उस सपनो के महल में एक सपनो की अलमारी उस अलमारी में मेरी डायरी उस डायरी में मेरे सपने मेरे सपनो में एक सुबह उस सुबह में सब कुछ रंगीन बिलकुल इंद्रधनुष की तरह उस इंद्रधनुष में एकता उस एकता में सब अपने सबके सपने अपने सबकी थाली में रोटी और सबके हाथ में कलम सबके होठो पे मुस्कान और मेरी कहानी में मेरा प्यारा हिन्दुस्तान || प्रिया मिश्रा :)
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सब मिथ्या है , सब राख है शमशान में जाके सारा अभिमान धूल जाता है जब राख ही राख नजर आता है || मिटटी के शरीर को मिटटी में मिल जाना है फिर ये साभिमान अभिमान कहाँ काम आना है हो सकता है कल की सुबह सूर्य उगे लेकिन मैं ना रहूं तो बस इतना याद रखना जिंदगी आगे बहोत है जब तक है कुछ अच्छा करना और मुस्कुराते जाना क्युकी आखिर में सबको अपने कर्म से ही लुभा पावोगे न कुछ लेके आये ना कुछ लेके जाओगे क्युकी , बाकि सब सब मिथ्या है और सब राख है तो मुस्कुराओ और किसी की मुस्कुराने की वजह बन जाओ यही जिंदगी है बाकि सब मिथ्या है और राख है और सत्य सिर्फ एक है अग्नि और उससे निकलती हुई लपटे और खोता हुआ शरीर और मुक्त होती आत्मा बाकि सब मिथ्या है राख है || प्रिया मिश्रा :)
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स्वप्न (भाग १ ) अच्छा सुनो ये अकेले में बैठ के पानी में पत्थर मारने का क्या फायदा | क्या सोचते रहते हो इतना ? कुछ नहीं | कुछ नहीं में लोग पत्थर नहीं मारते | तो क्या करते है ? वो तो पता नहीं लेकिन तुम्हारी तरह झूट भी तो नहीं बोलते | मैंने क्या झूट बोला ? सच भी तो नहीं बोला | तुम जानते तो हो तुम खुद को मुझसे नहीं छुपा सकते | फिर ये स्वांग क्यों ? क्या स्वांग ? क्या पागलो जैसे बातें करती रहती हो ? हां पागल तो हूँ , लेकिन इतनी भी नहीं की पढ़ ना सकू | क्या पढ़ न सकूँ ? आज भांग खाया है क्या ? नहीं बस , लेकिन नशा तो है | अच्छा किसका ? गुलाबी रंग का | कौन सी गुलाबी रंग का ? वहीँ जो सदियों से हवाओँ में थी | लेकिन महसूस ना कर पाई कभी | अच्छा कवित्री होती जा रही हो | हाँ सच कहा तुमने, शब्द चुनने लगी हूँ, जबसे तुमसे मिली हूँ | क्यों उस से पहले ज्ञान ना था, आपको मोहतरमा ? ज्ञान तो बहोत था लेकिन उनमे प्रकाश नहीं था | वो अच्छा , आज सारा श्रेय मुझे क्यों ? क्या बात है मुर्गा हलाल करने का इरादा है ? नहीं मुर्गे को दाना डाल रही हूँ ,सायद फंस जाय...
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मैं हूँ निहारती हूँ मैं अब भी तुम्हारी दो आँखे जिसमे सिर्फ तुम्हारा प्रेम दीखता था बदल गया है कितना फीका सा हो गया जिसमे पहले इंद्रधनुष दीखता था अब वो सफ़ेद हो गया है क्या बात है ? क्या लौटा दिया तुमने वो सारा प्रेम जो मैंने तुमको दिया था या सबकुछ समेट लिया खुद में ही की अब तुम्हारा मन भी कुछ काला - काला दीखता है || अच्छा सुनो मन मैला मत करो सिर्फ शिकायते नहीं करुँगी तुमसे एक वादा भी करुँगी जब तुम्हारा मन उदाश हो और लगे की अब तुम अकेले हो तो मैं रहूंगी तुम्हारे साथ और चलूंगी फिर से जब तक तुम्हे कोइ और नहीं मिल जाता मैं हूँ तुम चिंता ना करो मैं ले लुंगी तुमसे तुम्हारा बिष का प्याला और रख दूंगी अपना जीवन का मधुर स्वर | तुम जब चाहे ले लेना मेरी जीवन की सारी कल्पना और सजा लेना अपना घर मैं तुम्हारे साथ हूँ जब तक तुम्हे कोइ और नहीं मिल जाता मैं हूँ चुनने के लिए तुम्हारे राह के पत्थर और रेत में लाने के लिए समुन्द्र तुम्हे चिंता किस बात की मैं हूँ , भर दूंगी तुम्हारा जीवन फिर से रंगो से , और इस बार नहीं पूछूँगी की वो रंग कहाँ गए क्यों ...
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सुनो द्रोपदी सुनो द्रोपदी अब तुम ना श्रृंगार करो रहने दो चूरामणि लो खड़ग, अब पापियों का संघार करो || कब तक यु ही सभा के बोलने का इन्तजार होगा ?? कब तक द्रोपदी तुम्हारा अपमान होगा ?? कभी तो सवाल उठाना होगा कब तक जवाब का इन्तजार होगा ?? मैं तो कहता हूँ रहने दो कृष्ण को तुम ही अब उद्धार करो सुनो द्रोपदी अब तुम ना श्रृंगार करो || अब रहने दो ये नौलखा हार मुंडमाला का अब समय आ गया उठावो खडग और पापियों का संघार करो सुनो द्रोपदी अब तुम मत श्रृंगार करो || अँधा राजा अंधी प्रजा जुआ खेल स्त्री हार अब कैसा मेल और कैसे संधी अब उठा लो जंजीर बना लो बंदी अब न केशव का इन्तजार करो अब प्रहार का वक़्त है मिथ्या बातों में न वक़्त बर्बाद करो सुनो द्रोपदी अब तुम मत श्रृंगार करो उठावो खड़ग और पापियों का संघार करो || प्रिया मिश्रा :)
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१०० साल जीवन के १०० साल जीवन के कुछ ऐसे हो पहले साल माँ के नाम दूसरा साल पापा के नाम २५ साल में पहुंच चुके चलो अब करते है कुछ काम अब तक का जीवन भी माँ - पापा के नाम || अब माँ कहती बेटी क्या करेगी ?? मैं कहती माँ अब तक जो आप से सीखा उसे अपने जीवन में लाऊंगी जरुरत है अभी सबको ममता की मैं बहोत ना सही थोड़ा ममत्व बाँट आउंगी || इस तरह से आगे का जीवन भी माँ - पापा के नाम || पापा कहते और क्या दोगी मेरे संस्कारो का योगदान ?? मैं कहती पापा आपसे ही तो सीखा दुःख में आखों में शून्यता लाकर मुस्कुराना | आपसे ही तो सीखा हस्ते - हस्ते सब जहर पी जाना आपको देखा है मैंने कई बार अकेले में सोचते हुए , की कल मैं आराम कर लूंगा आपको देखा है कहते हुए माँ से तुम सो जाओ तुम्हारे सपनो के लिए जागूँगा अपने बच्चो के सपनो के लिए मैं जागूँगा | तो पापा मेरी आगे की नींद आपके नाम इस तरह मेरा आगे का जीवन भी माँ - पापा के नाम || जो कुछ बच जायेगा अगर कोइ गलती हुई हो तो उसके माफ़ी में गुजार देंगे हम मरते वक़्त तक भी आप नहीं बन सकते इसलिए आगे का जन्म भी आप...
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फ़रिश्ते इंसान नहीं बन सकते पशु इंसान नहीं बन सकते लेकिन इंसान को ये दोनों ही वरदान प्राप्त है इंसान फरिश्ता भी बन सकता है और पशु भी सोच इंसान की है चुनाव इंसान का है || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************* कभी - कभी मैं इतना लिखती हूँ की मैं भूल जाती हूँ की मैं मनुस्य हूँ मैं लेखनी का जीवन जीने लगती हूँ और फिर निब टूट जाती है तब ख्याल आता है कागज रगड़ खा रहा है और स्याही ख़तम हो गयी है शाम होने वाली है और एक दिन निकल गया है फिर से , प्रेम में कविता के प्रेम में || प्रिया मिश्रा :) *********************************************************************************** जब कभी उदाश होना तो वहाँ जरूर देखना जहाँ तुम कुछ कर सकते थे लेकिन तुमने कुछ ना किया क्युकी तुम मन से हारे थे शरीर अभी भी जिन्दा था और जीत सकता था || प्रिया मिश्रा :)
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वो चेहरे से खूबसूरत नहीं है लेकिन उसकी दो खूबसूरत हाथ हमेसा त्यार रहते है किसी की खुसी के लिए प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************** उसका आना और जाना दोनों नियति के हाथ में थे मेरे हाथ में सिर्फ इन्तजार था और ये मेरे लिए एक रोजगार था रोजगार भी ऐसा जिसमे गुजारा भत्ता कुछ नहीं बस आँखों में सपनो की कमाई थी और आँगन में उसके लगाए कुछ फूलो की महक || प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________________ मैं जिस सुबह तुमसे न मिलूं समझना मेरी रात गुजर गयी अब सबेरा एक नया होगा वहां मिलेंगे सुबह की खिली धुप बनकर || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ वादे न किया करो निभाए नहीं जाते तो किसी का भरोसा टूट जायेगा तुम्हारा कुछ न जायेगा उस से उसका खुदा रूठ जायेगा || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ मैं एक सत्य के प...
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कुछ लड़किया बहोत दुखी थी की वो सुंदर क्यों नहीं है | उन्हें शिकायत थी की उनमे वो चंचलता क्यों नहीं है | लेकिन जब उन्होंने प्रकृति सुंदरता को दिन - दिन मरते देखा , उसकी चंचलता को निरश्ता में बदलते देखा | तो वो लड़किया अब सुंदर होना अभिशाप मानती है || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************ आदमी सहजता से उठा लेता है हर बोझ अपने कंधे पर औरत सहजता से उस बोझ को छुपा लेती अपने आँचल में जो आदमी उठा के थक जाता है अपने कंधे पर प्रिया मिश्रा :) *********************************************************************************** मैं सभ्य ना हुआ स्वभाव था मेरा डसना मुझे प्रकृति ने बनाया ऐसा फिर भी मैं कारन से डंसु छोड़ो मानस मेरी कहानी तुम्हारी प्रविर्ती ऐसी ना थी तुम तो सौम्य जन्मे फिर कहाँ से तुमने बिष का गहना पहना बताओ मनुष्य तुमने कहा से सीखा डँसना प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** नैनो में सपने बसे प्...
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मैं तुमसे अलग होके भी अलग नहीं हूँ तुम काशी जैसे मैं गंगाजल जैसी दोनों शिव को प्रिय है इसलिए तुम महादेव भक्त हो मैं महादेवी भक्त हूँ || प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________________ कलम का कोइ दायरा नहीं होता कागज छोटी पड़ जाती है और लेखनी चलती जाती है शब्द बिछते जाते है कहानी बनती जाती है लेकिन शालीनता फिर भी रहती है क्युकी कलम का कोइ दायरा नहीं होता कलम का उत्तरदायित्व होता है || प्रिया मिश्रा :) ____________________________________________________________________________________ एक कवित्री ने भगवान् से प्राथना की प्रभु मुझे कोइ ऐसा साथी देना जो मेरी लेखनी को सराहे ना सराहे कोइ बात नहीं | बस मेरे बिन बोले मेरे लिए कागज़ -कलम लाता रहे || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________
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हम दरवाजे तक गए लेकिन वापस आ गए दरवाज खुला ना था और कोइ बात नहीं थी बस पुरानी जंजीरो में जंग लग गया था || हमने पौधों को पानी नहीं दिया पानी बून्द - बून्द सुख गयी और कोइ बात नहीं थी वक़्त गुजर गया था पौधा पानी का प्रेम ताकता प्यासा सुख गया था || हमने कई दिनों से अपनों से बात नहीं की कही ऐसा न हो वो पौधा भी सुख जाये ना पानी मांगे ना जंग ही छूट पाए और रिश्तो का पौधा सूखता चला जाये || प्रिया मिश्रा :)
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मैं अक्सर चाय पे गंभीर चर्चाये करती हूँ ताकि बातो की गंभीरता चाय की मिठास में घुल जाये और रिस्तो में कोइ कड़वाहट न आये || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ मुस्कुराइए भी इतनी क्या महंगाई आ गयी की, आपकी चार आने की मुस्कान महंगी हो गयी || प्रिया मिश्रा :) ____________________________________________________________________________________ खामोसी दबे पाँव आती है फिर जीवन भर शोर करती है सन्नाटे का शोर || प्रिया मिश्रा :) ________________________________________________________________________________ प्रेम समर्पण मांगता है और परिस्थितिया दान दोनों के साथ कैसे दे प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________________ जिज्ञासा प्रश्न की जननी है प्रश्न उत्तर का जनक || प्रिया मिश्रा :)
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जितने वक़्त हम पुराने शब्दों की उधेड़ - बुन में गवा देते है उतने वक़्त में एक नया वक़्त लिखा जा सकता है || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ मैंने अपने कुछ ही कविताओ में प्रेम को दर्शाया है बाकी की कविताये खुद ही ढूंढ लेती है प्रेम को || प्रिया मिश्रा :) ________________________________________________________________________________ मैंने अपने कुछ ही कविताओ में प्रेम को दर्शाया है बाकी की कविताये खुद ही ढूंढ लेती है प्रेम को || प्रिया मिश्रा :) _________________________________________________________________________________ मेरे शब्द मेरी साँसें मेरी आत्मा है और मैं हूँ मुझे जानना है तो मेरी कविता पढ़ लो || प्रिया मिश्रा :) _________________________________________________________________________________- इश्क रूठा हुआ है और बारिश मजे ले रही है ||| प्रिया मिश्रा :) _________________________________________________________________________________ वो लोग हमें हर पल याद आते रहते है जो हमें...
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एक मैंने कहा इसलिए तुम मुस्कुरा दो ये कोइ वजह नहीं मुस्कुराने की || प्रिया मिश्रा :) ____________________________________________________________________________________ जिंदगी जीने की वजह ढूंढ़ते -ढूंढ़ते मौत के करीब आ गए तब एहसास हुआ जरा सा मुस्कुराना ही तो था || प्रिया मिश्रा :) _________________________________________________________________________________- कोइ भी व्यक्ति तब विद्रोही घोसित किया जाता है जब उसकी बात में सचाई हो और वो उसे प्रकट करना जानता हो || प्रिया मिश्रा :) ____________________________________________________________________________________ कोइ भी व्यक्ति तब विद्रोही घोसित किया जाता है जब उसकी बात में सचाई हो और वो उसे प्रकट करना जानता हो || प्रिया मिश्रा :) _____________________________________________________________________________________ मैं अपने जीवन के आनंद के आँगन के सारे पुष्प तुम्हे सौपती हूँ लेकिन एक वचन दो इन्हे रौंदोगे नहीं प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________...
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हम चुप रह जाते है तभी अत्याचारी बढ़ जाते है || प्रिया मिश्रा ________________________________________________________________________________ नया - नया हो तो अच्छा लगता है पुराना हो तो बोझ सा हो जाता है पीठ दिखा के चले जाते है जो ह्रदय की पीड़ा भी नहीं समझ पाते है बड़ा कमीना है ये इश्क अच्छे भले इंसान को आवारा बना के छोड़ जाता है || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ ये जी हजूरी करने वाले एक दिन हुजूर बन के बैठ जाते है इन्हे सिर्फ तमाशा चाहिए और एक नायिका जो दिखाए तमाशा इनके भूके आँखों को प्रिया मिश्रा :)
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राजनीति अर्थात राज करने की नीति क्यों न हम खुद को संभालना सिख ले अपने कर्तब्यो को पहचान ले अपनी कमजोरियों को मजबूती में ढाल ले क्यों न हम सब मिलकर इस नीति को ही मिटा दे ना कोइ राजा हो न कोइ प्रजा और ना हो ये खोखली राजनीति प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________________ मैं कोइ अमीरी की बात नहीं कहूँगी मैं कोइ गरीबी की बात भी नहीं कहूँगी मैं आदमी और औरत के फर्क की बात नहीं करुँगी मैं मानवता और समानता की बात करुँगी क्या ये संभव है या बदल दे चर्चा और फिर से बात उठाये वही गरीबी और असमानता की अगर समस्याओ पर ही चर्चा होगा तो समाधान पर कब होगा प्रिया मिश्रा :) _____________________________________________________________________________ जितने वाले की एक कहानी होती है हारने वाले का कोरा कागज || प्रिया मिश्रा :) ___________________________________________________________________________________ तू रह ले मशरुफ़ हम तुझसे फुर्शत वाला इश्क निभाएंगे लेकिन जब हम मशरूफ़ हो जायेंगे तुझे बहोत याद आ...
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हम आसूँ बहाएंगे तो कोइ कन्धा चाहिए होगा तो चलो आज आँखों में काजल भर ले अब बस चेहरे पे पूर्णिमा और आँखों में अमावश होगा ना सावन होगा न वर्षा होगी ना इंद्रधनुष की कोइ चाहत होगी || प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ मुझे तुमसे कोइ फ़िल्मी हीरो वाला इश्क नहीं है प्रेम करता हूँ प्रेम निभाता हूँ कुछ नहीं कह पाता गुलजार की गज़लों की तरह लेकिन कृष्णा की तरह तुम्हे और सिर्फ तुम्हे ही अपनी रुक्मणि मानता हूँ प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* मैं अपने भाई को देखती हूँ और सोचती हूँ ये कितना बड़ा हो गया है अपनी सारी जिम्मेदारियाँ समझने लगा है ये उम्र में मुझसे छोटा है लेकिन विदा हो गया है इसका ससुराल शहर की वो भाग - दौड़ है और ये घूमता हुआ इधर - उधर सा एक सिपाही जो तत्पर है रक्षा हेतु अपनी कर्मभूमि की अपनी धर्मभूमि की जो इसका आँगन है एक भारतभूमि का छोटा और बहोत छोटा भूभाग लेकिन बड़ा है उसके लिए जो बच्चा अब बड़ा हो गया है || प्रि...
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चाँद एक रोज मेरे आँगन में उतरा वो जरा उदास सा था शायद वो अगले दिन फिर निकलना चाहता था लेकिन अगले दिन अमावश थी अब क्या करे हमारी इक्षा हर बार पूरी नहीं होती लेकिन चाँद को ये खबर ना थी वो अब भी उदाश था और ताक रहा था आसमान को की शायद अमावश पूर्णिमा में बदल जाये और चाँद फिर से जगमगाये || प्रिया मिश्रा :) ****************************************************************************** जिनके थाली में रोटी है वो कहाँ समझ पाएंगे की रोटी कितनी महंगी है उन्हें तो बस इतना पता है ना खुद खाएंगे ना किसी को खाने देंगे || प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************** कोइ हाथ मिलाये तो उसे गले लगा लेने बुराई नहीं है शर्त बस इतनी हो उसके हाथ में नाख़ून न हो और बातो में मिठास न हो || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************* आज कुछ लिखने का जी नहीं करता चलो रहने देते है शब्दों को यु ही क्या जाया करना || प्रिया मिश्रा :)
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मैंने एक तरफ़ा प्रेम देखा मैंने दोतरफ़ा प्रेम भी देखा दोनों तरफ हम ही खड़े थे मैंने जितनी बार भी देखा खुद को ही देखा प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ मेरी प्रेमिका के शहर की एक ही बात निराली है की उसके शहर में इंद्रधनुष दीखता है हमेसा बिना बादल बिना सावन ग्रीष्म ऋतू में भी और मैं झूम उठता हूँ मोर सा फिर ख्याल आता है मैं खाली हो गया हूँ यहाँ खुद को भरने आ जाता हूँ बावला सा || प्रिया मिश्रा :) _______________________________________________________________________________ एक खुद से नाराज व्यक्ति दुसरो को नाराज कर जाता है इसलिए पहले खुद को राजी कर लो फिर ओरो से राजी होना ये वक़्त नहीं तुम्हारा कही और ध्यान भटकाने की पहले खुद को ढूंढ लो फिर शहर भर में लौ जलाना प्रिया मिश्रा :) __________________________________________________________________________________ स्त्री मानहानि सह सकती है मानहानि का दावा नहीं कर सकती क्युकी हजार सवाल उसी पे आएंगे क्युकी स्त्री उत्तरदाई है उत्तर...
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जब मेरे दादा जी गुजरे थे तब सबको बहुत रोना आया था लेकिन मेरे पापा मेरी दादी को संभाल रहे थे एक बेटे का अपने माँ के प्रति ये प्रेम देखकर मेरी आँखे भींग गयी थी लेकिन समझ से परे थी क्या कोइ गया हुआ किसी के सान्तवना में वापस आ सकता है ? क्या सफ़ेद रंग लाल हो सकता है ? मैंने बचपन में इस बड़े गहरे सत्य से परिचय किया || लेकिन वही जब पापा फुट - फुट कर रो रहे थे उनके कंधे पर किसी का हाथ न था माँ भी खड़ी रो रही थी बाप के जाने के बाप बेटा बड़ा हो जाता है उसे कोइ नहीं समझा सकता ममता का पाठ || अब मेरे पापा कुछ नहीं कहते बस सोचते रहते है काश मैं बच्चा ही रहता बड़ा न होता और अपने बच्चो को देखते रहते है अब वो बहोत कम मुस्कुराते है बस उन्हें इतना इत्मीनान है उनके बच्चो का बाप है और उनके बच्चे अभी बच्चे है || प्रिया मिश्रा :)
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संवाद अगर मैं कभी न रहु तो तुम क्या करोगे अब वो चुटकुला मत सुना देना की मैं पागल हो जाऊंगा | फिर मैं कहूँगी ओह इतना प्यार करते हो मुझसे | फिर तुम कहना नहीं मैं दूसरी लाऊंगा | पागल तो कुछ भी कर सकता है || हहहहह ना मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा मैं एक चित्रकार हूँ तुम्हे खोज लूंगा अपने चित्रों में , अपने रंगो में और सजा दूंगा अपने ह्रदय में | एक ऐसे कोने में जहाँ तुम सबसे जायदा सुरक्षित रहो और बस मैं तुम्हे देख सकूँ || कोइ और तुम्हारा साया भी ना छू पाए || इतना प्रेम करते हो मुझसे इतना नहीं बहोत जायदा प्रेम करता हूँ तुमसे | लेकिन शब्दों में ऐसे बांधना नहीं चाहता | मैं चाहता हूँ जैसे आसमान कभी नीला कभी लाल सा दिखाई देता है वैसे ही हमारा प्रेम कई रंगो में दिखे | तुम मेरी अंतरात्मा में रहो हमेसा हसती हुई | खिलती हुई | तुम्हारी मासूमियत | तुम्हारा बचपन सब जीवित रहे मेरी बाँहों में | बस इतना सा प्रेम करता हूँ मैं तुमसे || प्रिया मिश्रा :)
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मैं जब मिट्टी को समर्पित हो जाउंगी मुझमे एक बीज रोप देना मैं जीना चाहती हूँ सेवा भाव से लेकिन बिना कुछ कहे || प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************* मैं मरते - मरते भी एक कहानी लिख जाउंगी ये यकीं है मुझको अपनी शब्दों को कुछ और नया रूप दे पाऊँगी ये यक़ीन है मुझको || मेरे नाम से भी मेरा शहर जाना जायेगा जाते - जाते कोइ नया नाम दे जाउंगी ये यक़ीन है मुझको || मेरे कविताओ में मेरे शहर का बरसात होगा खुसबू उसकी मिट्टी मेरे पन्नो पर इत्र की तरह महकते रहेंगे यकीं है मुझको || शाम का सूरज रात के तारे सबकुछ देखेगा सब कुछ चमकेगा मेरी कविताओ में मेरा शहर मेरा घर दिखेगा मेरी कविताओ में || मैं एक अजनबी शहर में अपने शहर को ले जाउंगी ये यकीं है मुझको || मैं मरते - मरते भी एक कहानी लिख जाउंगी ये यकीं है मुझको || प्रिया मिश्रा :)
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मैं फूलमाला ले आउंगी तुम हमारी पूरानी किताबें ले आना हम अपनी कहानियो से ब्याह करेंगे और शब्दों में मिला करेंगे फिर हमें कोइ अलग ना कर पायेगा जब हम स्याही बन के एक दूसरे में घुला करेंगे || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* सृजन करना एक कला है जो सबको नहीं आती चाहे वो कविता का सृजन हो या स्वम् का सृजन हो उसके लिए प्रथम माता बनना पड़ता है || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* कवी सिर्फ कविता नहीं लिखता एक मार्ग बनाता है जिससे एक कहानी का सृजन हो सके || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** तुम जब -जब मुझे जिस - जिस रूप में ढूंढोगे उसी रूप में पाओगे || भगवान् श्रीकृष्ण ******************************************************************************* मान लिया तो मार दिए जायँगे ना मानो तो अच्छा है सबकी बातें वरना शहर भर में बदनाम किये जायँगे सुनो रहने दो ये म...
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मैं तुम्हारे जीवन के उपन्यास में प्रथम अध्याय की तरह आना चाहती हूँ अगर तुम कोइ कविता लिखो तो मैं उसमे शब्दों में ढल जाना चाहती हूँ || मैं तुम्हारे जीवन के बरसात में इन्द्रधनुष बन जाना चाहती हूँ || सुनो अगर लिखना ऐसा कोइ उपन्यास या कोइ कविता या बरसो कभी बादल बनके तो बस इतना याद रखना मैं हर वक़्त हर घडी तुम्हारे ख़यालो में डूब जाना चाहती हूँ मैं तुम्हारे जीवन के उपन्यास में प्रथम अध्याय की तरह आना चाहती हूँ || प्रिया मिश्रा :)
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तुम्हारे खयालो से फुर्सत ही नहीं मिलती तुमपे कैसे कोइ कविता लिखू || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************ जाम भर जायेंगे तो खाली भी हो जायेंगे ऐसा करो आधा भर के रहने दो आधे का इन्तजार करो कोई भर देगा जरा वक़्त गुजरने दो || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** किताब बन के मैं तुम्हारे तकिये के निचे सो जाऊँ तुम पन्ना - पन्ना पढ़ लो प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* चाय की एक घूँट क़िताब का एक पन्ना इतना काफी है खुद से खुद की नजदीकियां बढ़ने के लिए प्रिया मिश्रा :) *************************************************************************** मैं चाय सा सावला वो कागज सी सफ़ेद मैं स्याह रंग का भोला - भला वो शब्दों सी तेज मैं एक कहानी वो कविता के रूप अनेक प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************* मैं वैरा...
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जो था , उसे था मान लेना पीड़ा दाई अनुभव है प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************ थोड़ा - थोड़ा जिया जाये तो जिंदगी पूरी निकल जाएगी एक दिन पूरा जियोगे तो मौत जीने वाली आएगी जिसमे न मरोगे न जियोगे बस ताकते रहोगे की मौत कब आएगी || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************** तारीफों और शिकायतों पे गौर न किया कीजिये ये वक़्त के साथ बदल जायेगे प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** तकलीफ़ों पे तुम ध्यान मत दो गैरों के तुम सुलझा लो अपने मन के धागे क्या पता तुम्हारे सुलझे हुए मन को देख के उसके भी मन के धागे सुलझ जाये || प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************** आज तुम्हे मेरी जरुरत न हो लेकिन जब अंधेरो में खो के मुझे पुकारोगे मैं उजाला बन के तुम्हारा हाथ थाम लुंगी || प्रिया मिश्रा :) *************************************...
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अगर उसे प्रेम होता तो वो मेरी कदमो की आहट पहचान ही जाता यूँ पीछे रुक कर मेरी परछाई से किनारा ना कर रहा होता || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************ जगत पालन करने वाले कभी - कभी जगत हंता के नाम से भी जाने जाते है क्युकी कभी -कभी दानव वध जरुरी होता है || प्रिया मिश्रा :) ****************************************************************************** निति परीक्षा लेती है अनीति विनाश करती है || प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************** मानव को मानवता सिद्ध करने के लिए पूरा जीवन लग जाता है लेकिन दानव होना आसान है सिर्फ शब्दों का गलत चुनाव आपको दानव बना सकता है प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************** धोखा, फरेब, छल ये तीनो ऐसे शब्द है जो व्यक्ति की आत्मा को मार देते है प्रिया मिश्रा :) *******************************************************************************...
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ये हाथो में हाथ काफी महंगा पड़ जाता है एक वक़्त के बाद हाथ खाली रह जाता है बांधना है तो बांध लो खुद को ही खुले सपनो के लिए पूरा आसमान भी छोटा पड़ जाता है यूँ ठहर के किसी का इन्तजार मत करना जाने वाले लौटे ऐसा मौसम कभी - कभी ही आता है || प्रिया मिश्रा :) ***************************************************************************** आदमी कितना आमिर है ये उसके अर्थी के पीछे के लोग बताते है कर्म से आमिर हो तो भी भीड़ बढ़ती है धन से आमिर हो तो भी भीड़ बढ़ती है प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* मैं पेड़ के साख से लगे पत्ते देखती हूँ कैसे बेरंग से होक गिर जाते है रंग बदलने पर हाथ नियति अपना रंग बदल लेती है प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** संसार की पीड़ा ये है को वो बता नहीं सकती को वो माया है प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* हर कोइ पूरा नहीं मरता वो थोड़ा जिन्दा रह जाता ...
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आओ ज़्यादा कुछ नहीं तो कुछ शब्द ही देके जाओ तुमपे फिर कुछ लिखने को जी चाहता है || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************* हम एक दिन शाम बन के ढल जायेंगे रात में कही खो जायेंगे कल का सूरज जाने देखे या ना देखे कौन जाने तो इतना अभिमान लेके कहाँ जायेंगे तो रख दो अभिमान स्वभिमान को ताख पे की आज की जिंदगी अभी बाकी है आओ मिल बैठ के कुछ बातें करते है प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************* जब फूस का घर जल रहा था तब छप्पर वाले हस रहे थे जब छप्पर वालो का घर जला तब छत वाले हस रहे थे अब सब जल रहा है आग ठहाके लगा रही है और सब कुछ धु - धु करके जल रहा है || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* देह से प्रेम करने वाले कभी आत्मा से प्रेम नहीं कर पाते ||| प्रिया मिश्रा :)
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क्यों नहीं तुम भी अपना मकान बना लेते क्यों खुद की कोइ पहचान बना लेते || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** मैं आज भी गुजरे पल में देखती हूँ कही वो मुझे पुकार ले || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* एक बार बिश्वाश का दिया जलाया था वो जला था न बुझा था बस घूट रहा था || प्रिया मिश्रा :) ****************************************************************************** हाथ थाम के वो रोकते तो रुक जाते उसने तो रस्ते ही बदल लिए || प्रिया मिश्रा :) ******************************************************************************* मेरा सफर ठिठकता रहा रुकता रहा चलता रहा जरा धीरे हुई फिर गती आई फिर चलता रहा प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************* मैं जीना चाहती हूँ उसके लिए जो ज़माने की भीड़ में कही खो गया है क्या पता जैसे मैं ढूंढ रही ह...
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तेरे झूठे प्यार ने मुझे बहोत कुछ सीखा दिया लेकिन उस से पहले मैंने अपना ज़मीन अपना आसमा लुटा दिया || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** कागज का आदमी या तो जलना जानता है या जलाना || प्रिया मिश्रा :) ************************************************************************************ आज सुबह - सुबह ही दिन उदाश हो गया दिन भर रोया फिर शाम हो गया रात को सिसकिया लेगा प्रिया मिश्रा ********************************************************************************** जितना वक़्त मुझे लगेगा तुम्हे भुलाने में उतने वक़्त तक मैं तुमसे जुडी रहूंगी तुम्हारा तो हो चूका था कब का रास्ता अलग अब तो तुम नई मंजिल भी तलाश चुके होंगे || प्रिया मिश्रा :) ********************************************************************************** एक बार भगवान् श्री कृष्ण के मित्र ने उनसे पूछा आप तो भगवान् है फिर ये गोकुल वासी आपका दिव्य रूप क्यों नहीं समझ पाते | भगवान् श्री कृष्ण ने उनसे कहा क्युकी ये सब मुझसे सच्चा प्रेम करते ह...