इश्क का समंदर
मैंने आँचल में समेटना चाहा
इश्क का जो समंदर
आँचल मैला सा हो गया
रेशे आज भी भींगे से हैं कोनो के ,
और,
आँचल में धुप लगने से जल गयी हैं
ना गीली हैं ना , सुखी हैं
समंदर तो बंधा नहीं
छींटे आये समंदर के
खारे से,
आँचल पे गिरे
दाग बन गए
हाथो पे गिरे
छाले पड़ गए
आँखों में पड़े
तो सपने बन गए
पुरे न हुए
समंदर को वापस कर दिए
लेकिन आँचल आज भी गिला हैं
और इश्क का समंदर
आज भी
उफान पर हैं ||
प्रिया मिश्रा :)
मैंने आँचल में समेटना चाहा
इश्क का जो समंदर
आँचल मैला सा हो गया
रेशे आज भी भींगे से हैं कोनो के ,
और,
आँचल में धुप लगने से जल गयी हैं
ना गीली हैं ना , सुखी हैं
समंदर तो बंधा नहीं
छींटे आये समंदर के
खारे से,
आँचल पे गिरे
दाग बन गए
हाथो पे गिरे
छाले पड़ गए
आँखों में पड़े
तो सपने बन गए
पुरे न हुए
समंदर को वापस कर दिए
लेकिन आँचल आज भी गिला हैं
और इश्क का समंदर
आज भी
उफान पर हैं ||
प्रिया मिश्रा :)
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