"प्यार"

प्यार मैं तुम्हे शब्दों में समझा नहीं सकती
बस इतना जान लो
एक मोह हैं, तुमसे 
तभी घंटो तुम्हारा इन्तजार करते रहती हूँ
मुझे तुमसे प्यार नहीं हैं
फिर  भी तेरे एक एसमएस के,
इन्तजार में रात - रात भर
फोन को देखते रहती हूँ
और तुम कहते हो की
प्यार हैं तो समझा दो ||

प्यार शब्द को बोल नहीं सकती
बस इतना जान लो
की तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता
और जब तुम पास होते  हो
तो वक़्त , गुजरता चला जाता हैं
जैसे उसे भी मिलना हो किसी से
मैं नहीं जानती ,
तुम क्या कहोगे ,
क्या सोचोगे
बस इतना जान लो
इन्तजार हैं तुम्हारा
लेकिन  प्यार समझा नहीं सकती ||

आज तक कोइ मुझे झुका नहीं पाया
इतना गुरुर लेके चले हैं,
और तुम्हारे लिए
स्वभिमान भी नहीं देखती
अब क्या कहु
गिरवी रख दूँ खुद
तुम्हारे लिए ,
तुम्हारे चरणों में
तो मान लोगे प्यार की परिभासा
या फिर भी पूछोगे की प्यार क्या हैं ||

प्रिया मिश्रा :)



 

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog