वो पढ़ने का आदि हैं
मैं सोचती हूँ क्यों ना किताब बन जाऊँ
जिसे वो पन्ना - पन्ना
शब्द - शब्द पढता रहे ||

वो सुनने का आदि हैं
मैं सोचती हूँ , क्यों न मैं संगीत बन जाऊँ
जिसे वो सुने,
और मैं उसके रूह में उतर जाऊँ ||

वो फूलो का आदि हैं ,
मैं सोचती हूँ , खुसबू बन जाऊँ
और वो मुझे छू के गुजरता रहे ||

प्रिया मिश्रा :)

Comments

Popular posts from this blog