तुम इस तरह मुझमे बस्ती हो की
तुम्हारे बिना गुजारा अब मुश्किल लगता हैं !!
वो सुबह की चाय में मिठास भी शायद
तुम्हारे हाथो का रहा होगा
तुम इसमें अपनी मुस्कराहट जो घोलती हो !!
वो तेरा इतराना वो तेरा मुस्कुराना
वो तेरा प्यार से गुस्सा दिखाना
मेरा जीवन बन चूका हैं !!
मैं अब मैं नहीं रहा तुम बन चूका हूँ
और मुझमे अब हम घुल चूका हैं !!
ऐसा नहीं की जिंदगी में मुस्किले कम हैं
लेकिन एक तेरा साथ
जाने क्यों थकान का एहसास ही नहीं होने देता !!
मैं ग़ालिब नहीं लेकिन एक
गजल लिखना चाहता हूँ
तेरे नाम को ,
अपने कविता में घोलना चाहता हूँ !!
जिस एहसास को लेके मैं जीता हूँ
उस एहसास से तुझे भी जरा सा मिलाना चाहता हूँ
की मैं तुझमे सिमट के बस
तेरा रह जाना चाहता हूँ
प्रिया मिश्रा

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