मैं और कविता ऐसे है
जैसे आत्मा और शरीर
जैसे दिया और बातीं
जैसे कागज और स्याही
जैसे कलम और शब्द
सब एक दूसरे के बिना अधूरे हैं
और मैं अपनी कविताओं के बिना |
मैं बिना आत्मा के सिर्फ शरीर रह जाती हूँ
बिना भावनावो के मिटटी की मूरत की तरह
जो सबको देखती तो हैं
सब कुछ जानती भी हैं
पर जी नहीं सकती
क्यूंकि उसको व्यक्त करना नहीं आता
भावनाये नहीं हैं उसके पास
इसलिए वो मूर्ति हैं
और इसलिए हम इंसान हैं
क्युकी हम अपने को व्यक्त कर सकते हैं
शब्दों के माध्यम से |
हम शब्द हैं
और कागज भी
हम स्याह हैं
और कलम भी
हम आत्मा हैं
और शरीर भी
हम कविता हैं
और भाव भी
हम सार हैं जीवन का
और शब्दों का मान भी
हम कविता में जीते भी हैं
और मरते भी है ||
प्रिया मिश्रा :)
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