शहर
मैं शहर हूँ | मैं पहले जंगल हुआ करता था | मेरे पास पेड़ - पौधे थे | सुबह - सुबह चिड़ियों का झुण्ड मुझे गीत सुनाया करता था | तितलियाँ नाचती थी | सुन्दर - सुन्दर फल , फूल मेरे पास थे | प्रकीर्ति मेरे अंदर बस्ती थी | माँ पृथ्बी का वरदान था मुझे | लेकिन फिर मुझे एक नया नाम देने के लिए सोचा गया "शहर " इस नए नाम ने मेरी पहचान छीन ली | अब मैं खूबसूरत नहीं रहा | काला हो गया हूँ | अब चिड़िया नहीं आती मेरे पास | सब भाग जाते हैं | शोर - शराबो से | मैं अकेला रहता हूँ | अब फल नहीं मिलता मुझे | धुँआ पिता रहता हूँ | मेरे फेफड़ों में काला धुँआ जमा हो गया हैं | अब बारिश भी नहीं आती मेरे पास | सब मेरे साथी मुझसे रूठ गए | अब कोइ भी नहीं आता समय पर | अब जिसको टाइम होता हैं बस अपना काम करने कभी भी आ जाता हैं | अब तितलियाँ नहीं नाचती अब सन्नाटा पसरा रहता हैं | नहीं तो मोटरबाईको के शोर में दम घुटता हैं मेरा | मुझे जंगल से शहर बना के गन्दा कर दिया गया | पहले इंसान बस्ते थे | अब जानवरो का बसेरा हो गया हैं | मैं रोता हूँ , कोइ नहीं सुनता |
मैं अब भीड़ में खो गया हूँ |
मैं जंगल था तो जिन्दा था |
शहर बन के मर गया हूँ |
इस चकाचौंध की रोशनी में मेरी आत्मा सिसकती हैं |
और शोर में वो आवाज दब जाती हैं ||
प्रिया मिश्रा :)
मैं शहर हूँ | मैं पहले जंगल हुआ करता था | मेरे पास पेड़ - पौधे थे | सुबह - सुबह चिड़ियों का झुण्ड मुझे गीत सुनाया करता था | तितलियाँ नाचती थी | सुन्दर - सुन्दर फल , फूल मेरे पास थे | प्रकीर्ति मेरे अंदर बस्ती थी | माँ पृथ्बी का वरदान था मुझे | लेकिन फिर मुझे एक नया नाम देने के लिए सोचा गया "शहर " इस नए नाम ने मेरी पहचान छीन ली | अब मैं खूबसूरत नहीं रहा | काला हो गया हूँ | अब चिड़िया नहीं आती मेरे पास | सब भाग जाते हैं | शोर - शराबो से | मैं अकेला रहता हूँ | अब फल नहीं मिलता मुझे | धुँआ पिता रहता हूँ | मेरे फेफड़ों में काला धुँआ जमा हो गया हैं | अब बारिश भी नहीं आती मेरे पास | सब मेरे साथी मुझसे रूठ गए | अब कोइ भी नहीं आता समय पर | अब जिसको टाइम होता हैं बस अपना काम करने कभी भी आ जाता हैं | अब तितलियाँ नहीं नाचती अब सन्नाटा पसरा रहता हैं | नहीं तो मोटरबाईको के शोर में दम घुटता हैं मेरा | मुझे जंगल से शहर बना के गन्दा कर दिया गया | पहले इंसान बस्ते थे | अब जानवरो का बसेरा हो गया हैं | मैं रोता हूँ , कोइ नहीं सुनता |
मैं अब भीड़ में खो गया हूँ |
मैं जंगल था तो जिन्दा था |
शहर बन के मर गया हूँ |
इस चकाचौंध की रोशनी में मेरी आत्मा सिसकती हैं |
और शोर में वो आवाज दब जाती हैं ||
प्रिया मिश्रा :)
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