आज शाम अँधेरा लिए खड़ा है
सुबह भी जरा धीमी थी
लगता हैं कोइ फिर सहीद हुई है
बेटी जो अपनी थी |

क्यों नहीं बनाते उसके भी मरने का शोक
वो भी मरी थी
तड़प - तड़प के
अपने देश की आन  बचाने को
वो देश की बेटी थी
जो लड़ते - लड़ते मरी है
उसका भी एक घाट  बनाओ
माला पहनावों
तभी तो पता चले
एक वर्ष में कितनी
बेटियाँ क़ुरबानी देती है |

न तुम्हारा पूरा संसार छोटा पड़  जाये तो कहना
इतनी बेटियाँ मारी  जाएँगी
की घर से बाहर तक सन्नटा छा जायेगा
अब चुप हो तब तो जवाब दोगे ही
जब भारत माँ का पूरा आँचल
बेटियों के खून से रंगा जायेगा ||

अभी खेल लो
जाट - पात
धर्म का ढ़ोग रचा लो
कल कोइ आंगन सुना होगा
कल और एक कैंडिल मार्च होगा
और बेगुनाह मारा जायेगा ||

ये रीत की तरह चली आ रही हैं
बेटियाँ जानवरो के हाथो
हर सेकंड मारी  जा रही हैं
आज रोने को दिल चाहता हैं
बात ही कुछ ऐसी हो गयी हैं
की ,
आज लड़ने को जी चाहता हैं ||

प्रिया मिश्रा |

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