ये रोज की बात हैं |

एक हरी - भरी सी डाली
अभी - अभी
पत्ते आये थे  ||
मुस्कुरा रही थी |
खिल रही थी ||
एक हवा  का झोका आया
और पेड़ तनहा हो गया ||

किसी का कुछ नहीं बिगड़ा
पेड़ में डाली दुबारा नहीं आई

वो टूटी डाली वही पे पड़ी हैं
लेकिन टूट चुकी हैं पेड़ से
जमीं को छुआ उसने
और उसका धर्म बदल गया ||
कुशूर  किसका ?
कौन अब गलती मानेगा
जब हवा ने डाली तोड़ के
अपना रुख मोड़ लिया ||

वो हवा हैं रोज रुख मोड़ेगा
डाली टूटेगी
उसका धर्म बदल जायेगा
पेड़ सिसकेगा
तनहा हो जायेगा
और फिर ,
फिर हवा रुख मोड़ लेगा ||
ये रोज की बात हैं

प्रिया मिश्रा :) :)

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