आँधिया  गुजारी थी , मुझे छूके
मैं पर्वत सी खड़ी  रही  ||

कुछ हलके पत्थर टूटे
मैं भी जरा सी हिली थी
पर इरादे मजबूत थे
मैं डटी थी
और डटी ही रही

आँधिया गुजरी थी , मुझे छूके
मैं पर्वत सी खड़ी रही  ||

दरारे आई रास्तो में
मंजिल फिर भी
नीव लिए खड़ी  हैं ||

शाम ढल  के रात हो आई
रौशनी अब  भी वही हैं ||

कोइ काट दे मेरी भुजाओ को
ऐसा कोइ साहस  का तलवार नहीं ||
मैंने जहाँ घुटने टेक दिए हो
ऐसा कोइ वार नहीं ||

मुझसे रूठ  गयी हो चांदनी
लौट के फिर भी आई हैं
 वो हौसलों से मेरे झुकी हैं
दामन  में समेट  के तारे लाई हैं ||

मैं एतबार खुद पे करती रही
आँधिया  गुजरी  थी मुझे छूके
मैं पर्वत सी खड़ी  रही ||

प्रिया मिश्रा :) :)

Comments

Popular posts from this blog