प्रेम परिचय ( भाग २ )

मैं वापस आ गयी | सुबह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा था | वो मुझे बार - बार चिढ़ा रहा था | उसकी बातें मैं नहीं भूल पा रही थी | सोचते - सोचते और रोज के कामो में दिन गुजर गया | शाम अभी बाकि थी | कोइ और कहानी नई आनी  थी | मैं शाम को बाबा के लिए चाय लेके गयी वो उनसे बाते कर रहा था | दरहसल मेरे और शर्मा अंकल के घर में सिर्फ दो दरवाजो का फासला  था | तो शर्मा अंकल मेरे बाबा सब साथ - साथ ही शाम की चाय लेते थे | उसे देखते ही मुझे सुबह की सारी घटना  याद  आ गयी | मैंने बाबा और शर्मा अंकल को चाय  दिया  और जाने लगी | बाबा बोले अरे बेटा श्रवण को भी चाय दो | पहली बार उसका नाम सुना | वो अब भी मुझे देख के मुस्कुरा रहा था | मैं एक और प्याली लाने  चली गयी | जब वापस आई बाबा को पहली बार मुस्कुराते हुए देखा दिल से | लोगो के लिए तो सभी हस्ते हैं | पर खुद के लिए हसना कितना मुश्किल हैं ये कोइ मेरे बाबा से पूछे |
उसके चेहरे की हसी अम्मा के साथ चली गयी थी | मुझे बाबा का मुस्कुराना अच्छा लगा और मेरी श्रवण से दुश्मनी भी जाती रही | एक बेटी के लिए उसके बाप से बढ़कर क्या हैं ||
मेरी पढ़ाई पूरी हो गयी थी | मैं बाहर कम ही जाती थी | किसी से मिलना मिलाना मुझसे ना होता था | मेरा साथी मेरा कमरा और कुछ किताबे थे | तो उसके बाद मेरा उस से मिलना कुछ दिनों तक न हुआ | वो चाय के वक़्त भी नहीं दीखता था | शर्मा अंकल ने बताया था उसकी "पीएचडी" चल रही थी | एक सुबह वो मेरे घर पे आया | मेरे बाबा से कुछ पूछना था उसे | मेरे बाबा भी पीएचडी थे | तब मुझे पता चला वो भी इकोनॉमिक्स में पीएचडी कर रहा था | वो बाबा से बातें कर रहा था और मैं उसे सुन रही थी | काफी मस्तमौला इंसान था | वो दुनियादारी से बेखबर था | मुस्कुराता , हस्ता , हसता और खुद में जीने वला व्यक्ति था वो | वो बच्चा था | हाँ बच्चा | मेरी नजर में वो सबसे मासूम बच्चा था | जिसे कोइ खबर न हो | कोइ चिंता न हो | बस दो गुब्बारे और चार रंगीन खिलौनो में उसकी जिंदगी बस्ती हो ऐसा बच्चा |
उस दिन के बाद हम लगभग एक महीने के बाद मिले | अब वो मुझे नहीं चिढ़ाता था | सायद उसे पता चल गया था | मैं चिढ़ती हूँ | मैं शाम को अपने छत  पे थी | वो  अंकल के छत पे था | उसने उस दिन के मजाक के लिए सॉरी कहा | मैं सर हिला दिया | मेरे शब्द कम ही निकलते थे | उसने मेरा नाम पूछा | मैंने मन  ही मन सोचा रोज बाबा मुझे मेरे नाम से पुकारते हैं कई बार इसकी सामने भी पुकारा हैं | ये बहरा हैं या बात करने का बहाना  ढूंढ रहा था | पर मैं इतना तो उसके बारे में जानती थी की सोचता कुछ  नहीं हैं | ये कुछ भी पूछ सकता हैं |
मैं बता दिया संजीवनी | संजीवनी वो जिसे हनुमान जी लाये थे | तब तो आप बड़ी भारी होंगी | मैंने कहा इस से ख़राब मजाक तुम्हे नहीं मिला कोइ | ना आपके पास हैं तो आप ही कुछ सुना दे | आप तो बोलती ही नहीं हैं |
हां मैं नहीं बोलती हूँ और तुमसे और नहीं बोलूंगी तुमने हर बार मेरा मजाक बनाया हैं |
अरे नहीं यार ऐसा कुछ नहीं हैं | तुम दिल पे ले लेती हो | अच्छा आप से सीधे तुम पे आ गए |
वो फिर हसने लगा | अच्छा सुनो अब नहीं करूँगा कभी मजाक पक्का | मत जाओ प्ल्ज़ | मेरा यहाँ कोइ दोस्त नहीं | कभी तो बातें कर लो | पढ़ते - पढ़ते मैं भी ऊब जाता हूँ | बाबा और शर्मा अंकल से तो मजाक नहीं  कर सकता न | और किसी को यहाँ जनता भी नहीं | समय भी नहीं जानने का | सिर्फ छह महीने के लिए यहाँ हूँ | तब तक के लिए तुम ही दोस्त बन जाओ | अच्छा दोस्त न सही पडोसी के नाते एक एहसासन कर दो |
( शेष भाग आगे )

प्रिया मिश्रा :)

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