एक शाम ढले मैं दूर निकल जाऊ | क्षितिज के उस पार विलीन हो जाऊ | मैं भी ढल जाऊ और कभी और आऊँ एक नया सबेरा बन के | लुका - छुपी खेलु और छिप जाऊँ फिर सब मुझे ढूंढे | और मैं दूर खड़ी मुस्कुराऊँ |
एक शाम ढले मैं दूर निकल जाऊँ | कही पहाड़ो में छुप जाऊँ | पत्तो से खेलु | चादर लेलु आसमा के और स्वर्ग तक धरती नाप के आऊँ | कभी - कभी ख्वाबो का सामियाना अच्छा लगता हैं ||
और कभी - कभी दूर चले जाना अच्छा होता हैं ||
प्रिया मिश्रा :)
Nice one
ReplyDeletethank you g :)
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