मेरे सपने में जो बरगद का पेड़ बाहें फैलाये खड़ा था
वो मेरा था
उसकी जड़े जमीं की छूती हुई जमीं में जम  गयी थी
ऐसा लगता था
माँ से लिपटा कोई बच्चा सो रहा हो |
उसके शीर्ष ऊपर तक गए हुए
देखो तो आखे चौंधिया जाये
वो आसमान को छूता हुआ
और दूर तक फैली उसकी डालियाँ
जैसे बाहें फैला के मुझे समेट  लेगा |
उसके जड़ो के किनारे - किनारे
हजारो नन्हे पौधे
सबका पालनहार वो
सबकी तरफ अपनी छाँव
बिखेरता और धुप से खेलता
मेरा पेड़
मेरे सपनो का पेड़
मेरा बरगद का पेड़ |
जिसके सब दीवाने   थे
पर वो मेरा दीवाना था
उसके बाहों में मैं झूला झूली
और सपना भोर तक चलता रहा
 सुबह हुई
और वो पेड़
कल का वादा  देके चला गया |
मेरा पेड़
मेरे सपनो का पेड़ ||

प्रिया मिश्रा :)

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