सुन रे कहानी
जिस कहानी का कोइ  नहीं  शीर्षक होता  |
जिस कहानी का कोइ नहीं  उदेस्य होता  |
वो कहाँ  प्रसिद्धि पाती हैं  |
बिना नाम की कहानी
गुमनाम हो जाती हैं ||

सुन रे निंदक
मैं गुमनाम होके  भी प्रसिद्धि पा लुंगी |
मैं आज गुमनाम कहानी हूँ |
एक दिन मैं इतिहास बना लुंगी ||

सुन रे कहानी
तू खुद में गुमान ना खा  |
न खुद को ईश्वर बता |
तू बिना शीर्षक की  |
कहाँ तक जाएगी | 
तू कुछ भी कर  |
तू गुमनाम हो जाएगी |

सुन रे निंदक ,
तेरा बिस्वाश धोका खायेगा
मैं पर्वत  सी खड़ी रहूंगी
मेरा पन्ना - पन्ना  फिर से लिखा जायेगा
तू भी देखेगा
कल का मेरा सबेरा
मैं ग्रंथ बन के पूजी जाउंगी
और तू निंदक ही रह जायेगा ||

प्रिया मिश्रा :)
 

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