पचपन  में बचपन


मैं अपने बगीचे में किताब पढ़ रही थी | उसक आना यूँ हुआ जैसे काली घटा बिजली में घुंगरू बांध के आई हो |
हाव - भाव ही कुछ ऐसे थे | सावला रंग | दूधिया सफ़ेद सी दाते  | चांदी की पायल और उसमे बंधे घुंगरू |
नाक में नथ चाँदी की  बड़ी सी वो भी | मैंने पूछा कहा की हैं ? इतराते हुए बोली यही बगल गांव की मेमसाब | आपका नाम प्रिया हैं न |
 बाबा बोले |
मैंने हैरानी से पूछा बाबा कौन  बाबा
किसकी बेटी हैं तू ?
वो "रामनाथ" आपका रसोईया |
अच्छा - अच्छा , समझ गयी | तू क्यों आई और पहले कभी देखा नहीं तुझे | रामनाथ के तो सारे  सदस्यों से मिली हूँ मैं ?
हाँ , मेमसाब वो हमरा गौना ना पांच साल में हो गया था | वही थी |
तो अभी मायके घूमने आई हैं ?

ना - ना मेमसाब यु छोड़ दिए हमको |
शहर  में रहते न |
कोइ शहरी पसंद आ गयी |
मैंने देखा उसका चेहरा | आँखे लाल हो चली थी |  आवाज भर्रा गयी फिर भी मुस्कुरा रही थी |
उस मासूम से चहरे पे मेरे भी दिल भर आया |
कुछ पूछा नहीं मैंने |
काफी वक़्त तक कुछ न बोली |
वो मेमसाब कुछ काम होतो बता दो | आज से मैं ही करुँगी आपका सारा काम | वो बाबा नहीं आयंगे | वो खेत संभालेंगे | पैसे कमाने हैं ना | वो मेरी चुटकी का भी गौना हैं  ना |
तेरी एक और बहन हैं ?
हाँ याद आया | तेरे बाबा ने बताया था | पढ़ी हैं वो |
ना मेमसाब हमारे घर में इतना कहाँ |
एक भाई था उसे पढ़ाया पर अब तो वो भी सहरी हो गया |
अच्छा , कब हैं उसका गौना ?

इहे मास  में पूर्णिमा को |
अच्छा चल अभी खाना बना दे | फिर देखते हैं | क्या कर सकती हैं तू ?
मेमसाब एक बात बोले ?
हाँ बोल न |
मुझे तनिक पढ़ा दोगी ?
मैं आपके यहाँ का पूरा काम करुँगी | उसके बाद पढूंगी |  तनिक  लिखना जान जाते | कुछ पढ़ना जान जाते | तो कही और काम लग जाता जायदा  पैसा  भी मिलता | अभी बापू हमें खिलाये की खुद खाये |
महंगाई बढ़ गयी हैं | हमारी चादर तो आज भी छोटी ही हैं |
मैंने कहाँ क्यों नहीं ?
कितना तक पढ़ी हैं ?
कुछ न मेमसाब |
बड़े ही कहाँ हुए हम |
उम्र तो बचपन में ही पचपन की हो गयी |
मैं उसकी बातो में खो सी चली थी |
इतनी मासूमियत | कहाँ छुपा के रखा था इसने ?
अच्छा तो मैं तो सिर्फ पढ़ा दूंगी | लेकिन तुझे नौकरी के लिए डिग्री चाहिए होगी | उसके लिए क्या करेगी |
पैसे तो लगेंगे ? और समय भी लगेगा ?
मेमसाब जब आप थोड़ा पढ़ा लिखा दोगे  तो मैं आपके काम के साथ साथ बच्चो को पढ़ाऊंगी | यही आपके पास
उस से जो पैसे बनेंगे उस से खुद की पढ़ाई  पूरा करुँगी |
मेमसाब हाँ बोल दो न ?
हाँ , तो बोल दिया | पहले अपना काम ख़तम कर ले फिर पढ़ाई सुरु करते हैं |
जी मेमसाब मैं अभी कर के आती |
इतनी पीड़ा | इतनी शांत | इतना हौसला | और इतना भोला ज्ञान |
मैंने उसका नाम ही भोली रख दिया |
और आज वो भोली | खुद के स्कूल की प्रिंसिपल हैं | दो हजार बच्चे उसकी निगरानी में पढ़ते हैं | बापू  का पक्का मकान हैं | और चुटकी ससुराल में खुश हैं ||
सपने बड़े हो गए भोली के | उसने बचपन जो नहीं जिया वो अब जीती हैं
पच्पन  में बचपन ||
इरादों में जान हो तो | बंजर जमीं भी फसल उगलती हैं |
बादल पिघल जाता हैं और बारिश होती हैं ||
टूटी आसे  जुड़ने लगती हैं ||
और फिर सबेरा होता हैं |
इरादों  का सबेरा ||
तो आप भी जगमगाईये और दुसरो को भी जगमगाने दीजिये ||
पच्पन में बच्पन  का मजा लीजिये ||

जहाँ जिंदगी ने धकेला था
वही से रास्ता बना लिया
इतनी दूर छोड़ आई
उन  पुरानी  राहोँ  की
की मंजिल ने कदमो तले  डेरा जमा लिया ||

प्रिया मिश्रा :)


 

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