सोया हुआ आदमी जब कम्बल
छोटा पाता हैं तो
कभी सर को
कभी पाँव को छिपाता हैं !!
जब न छिप पाए पाँव न छिप पाए
सर ,
वो खुद कुछ नहीं करता
जाकर लम्बे कम्बल वालो के वहाँ
अपनी गरीबी का गुहार लगाता हैं
कभी दरवाजा खुलता हैं
कभी दुद्कार दिया जाता हैं !!
जब न खुले दरवाजा तो खाली हाथ लौटे
और जब खुले
तो रंगा सियार आता हैं
वो देता हैं कम्बल के झांसे
और थूक के लार टपकता हुआ चला जाता हैं
कम्बल का भूखा कुछ थूक
चाटता हैं
कुछ वही रह जाता हैं
जो थूक बचा उससे एक और नया
रंग बनता हैं जो ,
एक और नया सियार बनता हैं
रंगा हुआ !!
और जो चांट गया वो फिर दुसरो को
वही थूक
अपने मुँह से थूक के
चतवता हैं !!
पर हैरत की बात ये हैं
की कम्बल आज भी छोटा ही हैं !!
और सियार बढ़ गए हैं
थूक से धरती गीली हो गयी हैं
आज और भी कड़ाके की ठण्ड लगती हैं
पर कम्बल आज भी छोटा हैं
न पाँव ढका न सर
लेकिन थूकने की कला जारी हैं !!
प्रिया मिश्रा !!

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