हवा बिक रही हैं ||
पहले जमीर का सौदा हुआ
फिर मिट्टी का सौदा हुआ
बाद में बिकी पानी
अब हवा भी बिकती हैं बाजारों में
ये आधुनिकता हमें कहा घसीट लाई ||
जमीर के सौदे में चुके नहीं होंगे ये लोग
दोषारोपण कर के बचते रहे ये लोग
आज बात खुद पे आई
तो बच के निकल लिए
कल आएगी तो बेच के निकल लेंगे ||
ये सोच
नहीं हैं
एक काला धुँआ हैं
जो सबको निगल रहा हैं ||
तभी तो आज हवा भी
बड़े आबरू से
बिक रहीं हैं ||
प्रिया मिश्रा :)
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