कभी -कभी सोचती हूँ |
लोग एहसास क्यों दिलाते मुझे की मैं अपाहिज हूँ |
फिर ख्याल आता हैं |
उन्होंने सिर्फ बैसाखिया दी हैं मुझे |
वो अधूरा वक़्त तो मैंने गुजारा हैं |
फिर उनको क्या खबर |
की वक़्त बड़ा हैं ,
या बैसाखी की कीमत ||

प्रिया मिश्रा :)

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