प्रेम परिचय ( कहानी )


मैडम आपने इतनी अच्छी किताब लिखी हैं |  "प्रेम परिचय " | मैं चाहता हूँ इसे पढ़े बाद में पहले आपके  मुँह से सुने | आपमें इतनी प्रतिभा हैं | मैं कल ही प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलवाऊंगा | आप जैसा समझे काका और हाँ मुझे बेटी कहे मैडम नहीं |
अच्छा तो पिता के हैसियत से मेरी बात मान लो | और इस प्रेम का परिचय सबसे करवावो | क्या पता वो शब्द तुम्हे खुद ढूंढ ले जिसके पन्ने तुमने कोरे  रखे हैं |
वो नहीं मिलेगा काका वो अतीत था | अतीत कहाँ वर्तमान से परिचय करता हैं |
सच्चे मन से याद करो तो अत्तीत भी वर्तमान बन के वापस आ जाता हैं बेटे |
अच्छा चलो कल मिलते हैं |
अगली सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस --
मैम आपके  कहानी का शीर्षक तो बहोत अच्छा हैं | जरा बताएंगी हमें | क्या बताऊ आप पूछे मैं उत्तर दूंगी |
ये कहानी किसके लिए हैं ?
ये कहानी नहीं हैं | ये एक प्रेम हैं जो प्रेम को समर्पित किया गया हैं | ये मेरा प्रेम हैं |
अब वो प्रेम कहाँ हैं ?
पता नहीं द्रश्य रूप से कहाँ हैं पर अद्रिश्य रूप से सदा मेरे हिरदय में वाश हैं उसका |
आप काफी भाउक हैं मैम |
अच्छा आप इसके जरिये कोइ सन्देश दे रही हैं सबको ?
नहीं मैं अपने शब्दों को ढूंढ रही हूँ ताकि कोइ पन्ना मेरा कोरा न रहे |
मतलब ?
कई बातो के मतलब सब्दो में नहीं होते पत्रकार साहब | आप नहीं समझ पाएंगे |
तो क्या लिखू मैम आप ही बता दे |
कुछ नहीं |
अच्छा तो कहानी को सुरु करे | अब तो आपकी  बातें सुन के मुझे भी उत्सुकता हो गयी हैं | मैं भी जानना चाहता हूँ की आपकी नजर में प्रेम क्या हैं ?

 मेरी नजर में प्रेम पूजा हैं | एक समर्पण हैं | और मेरी किताब मेरी पूजा को समर्पित किया हुआ फूल हैं |
सायद मेरे देवता को पसंद आये |
मैम अब बातें रहने दे जल्दी अपनी कहानी से परिचय कराये |
अच्छा ,



मैं शाम की तन्हाईयो में छिपी अपने कमरे के आखरी कोने में बैठ के किताबे पढ़ रही थी |
मैं अधिक वोलने की आदि नहीं हूँ | इशारो  में बातें  करना  मेरा पहला गुण हैं |
मैं शोर की आदि नहीं हूँ | सन्नटा  मेरा जीवन हैं |
ये तो रही मेरी बातें |
अब उसका परिचय दूँ जिसके कारन मेरा  प्रेम से परिचय हुआ | या कहूं मुझे प्रेम का अनुभव हुआ |
प्रेम कोइ वस्तु नहीं हैं जो अपने पास रख लिया जाये  या जिसे किसी से छीन लिया जाये |
प्रेम अनुभव हैं |
एक आत्मा का दूसरे  आत्मा से परिचय हैं |
ये वो बीज हैं जो , खुद ही पनपता हैं | और फिर आपके आश्रय में पलता हैं | ये मासूम बच्चे की तरह खिलखिलाता हैं | फिर एक हरे - भरे पेड़ की तरह आपको छाया देता  हैं | इसमें सबक भी होता हैं | शाबाशी  भी होती हैं |
और कभी - कभी पेड़ सुख भी जाता हैं | इसे जरुरत होती हैं आपके प्रेम की | आपके समय की |
हाँ , सही सुना आपने प्रेम भी प्रेम चाहता हैं |
मैं कहाँ बातों  में लग गयी |  हाँ तो उसका परिचय कुछ ऐसा हैं |
वो शांत हैं | और शोर करते हुए मेरे जीवन में आया | उसने पहले मेरे ही  घर  का दरवाजा खटखटाया |
तब मैं  एक कहानी पढ़ रही थी |
उसमे  नाईका का नाम उर्मिला था|
उर्मिला कहती हैं  - मैं बून्द हूँ तुम सागर हो | मैं तुम्हारे बिना कहाँ हूँ | तुम  कई नदियों को समेत लोगे खुद में  पर मेरा क्या होगा | मैं तो धरती पर आते ही सुख जाउंगी | मैं आग नहीं झेल पाऊँगी | तुम अपना क्रोध शांत रखो |
वरना  मैं जल जाउंगी | पर उसका प्रेमी नहीं सुनता हैं | वो उसे छोड़ के धुप में चला जाता हैं | उसर्मिला नंगे पाँव उसके पीछे दौड़ती  हुई आती हैं | उसके पाँव छील गए हैं | आखे लाल हो आई हैं | उसके बालो का गजरा गिर गया हैं | पायल टूट गयी हैं | और उर्मिला भाग रही हैं | लेकिन उसका प्रेमी नहीं रुकता हैं |
वो चला जाता हैं |
उर्मिला की आखरी साँसें भी उसका नाम लेती हैं और उर्मिला बिदा लेती हैं | वही उसी अनजान सड़क पर वो बून्द सुख जाती हैं ||

यही तक पढ़ी थी कहानी | और दरवाजा बजा | आवाज आई | कोइ हैं |
मैंने पूछा आप कौन ?
मैं ,
मैं आपका नया किरायेदार |
मैंने पूछा किरायेदार ?
हाँ , आपका |
पागल हो क्या हमारे घर में सिर्फ दो कमरे हैं |
एक मेरे बाबा का एक मेरा तुम क्या सर पे रहोगे |
हाँ रह लूंगा , आपको बुरा न लगे तो |
मुझे गुस्सा आ गया |
इतना सयानापन अच्छा नहीं पिटे जाओगे |
और फिर मैंने अपने पिता को आवाज दी |  बाबा आये | बाबा ने उससे पूछा कौन हो भाई तुम |
नमस्ते बाबा |
मैं यहाँ शर्मा जी के यहाँ आया हूँ | आप ही हैं न वो ?
नहीं बेटा हम नहीं हैं |
हमारे पडोसी हैं वो |
अच्छा - अच्छा , माफ़ कीजियेगा  मुझसे गलती हो गयी |
बाबा ने कहा कोइ बात नहीं बेटा बस ये बगल का घर हैं | वही होंगे मिल लो |
उसने मुझे देखा और मुस्कुराता हुआ चला गया | थोड़ी चिढ़ी थी, उससे पर उसका मुस्कुराना मुझे अच्छा लगा |
दूसरे दिन सुबह रोज की तरह थी बस ये एहसास नया होने वाला था |
हम दोनों फिर टकरा गए | कहाँ आप सोच रहे होंगे |
बड़ी अजीब  से माहौल में एक सब्जी वाले के पास | मैं सब्जिया ले रही थी वो मेरी बातें दोहरा रहा था |
भईया एक किलो भिंडी देना |
मुझे भी भईया एक किलो भिंडी दे दो |
रहने दो भईया भिंडी ,मुझे गोवि देदो |उसने फिर मेरी बाते दोहराई | रहने दो भईया मुझे भी गोवि देदो |
मैं चिढ गयी | ये क्या लगा रखा हैं | क्यों मेरी बातें दोहरा रहे हो |
अरे ये क्या बात हुई मैं कहाँ आपकी बातें दोहरा रहा हूँ | मैं तो बस सब्जिया चुन - चुन के ले रहा हूँ |
मैंने कहा तो वही क्यों ले रहे जो मैं ले रही हूँ |
उसने कहा ये आप  गलत कह रही हैं मैडम  अभी मुझे जो लगा मैंने कहा मैं आपकी बातें नहीं सुन रहा था |
मेरा गुस्सा सातवे आसमान पर था | मैं वापस आ गयी बिना कुछ लिए |  वो फिर  मुस्कुरा रहा था | पर इस बार मैं नहीं मुस्कुरा पाई न ही मुझे अच्छा लगा |
(शेष भाग आगे )

प्रिया मिश्रा

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