खिड़की

खिड़की मेरे कमरे की
पूरब की और आती हैं
अच्छा स्थान चुना था
मेरे दादा जी ने
सूर्य नमस्कार यही से हो जाता हैं ||
ये खिड़की भी जरा सी धुप सेक लेती हैं
ये कमरे की वो जगह लेती हैं
जिसके आज्ञा के बिना कोइ आ नहीं सकता
कोइ जा नहीं सकता
इसको सभी नमस्कार करके ही मेरे कमरे में दाखिल होते हैं
कल चाँद महाशय आये खिड़की ने
बाहर से ही रोक लिया
मुँह फुलाए खड़े रहे फिर
जाकर कही खिड़की को दया आई
और उनको आने मिला
वरना, वही से बस झांक रहे थे
जब कमरे में आये
पहले सेठ की तरह मेरे
कुर्सी पर बैठे फिर किताबो को
पलटा , उसमे जरा सी धूल जमी थी
किताबे भी उन्हें देख रही थी
किताबे बोली , आप ही पढ़ लो
मेरे पन्ने अब जरा कम पलटे जाते हैं
जंग सी लगी हुई हैं
जरा पलटेंगे तो
नसे खुलेंगी
जरा धूल हटेगी
चाँद महाशय बोले रहने दो
मुझे फुर्सत नहीं
आज कल तुम्हे वैसे भी कोइ नहीं पढता
मेरे पास इंटरनेट हैं ||
वैसे तुम पेड़ो के काटने से बने
हो, मुझे बिलकुल पसंद नहीं
पेड़ो को काटना
अच्छा मैं नन्ही किताब इतना बड़ा
कारन हूँ पेड़ को काटने के
और ये जो मनुस्य रोज अलग -अलग घरो में रहें की इक्छा लिए घूमते हैं उनका क्या ||
देखो कैसे पेट फुलाए पड़ा हैं ||
देखा कैसे नाक बजा रहा हैं
कल अपने बाप से लड़ कर आया
आज यहाँ अलग घर में रह रहा
अब इतने घर बनेंगे तो पेड़ तो काटेंगे ही न
है ये तो हैं ,
चाँद जरा इठला के बोला ||
ये तो पेड़ लगाते नहीं
पृथ्बी चुप -चाप
घूमते घूमते
सारी बाटे सुन रही थी
बोली अरे वो
किताब
तू सच हैं
चाँद दूर हैं
उसे क्या पता
मुझसे पूछो
मैं रोज कितना धुँआ पीती हूँ
हीईई , हरी - भरी थी
काली - काली हो गयी हूँ
मैं पृथ्बी माँ थी
अब धाई माँ हो गयी हूँ
कितनी साफ - सफाई से बनाया
था मुझे ,
कितना सुन्दर रचा था
अब देखो
ऐसा लग रहा कल की दुल्हन
मैले में नाहा के आई हैं
हीईईई , कौन मुझे अब फिर से बना पायेगा सुन्दर
पृथ्बी की दुःख में हवा भी शामिल हुई
बोली , रुक जा बहन
इस मोटे को उदा देती हूँ
फिर देखना कैसे डरेगा
सबको हवा से उदा दूंगी
बरखा बोली हां हां ,
मैं भी सबको डूबा दूंगी
चाँद बोला मैं भी नहीं आऊंगा ,
रहेंगे बिजली में ,
बिजली बोली मैं क्यों रहूंगी ,
सारी किताबे फड़फ़ने लगी
खिड़की जोर- जोर से चोट खाने लगी
रोने लगी चिल्लाने लगी
बोली मैंने क्या बिगड़ा हैं
मुझे क्यों इतनी चोट दे रही
हवा बोली सुना नहीं
गेहूं के साथ घुन भी पिस्ता हैं
और साथ दे जो गलत काम में
वो कुम्भकरण हमेशा ही मरता हैं
चाहे वो कितना भी बलवान हो
अब हम रावण की सेना को जला के रहेंगे
नहीं रहेगा मनुस्य
नहीं रहेगी उसकी कृतियाँ
और फिर हवा जोर हुई
मेघ भी तेज हो गया
घटा फट गयी
चाँद छुप गया
किताबे जमीं पे आ गयी
पन्ने फड़फड़ाने लगे
वो बोली , आज बड़े दिनों बाद खुली हूँ
सदा के लिए बंद होने को
इतने पर पृथ्बी ,
की दया आ गयी
अरे नहीं - नहीं
रहने दो हैं तो मेरे ही संतान न
माँ मैला न धोएगी तो कौन धोएगा
कौन अपना आँचल देगा
कौन इन्हे सींचेगा
वो पुत्र न सही
पर मैं तो माँ हूँ
हां मैं तो माँ हूँ
रहने दो ,
और लौट जाओ
तुम मेरी बहने हो
और ये चाँद इनका मामा
रिश्ते तो वैसे भी आज कल
कोइ निभा न पा रहा
इस मनुस्यो की दुनिया में
कमसे कम हम तो निभा पाए
सब बातें कर रहे थे ,
खिड़की , के अंग टूटे थे
उसकी अकड़ जा रही थी ,
और वो , अब बस आंसू बहा रही थी
पृथ्बी की ममता पर उसे भी प्यार आ गया
और चाँद रात भर चमकता रहा
मोटा आदमी जमीन पर पड़ा था
और किताब मुस्कुरा रही थी ||

प्रिया मिश्रा :)

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