काश

काश ये गम कागज की कश्ती होती
तो मैं इसे बारिश के समंदर में बहा देती
फिर घंटो देखती उसे डूबता हुए
जैसे वो मुझे देखता हैं
और मुस्कुरा के कहती
चलो अब अलबिदा कह दो
की ऐ गम तुझे मैंने हरा दिया
तू मुझसे लिपटना चाहता था
और मैंने तुझे गंगा में बहा दिया
अब सर्धांजलि ले ले
और चला जा
की अब तेरा कुछ भी नहीं यहाँ
बस खुसियो का बसेरा हैं
तू पराया था
और पराया ही रह गया
तू कागज बन के बह गया
खुशियाँ खुदा बन के रह गयी

प्रिया मिश्रा :)

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