राजनीती रही सदा बढ़ चढ़ के
शाशक ने देश संभाला हैं
पर हम क्या
अपाहिज हैं
जो सब कुछ उनपे डाला हैं !
क्या खुद के घर की गंदगी दूसरे के सर पे डालेंगे
हैं अपना बर्तन झूठा पड़ा कब उसे खंगालेंगे !!
नारी बिकाश
शिक्षा बिकाश
रोड विकाश
नगर बिकाश
कहा से सुरु होता होता
क्या घर का
मालिक शासक नहीं होता हैं
फिर क्यों भीख मांग के
राजनीती को बढ़ावा देते हो
क्या खुद की मत मारी गयी हैं
जो खुद की नहीं चुनते हो
क्या शीक्षा घर वालो का काम नहीं
क्या हम इतने अपाहिज हैं की
उसके लिए भी राजनीती आएगी
क्या हमारी जरूरतों के के लिए भी
राजनीती खेली जाएगी !!
कोइ कहेगा मैं दूंगा
शिक्षा का अधिकार
कोइ कहेगा
मैं दूंगा जीने का अधिकार
धिकार नहीं हैं हमपे
जो हमारे कर्तब्य को
गिना के कोइ और
जुआ खेल रहा हैं
जरा देख आखे खोल के
रावण नारी सुरक्षा को
अपने सत्ता के तराजू में तोल रहा हैं !!
कब तू जागेगा ये मनुष्य
कब तुझे इतना गुमान
होगा कब तेरा अभिमान
खंडित न होगा
कब तू आग लागएगा
कब ये हमारे कर्तब्यो के
बोझ तले
हामरा इमां न कुचला जायेगा
देख जरा तेरा धर्म क्या हैं
क्या तू सक्षम नहीं तेरा
निर्णय लेने में
जो खुद तूने बांध रखा !!
देख तेरे बेबसी पे
एक और रावण जाग रहा
ये सत्ता की जाल हैं
इसके भरोसे न रह
खुद के कर्तब्य पहचान
तू नारी हैं तू नर हैं
तुजमे बस्ता
कण कण हैं
तू तेरी सुरक्षा अपनाएगा
फिर कहा से
राजनीती का रावण आएगा
देख न कितने मुँह खुल रहे
अलग पार्टियों के अलग अलग
भयंकर तांडव
देख न तू पायेगा
अभी वक़्त हैं
खुद के कर्तब्य पहचान ले
तू एक इतिहास बनाएगा
न दोहरा इतिहास को
ये जागीर तेरी हैं
तू भी चलता हैं
इन सरको पे
फिर किस बात की देरी हैं
पाँव तेरे संभाले इन सडको ने
फिर क्या तेरा कोइ कर्तब्य नहीं
तू चलेगा और
ये भरेंगी राजनीती की मूल्य
फिर कौन तुझे संभालेगा
जब तू गिरेगा उलटे मुँह
ये धरती ही तो
तुझे संभालेगी
फिर बाट क्यों रहा हैं
राजनीती के धूल चाट क्यों रहा हैं
क्या वो दूर खड़ा तेरी
बेटी को सबल बनाएगा
जब तू ही इसका भाग नहीं
सर्वशिक्षा अभियान कहा से आएगा !!
तू लूट रहा
तू लुटा जा रहा
तू लूटेगा भी
अगर अब भी
न संभल पायेगा
देख ध्यान से देख
राजनीती कुम्भकर्ण बन पाँव पसार रहा
अब वो फ़ैल के सो जायेगा
फिर तू चलेगा कहा
कहा सोयेगा
क्या खायेगा
कौन खिलायेगा
कभी सोचा हैं
जो लुटा हैं
तूने वो पाप कहा जायेगा !!
सब अपने किया ही खाते हैं
तू तो पाप ही खायेगा
जब फिर से घूम
के तेरा दिया तुझे वापिस आएगा !!
अच्छा सुन न क्या वो कुर्सी तुझे खिलाएगी
या मिटटी जिसे तू भाव नहीं देता
वो सोना बन के आएगी
जो मर रहा हैं
तुझे अनाज खिलने को
उसे क्यों नहीं
अपना लेता
मनुस्यता का धर्म निभाने को !!
क्या वो तेरा भाई नहीं
क्या तू खुद नोटों से भूख मिटा पता हैं
फिर वो तेरा देवता क्यू नहीं जो
सुबह शाम तेरे लिए हल्ल चलता हैं !!
क्या चलती राह की नारी तेरा
शिकार हैं जो तू उसपे अपना
नपुसंगता आजमाता हैं
तू जागता क्यों नहीं हैं
क्यों नहीं खुद को पहचानता हैं
ये सब तेरा धर्म हैं
जो धर्म का ठेकेदार
राजनीती लाता हैं
क्या कुर्सी पर बैठा न्याय दिला पायेगा
जब तेरा घर उजड़ेगा
क्या वो रंगा भेड़िया
तुझे छत दे पायेगा
जरा सोचना ध्यान से
क्या जब चीथड़ों में तेरी बेटी लिपटी मिलेगी
क्या वो उसके धवल पास्त्र बनाएगा
वो नंगा नचा रहा खुद
राजनीती बन के
वो कल्युग का बिनाश ही लाएगा !!
बस यु ही हाथ पसारे भीख में कुर्शी मांगेगा
फिर नोच के खायेगा
तुझे
और तेरी धर्म को बेच आएगा !!
देख न देख ध्यान से
अब कुआ मुँह खोल भी रहा हैं
जातिवाद का राक्छस मुँह में खून लगाए बैठा हैं
बगल में बैठी हैं नंगी मनुस्यता
और मनुस्य सर झुकाये बैठा हैं
वो देख तेरी कुल की नारी
का चिर हरण
जहा कुर्सी पर अँधा धरित्रास्त बैठा हैं
सकुनी फिर पासे फेकेगा
और फिर से सभा लज्जित होगी
फिर कुलवधू रोयेगी
फिर तेरा राजनीती जीतेगा
कोइ गोपाल न आएगा
क्यों तूने उसे सुला रखा हैं
जरा तो जाग जा
कम से कम चूल्हे की जगह खुद में तो आग जला
कौन जाने कल की रोटी क्या होगी
लगता हैं
तेरा ही ताला टूटेगा
तू फिर से लूटेगा
अब दरवाजे पर कोइ
लम्बे लम्बे पाँव पसारे कोइ आ रहा
लगता हैं रावण जाग रहा
तुझे खोज ही नीलकालेगा
फिर वो कदमो से तुझे टटोलेगा
रात भर तुझे नोच नोच के खायेगा
तू रात भर अपने पाप का कर्ज
चुकाएगा
पर जब
फिर रात गुजर जाएगी
तू फिर वही बेशरम सा
जय राजनीती जय राजनीती गाएगा !!
प्रिया मिश्रा !!

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