चाय
चाय एक दिन की शुरुआत
एक मिठास
एक सुबह की किरण
एक एहसास
एक प्यार
एक रिश्ते की
कमाई ||
कितना कुछ आ जाता हैं ना ,
जब हम चाय के बारे में सोचते हैं ||
सोच कोइ भी हो
चाय सुकून दे जाता हैं
वो मुस्कुरा के चाय क्या दे गयी हम दीवाने हो गए
रिश्ते की बात चलते - चलते कुछ यूँ मंजिल तक गयी ||
चाय के पानी का सादा पन
हमारा बचपन
पत्तियों का रंग
जवानी के जोश
और चीनी की मिठास
प्यार का एहसास
अदरक का स्वाद
जरा सा कड़वा ,
जिंदगी जीने का सबक
दूध की खुसबू
माँ का हाथ
और अब बनी ये चाय
साठ की उम्र में चाय की चुस्की
और अपने फर्ज के पूरा करने का
सुकून ,
और समाचार पत्र के साथी के रूप में चाय ||
चाय की उबाल और जिंदगी का कड़वापन ,
और फिर सबक ||
चाय जितनी जायदा उबलती हैं
उतनी जायदा स्वाद बनती हैं
चाय की तरह ही
जिंदगी जितने जायदा उबाल के
इम्तहान लेती हैं
सबक चाय की मीठे की तरह
देती हैं ||
हैं ना ,
अदरक , जो चाय का स्वाद बढ़ता हैं
वो टेढ़े - मेढ़े सा
कुरूप सा
मिटटी से जुड़ा हुआ
कितनी बड़ी सबक दे जाता हैं
रंग - रूप के भेद की मिटा जाता हैं
ये वो ताश का पत्ता हैं
जो दीखता गुलाम की तरह हैं
पर होता राजा हैं
चिन्नी छोटे - छोटे दानो की
सफ़ेद शांत
गन्ने की निकली
किशानो की आशा
ये छोटी सी चीनी
कितना मिठास घोल देती हैं
पहले चाय में फिर
जुबान में
फिर रिस्तो में
कद छोटा
और काम बड़ा
ये सबक ही दे जाती
आदमी हमेसा अपने काम से जाना जाता हैं
कद से नहीं ||
हैं ना
चाय की पत्ती
हरी - भरी
तोड़ी गयी
उसे गम हुआ
वो उसके रंग में
न रह पाई
वो मुरझा गयी
और कितनो का
दर्द ले गयी
ये सारे चाय के साथी
मिल के हरा गए
उसको जो मदिरा बन के आई थी ||

प्रिया  मिश्रा :)

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