तुम कपास न हुईं
तुम कपास क्यों न हुईं
जो तू कपास होती
थोड़ी तुझसे मैं एक
मदद लेता
कुछ तुझसे बुनता
थोड़ा मैं सुलझता !!
थोड़ा -थोड़ा
बुनते सुलझाते हम
अरमानो का समयाना
बुनते ,
थोड़ा उसमे मैं छिपता
थोड़ा तुम्हे छिपाता ॥
तुम कपास न हुईं
तुम कपास क्यों न हुईं !!
अच्छा चलो शिकायतों का सिलसिला
ख़तम करते हैं
चलो न कुछ नया बुनते हैं
मैं कपास हो जाऊँ
सायद मैं तेरा दर्द समझ जाऊँ
फिर तू जुलाहा बन जा
कुछ नया सोच और कुछ नया मुझे बना
हुआ क्या कुछ नया
जो कुछ हुआ हो तो मुझे भी बता ॥
हम दोनों एक होने को
बंधन में बंधे थे
फिर क्यों
अलग -अलग ,
तू कपास मैं जुलाहा
मैं कपास तू जुलाहा
क्यों न दोनों मिल के एक हो जाये
तुम कपास भी रहो और जुलाहा भी
तुम खुद खिलो
तुम खुद बुनो
तुम खुद सामियाने की तरह
मुझे ढक दो और
मैं तुम हो जाऊँ
और तुम्हे यकीं हो जाये
की
मेरे खवाबो के सामियाने भी तुमने बनाए
मुझे सजाया मुझे सवारा
तुम कपास ही तो हो.. जुलाहा भी
फिर भी एक कमी सी थी
तुम ही रह गयी सब कुछ
मैं तुम्हारे मुकाबले कुछ भी न बन पाया
क्या मैं बन
जाऊँ कपास और तुम जुलाहा
क्या मैं बांट लूँ तुमको
और तुम मुझको
फिर बनाये
एक नया कुछ एक नया
समयाना
एक नये
रूप का जिसमे कपास भी
दिखे गुलाबी फूलो में
और उस सामियाने की
छिटो में हस्ता मुस्करात जुलाहा !!
प्रिया मिश्रा :)
तुम कपास क्यों न हुईं
जो तू कपास होती
थोड़ी तुझसे मैं एक
मदद लेता
कुछ तुझसे बुनता
थोड़ा मैं सुलझता !!
थोड़ा -थोड़ा
बुनते सुलझाते हम
अरमानो का समयाना
बुनते ,
थोड़ा उसमे मैं छिपता
थोड़ा तुम्हे छिपाता ॥
तुम कपास न हुईं
तुम कपास क्यों न हुईं !!
अच्छा चलो शिकायतों का सिलसिला
ख़तम करते हैं
चलो न कुछ नया बुनते हैं
मैं कपास हो जाऊँ
सायद मैं तेरा दर्द समझ जाऊँ
फिर तू जुलाहा बन जा
कुछ नया सोच और कुछ नया मुझे बना
हुआ क्या कुछ नया
जो कुछ हुआ हो तो मुझे भी बता ॥
हम दोनों एक होने को
बंधन में बंधे थे
फिर क्यों
अलग -अलग ,
तू कपास मैं जुलाहा
मैं कपास तू जुलाहा
क्यों न दोनों मिल के एक हो जाये
तुम कपास भी रहो और जुलाहा भी
तुम खुद खिलो
तुम खुद बुनो
तुम खुद सामियाने की तरह
मुझे ढक दो और
मैं तुम हो जाऊँ
और तुम्हे यकीं हो जाये
की
मेरे खवाबो के सामियाने भी तुमने बनाए
मुझे सजाया मुझे सवारा
तुम कपास ही तो हो.. जुलाहा भी
फिर भी एक कमी सी थी
तुम ही रह गयी सब कुछ
मैं तुम्हारे मुकाबले कुछ भी न बन पाया
क्या मैं बन
जाऊँ कपास और तुम जुलाहा
क्या मैं बांट लूँ तुमको
और तुम मुझको
फिर बनाये
एक नया कुछ एक नया
समयाना
एक नये
रूप का जिसमे कपास भी
दिखे गुलाबी फूलो में
और उस सामियाने की
छिटो में हस्ता मुस्करात जुलाहा !!
प्रिया मिश्रा :)
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