वो एक दिन

वो एक दिन मुझे मिला था | उससे मिलने का उससे बातें करने का | लेकिन मैं कही गुम था  | पता नहीं कहाँ
उसकी आँखों में शायद | उसकी आँखे मुझसे पूछ रही थी | मेरा गुनाह बता तो , जो इतने दिन गुजर गए
और आज एक दिन के लिए मिले हो |
मैंने कितने वक़्त गुजरे तुम्हारे बिना | एक दिन कई सदियों के सामान गुजर गयी और तुम सिर्फ एक दिन के लिए मिले हो |
मैं क्या जवाब देता | मैं चुप रहा जैसे पहले था | मुझे पता था वो मेरी खामोसी पढ़ लेगी और मुस्कुरा के कहेगी
रहने दो मुझे पता हैं मेरी किस्मत में सारे ऐसे ही हैं | मैंने उसे कोइ वादा तो नहीं दिया बस एक बार उसे गले लगा लिया | ये बताने को की हमारी दुरी ही हमारा प्यार हैं और फिर हम एक दूसरे का अनकहा एहसास लेके लौट आये |  भींगी आखो से वो मुझे दूर तक ताकती रही होगी,  मुझे पता था लेकिन मैं नहीं मुड़ा | खुद को पत्थर बना के चलता रहा | आज तक चल रहा हूँ कोइ मंजिल लिए बिना , कैसे लूँ कोइ मंजिल सारे रास्ते उस से होकर ही गुजरते हैं ||


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