इतिहास

मैं एक इतिहास रचना चाहती हूँ
जायदा कुछ नहीं चाहती
बस पूरा आसमा और पूरा जमीं  चाहती हूँ
मेरी कलम पहुंचे गलियों में
और मेरे पन्नो पे भी कहानी लिखी जाये
कुछ ऐसा हो
मैं जिन्दा रहूं सबकी बातो में
मेरे किस्से से
सबकी रगो में उबाल आ जाये
ऐसी  चमक  हो मेरी आँखों में की
सूरज भी कहे ,
मैं क्या रौशनी दूँ तुझे
तू जहाँ भी जाये
वहाँ  रौशनी की बहार आ जाये
चाँद की तरह सीतलता छोड़ू
और चांदनी की  तरह सबकी आँखों में मुस्कुराऊं
मैं जायदा कुछ नहीं चाहती बस
पूरा आसमान और पूरा जमीं चाहती हूँ ||
मैं एक ऐसा इतिहास रचना चाहती  हूँ ||

प्रिया मिश्रा

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