मैं दूर से जिसे देख के लौट आई हूँ
बहोत पहले
वो घना  जंगल
अब भी है
मेरे पीछे हैं
ऐसे, जैसे कोइ
दानव हो
घने बालो वाला
अब क्या करूँ
सपने भी तो नहीं देखे ते
ऐसे , जैसे
जिंदगी कट रही है
तेरे बिना और
तुझसे होकर भी

प्रिया मिश्रा :)


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पुरषों की तुलना में महिलाये कम रोती है
क्युकी पुरुष  रोते नहीं शिशकीया लेते है
वो भी सन्नाटे वाली |
इनकी यही शून्यता इन्हे
जीने नहीं देती है
और मरते भी नहीं
इन्होने ओढ़ रखा है
एक भ्रम की
पुरुष रोते नहीं
इन्हे हक़ नहीं
मांगने का
ये बस देना जानते है
बचपन से
पच्चपन तक
ये नहीं बटोर सकते खिलौने अपनी बहनो की तरह
क्युकी इनके हाथ में है
जिम्मेदारियों का एक
गुड्डा , जो कभी हस्ता नहीं
दिल खोल के
रोता  नहीं दिल खोल के
वो देखता रहता है
अपनी नीली आँखों से
की कैसे दबता है
जब वो बोझ तले तो
एक आवाज आती है
शिशकीयों की
वो रुदन नहीं है
उसे रुदन कह के
अपमानित मत करना
पुरुष ने रख दिया
निकाल  के अपना
कलेजा, घर के छत पर
इसलिए अब घर में बरसात नहीं होती
और होती है वो महिलाये सुरक्षित
जिनके पुरुष रोते नहीं
सिर्फ शिशकीया लेते है
अनवरत
अनगिनत ||

प्रिया मिश्रा :)

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