आड़ी - टेढ़ी रेखाएँ
खींचते हुए
जब मैं मात्रा सीखते गयी
तब मैं धीरे - धीरे मातृभासा में बदलती गयी ||
जब शब्दों के बवंडर में गोते लगाए
कुछ अनकहे जज्बात निकले
कुछ अधूरी कहानिया निकली
जब मैं सबको एक माला में पिरोती गयी
मैं लिखने लगी
धरती और आसमान को
और वो कविता बनती गयी ||
प्रिया मिश्रा :) 

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