गावँ के अपने मजे होते है
वहाँ शादगी इतनी होती है
की सामने वाला आपके कुर्ते,
पे लगे कीचड़ को देख के
सामने ही हँस उठता है
वो कोइ और जरिया ढूँढता
आपके ऊपर खीचड़ उछालने का ||

प्रिया मिश्रा :)


___________________________________________________________________________________

मैं सुबह की रौशनी में
शाम नहीं ढूंढ़ती
मैं  मनुष्य को मनुष्य
ही समझती हूँ
मैं कभी उनमे
भगवान् नहीं ढूंढ़ती
मुझे पता है
की वो भी नहीं जानता
अपनी कमियों
अपनी खूबियों को
मैं एक नफरत भरे
सहर में
शांति का बागबान नहीं ढूंढ़ती
वो भी तो नहीं
ढूंढ़ते ,
शांति
सुख
और एक सीधा
सुझला हुआ समाज
और मैं भी नहीं ढूंढ़ती
अब , बादलो  में चाँद
वो कल की बात थी
अब  मैं,
 आज में आज
भी नहीं ढूंढ़ती ||

प्रिया मिश्रा :)

___________________________________________________________________________
इश्क एक मसला  है
इसे अमन का तमगा ना दे
वरना  एक तिश्नगी रह जाएगी
और उम्र जाया हो जाएगी
लफ़्जो के मायने बदल जायँगे
और कायनात का खुदा भी
नहीं पिघलेगा ||

प्रिया मिश्रा :)


___________________________________________________________________________________
 आज कल लोग हर बात पे बात बदल देते है
पुराने शब्दों को ढकने को नया आवरण दे देते है
ये बातों का सिलसिला भी
कपडे उतारने जैसा हो गया है ||

प्रिया मिश्रा :)

__________________________________________________________________________________
वो बातें जो बस याद बन के रह गयी है
उन यादों में भी एक याद बस्ती है
जो तेरे शहर से होते हुए
तेरी गलियों तक जाती है
और फिर लौट आती है
एक याद बनकर
वो यादें
प्रिया मिश्रा

__________________________________________________________________________________

मैं बड़ी बत्तमीज हूँ
उनके लिए
जो झूठा
तमीज लिए फिरते है

प्रिया मिश्रा :)

___________________________________________________________________________________

जब मुझे बड़े - बड़े लेखकों ने
नकार दिया |
तब ये समझ आया
मैं इन लेखकों की
कहानियो की नायिका नहीं
मैं महाकाव्य की
रचना के लिए
जन्मी हूँ ,
अब भी कोइ कहानी
है बाकि सबसे
जिसपे किसी का ध्यान गया नहीं
प्रकृति ने उसे बचा के रखा है मेरे लिए
और मैं उसी की
लेखिका हूँ ||

प्रिया मिश्रा

_________________________________________________________________________________

बात  करने से बात बनती है
और चुप रहने से बात बिगड़ती नहीं है ||

प्रिया मिश्रा :)

__________________________________________________________________________________

मित्रता आशीर्वाद है ईश्वर का , मित्र ईश्वर के गले में पड़े हुए माला की तरह होते है | बिलकुल पवित्र मगर नाजुक होती है डोर बिश्वाश की , जो टूट जाये तो बिखर जाते है , अक्सर ऐसे लोग फिर से नहीं पिरो पाते खुद को |
तो आप पिरो  दीजिये इनको और फिर से सजा दीजिये इन्हे ईश्वर के गले में | और बनाइये एक नया दोस्त और लीजिये ईश्वर का आशीर्वाद फिर से |
हैप्पी फ्रेंडशिप डे ||

Comments

Popular posts from this blog