मित्र सुबह की तरह होते है
उनके होने से
सब कुछ नया सा लगता है
उदासिया हमें छू भी नहीं पाती
वो हमारे लिए उगता हुआ सूर्य है
मेरा एक मित्र खो गया है
कही भीड़ में
मेरा सूरज भी ढल गया है कही
समंदर के नीर में
सोचती हूँ
नाप लूँ समंदर को
लेकिन कौन से समंदर को नाप लू
वो सबमे खोया है थोड़ा - थोड़ा ||

प्रिया मिश्रा :)

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